





मदनजित् होते हुये भी सदा शक्ति (उमा) के साथ रहते हैं। भस्मधारी होते हुये भी अनेकानेक रत्न राशियों के अधपिति हैं। वही शिव अजन्मा भी है और वही शिव अनेक रूपों में आविर्भूत भी है। गुणातीत भी, गुणाध्यक्ष भी है, अव्यक्त भी है और व्यक्त भी है। संयुक्त शिव-शक्ति की उपासना में मानव जीवन की पूर्ण सार्थकता है और इसमें मानव का परम कल्याण भी निहित है।
शिव शक्ति स्वरूप- शक्ति पूर्ण, अजर-अमर, आत्म बोध स्वरूप है, शक्ति के अभाव में व्यक्ति को दुःख- दारिद्रय, भय, विनाश की आशंका रहती है, शक्ति के जाग्रत होने से साधक स्वयं शक्ति पुंज बन जाता है, जिसके कारण आत्म-विश्वास की एक ऐसी दिव्य शक्ति उसमें समाहित हो जाती है, जिसके फलस्वरूप उसकी बाधायें, विपत्तियां, अपने आप दूर होने लगती हैं, शिव-शक्ति उपासना से असीम ऊर्जा, चेतना की वृद्धि होती है। क्योंकि शिव तत्व एक जाज्वल्यमान शक्ति पुंज है।
शिव के स्थूल नेत्र बाह्य जगत का स्वरूप कारक हैं, वहीं तीसरा नेत्र आन्तरिक जगत का कारण है, शिव के मस्तक पर स्थित अर्द्धचन्द्र शान्ति का स्तम्भ है, जिसके फलस्वरूप मस्तिष्क कभी विचलित नहीं होता, आवेश रूपी लहरें शिव रूपी समुद्र में उत्पन्न नहीं होतीं, शिव त्रिशूल सृष्टि के तीन गुण सत, रज और तम तीनो का संहार करने वाला तथा दिव्य सिद्धि दिलाने वाला प्रतीक है, डमरू जयघोषकारक, विरोधी शक्तियों का चेतावनी स्वरूप है।
शिवलिंग वह परम कारण है, जिसमें सभी दृश्य विलीन हो जाते हैं, शिव-लिंग सृष्टि के समस्त प्राणियों का मूल कारण है, शिव-शक्ति स्वरूपों का सम्मेलन ही शिवलिंग है, इस संसार की सृष्टि करने वाली सभी शक्तियों का स्त्रोत है, यह सभी देवगणों का निवास स्थान तथा सारे जीवन धारियों के लय होने का करण है, ब्रह्म से लेकर चरा-चर तक सारी सृष्टि शिव-लिंग में ही प्रतिष्ठित है।
शिवलिंग में संसार की सृष्टि करने वाली चेतना समाहित है, शिवलिंग शिव तत्व का गायन और बोधन है, यदि यह जगत चैतन्य स्वरूप है, तो शिव-शक्ति महा चैतन्यमय है। शिव-शक्ति सांसारिक जीवन में सब कुछ देने में समर्थ है। साधक के कार्यों में वृद्धि के कारक हैं।
शिवलिंग ब्रह्माण्ड का स्वरूप है, क्योंकि ब्रह्माण्ड को अण्डाकर माना गया है। इसलिये उसकी साकार प्रतिमा शिवलिंग भी अण्डाकार है। सभी देवी-देवता, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, लक्ष्मी ब्रह्माण्ड के अधीन हैं, इनमें से किसी एक देवता के पूजन से एक विशिष्ट उद्देश्य का फल प्राप्त होता है, परन्तु इन सभी ब्रह्माण्ड स्थित शक्तियों की एक साथ पूजा-उपासना, साधना करनी हो तो शिवलिंग पूजन एवं साधना सम्पन्न करनी चाहिये।
सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में अवन्तिका (उज्जैन) भी जाज्वल्यमान पुरी है। उज्जैन का पूरा क्षेत्र शिव के तेज से विभूषित है, शिप्रा नदी के तट पर भगवान महादेव का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग प्रतिष्ठित है, अवन्तिका नगरी भगवान शिव को बहुत प्रिय है, यह परम पुण्यमय और परम कल्याणकारी पुरी है।
यह स्थान भारतवर्ष का सर्वाधिक प्रसिद्ध काल पर विजय प्राप्त करने का द्योतक है। वास्तव में महाकाल की महिमा भारतीय जनमानस में सर्वाधिक प्रचलित है, प्रत्येक सांसारिक व्यक्ति अपने जीवन में बार-बार महाकाल ज्योतिर्लिंग के दर्शन, पूजन करने की अभिलाषा रखता है, क्योंकि सांसारिक जीवन में सबसे अधिक कालिमा होती है, संघर्ष, कठिनाईयां, परेशानियां, तंत्र दोष, अनेक प्रकार के भूत-प्रेत आदि बाधाओं से मानव जीवन त्रस्त होता है, इन सभी कालिमा रूपी स्थितियों को महाकाल ही भस्मीभूत कर सकते हैं, केवल महाकाल शिव ही जीवन की गति को सुगमता प्रदान करने वाले देव हैं, क्योंकि उन्हें ही नीलकण्ठ कहा गया है, जो जगत के विष का पान करने वाले हैं, केवल वे ही मानव जीवन की विषमताओं का शमन करने वाले देवो के देव महादेव हैं। अन्य किसी भी देवी-देवता ने विषपान करने का साहस नहीं दिखाया, इससे यही ज्ञात होता है, कि शिव ही हमारे जीवन के विष रूपी समस्याओं का पान कर हमें जीवन में सुख-समृद्धि, वृद्धि रूपी अमृत से सराबोर कर सकते हैं।
महाकाल अपने साधक के जीवन के सभी दुखों का वरण कर उसे उच्चता प्रदान करते हैं। महाकाल की भस्म आरती पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, इस भस्म आरती को प्रसाद रूप में ग्रहण करने से व्यक्ति जादू-टोना, भूत-प्रेत आदि बाधाओं से मुक्त हो जाता है। इनकी उपासना करने के बाद साधक विरोधात्मक परिस्थितियों में रहकर भी सर्वत्र विजय प्राप्त करता है। वहीं उसे जहां सफलता की उम्मीद नहीं रहती, वहां भी सफलता प्राप्त करने में समर्थ होता है।
जीवन की सार्थकता तब ही है, जब प्रत्येक क्षण को जीवन्त और जाग्रत बनाये रखें, जिससे जीवन उच्चता की ओर अग्रसर हो सके, इसी के फलस्वरूप जाग्रत व चैतन्य अवस्था में होकर कर्म भाव के साथ उन्नति के लिये जो मार्ग प्रशस्त है, उस पर गतिशील रहकर ही पूर्णता तक पहुंच सकते हैं, वह मार्ग हमेशा ही इतना अधिक फूलों से भरा हुआ नहीं रहेगा, क्योंकि उन्नति के मार्ग में सदा अवरोध, बाधायें, चुनौतियां ही होती है, इन अवरोधों व बाधाओं को धीरता, गम्भीरता, कर्म साधना द्वारा ही समाप्त कर जीवन को श्रेष्ठमय बना सकते हