





स्वाधिष्ठान चक्र पेडू (शिश्न के सामने) स्थित होता है व इस चक्र के आराध्य देव विष्णु जी हैं। इस चक्र की साधना करते समय विष्णु भगवान की आराधना की जाये तो अत्यधिक लाभप्रद होता है।
इस चक्र पर नियमित ध्यान करने से कुण्डलिनी जागरण के साथ-साथ अहंकार आदि विकारो का नाश होता है, मोह निवृत्ति व रचना शक्ति का निर्माण होता है। इस चक्र पर ध्यान केंद्रित कर साधना करने से पूर्ण पौरूषता व पूर्ण मेनकामय सौन्दर्य की प्राप्ति होती है। निर्भयता, निडरता की अनुभूति होती है, आकर्षक व प्रभावी व्यक्तित्व उत्पन्न होता है व भौतिक संसाधनों का समझदारी पूर्वक उपयोग करने की क्षमता मिलती है। सही-गलत में निर्णय करने की भी क्षमता मिलती है। इसके दर्शन से ब्रह्मचर्य स्थिर एवं दृढ़ बनता है।
यह एक ऐसा चक्र है, जो हमें प्रेरणा के आंतरिक ड्डोत से जोड़ता है और हमें आस-पास की सुन्दरता का अनुभव करने में सक्षम बनाता है। यह चक्र शुद्ध व स्थिर ध्यान और एकाग्रता शक्ति का केन्द्र है। स्वाधिष्ठान चक्र की मौलिक गुणवत्ता रचनात्मकता की है, यहां रचनात्मकता के लिये ऊर्जा उत्पन्न होती है। कुछ लोग जो जरूरत से ज्यादा प्रसिद्धि या सफलता के मोह या चाह से ग्रस्त रहते हैं, दूसरे की प्रसिद्धि से ईर्ष्या करते हैं, यह उनके अस्थिर या बंद स्वाधिष्ठान चक्र को दर्शाता है। ऐसे लोगों का व्यक्तित्व अव्यवस्थित रहता है। उन्हें दूसरों से बेहतर या दूसरों द्वारा अपनी प्रशंसा की महत्वाकांक्षा अत्यधिक रहती है। जैसे कि हम भी रोजमर्रा के जीवन में कुछ लोगों से मिलते हैं, जो स्वयं पर ही केन्द्रित रहते हैं, उनके सामने उनकी बजाय किसी और की प्रशंसा कर दी जाये तो यह उन्हें कतई पसन्द नहीं आता वे स्वयं को ही सर्वोपरि चाहते हैं, परंतु इसके लिये वे विशेष प्रयास भी नहीं करना चाहते हैं। यह सभी आदते स्वाधिष्ठान चक्र से सम्बन्धित है। उनकी सहजता इसी महात्वाकांक्षा में खो जाती है, परिणामतः वे अपने कार्य की पूर्णता हेतु पूरी ऊर्जा का उपयोग नहीं कर पाते।
स्वाधिष्ठान चक्र के जाग्रत हो जाने पर क्रूरता, घमण्ड, ईर्ष्या, आलस्य, अवज्ञा, अविश्वास जैसे दुर्गणों का नाश होता है।
शारीरिक स्तर पर यह चक्र हमारे Liver, Kidney व पेट के निचले हिस्से से संबंधित है। जब हम बहुत ज्यादा सोचते है, तब हमारी ऊर्जा का केन्द्र सूखा हो जाता है और ऐसी अवस्था में मधुमेह, रक्त कैंसर जैसे रोग हो सकते हैं, जब यह चक्र पूरी तरह से असंतुलित हो जाता है।
असंतुलित या बंद स्वाधिष्ठान चक्र कब्ज, गुर्दे में संक्रमण, कमर दर्द, urinary problems आदि रोगों के लिये भी जिम्मेदार है।
निष्क्रिय स्वाधिष्ठान चक्र हमारे शरीर के साथ-साथ हमारे मानसिक स्तर के लिये भी अहितकारी है। यह अवसाद, ईर्ष्या, भय और असुरक्षा आदि बीमारी को बढ़ावा देता है, इसके साथ ही यह आत्म सम्मान में कमी अनुभूति, समाज अलगाव व मोह कम होना, वास्तविक दुनिया से दूरी बनाना व अपनी ही दुनिया में खोये रहना आदि स्थितियों के लिये भी जिम्मेदार है।
संतुलित आहार द्वारा- पौष्टिक आहार को भोजन में शामिल कर स्वाधिष्ठान चक्र को संतुलन में लाया जा सकता है जैसे- तरबूज, संतरा, आदि रसीले फल इसके साथ ही दालचीनी व बहुत सारा पानी भी बंद चक्र को संचालित करने में सहयोगी है।
ध्यान (Meditation) द्वारा- ध्यान हमारी अंतरात्मा की आवाज सुनने की क्रिया है, इसमें दिमाग को शांत कर मन के भावों को सुनने का प्रयास किया जाता है। ध्यान प्राप्ति के लिये हमें शांत स्थान पर आसीन हो अपने चित्त को एकाग्र कर शांत मन से श्वास के आवागमन पर ध्यान स्थिर करना होता है। ध्यान करते समय सिंदूरी (orange) रंग जो स्वाधिष्ठान चक्र का रंग है, उसके बारे में सोचकर ध्यान लगाना चाहिये।
जल के द्वारा स्वाधिष्ठान चक्र का नियमित संचालन– जल इस दूसरे चक्र का प्रधान तत्व है, इसलिये जलाशय या नदी तट या ताल के समीप जा कर मन को शांत कर वहाँ कुछ समय व्यतीत कर स्वाधिष्ठान चक्र के नियमित रूप संचालित होने में जो रूकावट है, उसे दूर किया जा सकता है, साथ ही नियमित रूप से स्नान करना भी चक्र को संचालित करने हेतु सहायक है।
योगासन द्वारा- योग मुद्रायें जो शरीर के निचले हिस्से से सम्बंधित है, उनका अभ्यास कर स्वाधिष्ठान चक्र में जो Blockage या रूकावट है, उन्हें दूर किया जा सकता है। उपविष्ठ कोणासन (Wide Angle Pose), बद्ध कोणासन (Cobbler Pose) सुप्त बद्ध कोणासन (Butterfly Pose) व भुजंग आसन (Cobra Pose) के साथ-साथ सूर्य नमस्कार का नियमित अभ्यास करना इस चक्र को संचालित करने में अत्यधिक लाभप्रद है, ध्यान रखें सभी योग मुद्रायें आराम से व धीमी गति से सावधानी पूर्वक की जाती हैं।
सूर्य नमस्कार- सूर्य नमस्कार में 12 योग मुद्रायें होती है, जो हमारे शरीर को लचीला बनाने के साथ-साथ सभी अंग तक रक्त संचार करती है, सूर्य नमस्कार स्वयं में ही एक सम्पूर्ण योग है। इसका नियमित अभ्यास दूसरे चक्र को पूर्ण रूप से संचालित कर संतुलित करता है।
शक्तिपात दीक्षा द्वारा- कई साधक अपने जीवन में अंसतुलित कुण्डलिनी चक्र के कारण व्यक्तिगत व साधनात्मक जीवन में कठिनाई व असहाय अनुभव करते हैं, असंतुलित कुण्डलिनी सम्बन्धित साधना एवं गुरुदेव द्वारा दीक्षा प्राप्त कर इस चक्र को नियंत्रित कर नियमित रूप से संचालित करने में हम क्रियाशील हो पाते हैं।
स्वाधिष्ठान चक्र के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, जिनकी साधना से साधक स्वाधिष्ठान चक्र को पूर्णतः जाग्रत और नियंत्रित कर सकता है। भगवान विष्णु की नित्य पूजन और वं बीज मंत्र के जप के साथ ही भगवान विष्णु की भी साधना करना श्रेयस्कर होगा। जिससे स्वाधिष्ठान चक्र शीघ्र ही सक्रिय होने की ओर अग्रसर होता है।
एक ताम्र पात्र में नारायण यंत्र स्थापित करें। ऊँ श्रीं नमो नारायणाय मंत्र का जप करते हुये, यंत्र को जल से स्नान करा लें और फिर दूध, दही, घृत, शहद, शक्कर से तथा पुनः शुद्ध जल से स्नान करायें। यंत्र को पोछ कर दूसरे पात्र में चन्दन से वं बीज मंत्र लिखकर उस पर यंत्र स्थापित करें, यंत्र का पंचोपचार पूजन सम्पन्न करें। इसके पश्चात् नारायण मंत्र का 4 माला मंत्र जप कुण्डलिनी सिद्धि माला से करें।
21 दिन तक इस मंत्र का जप करते रहें, साथ ही वं बीज मंत्र का नित्य 51 माला स्वाधिष्ठान शक्ति माला से जप करें।
विनीत श्रीमाली
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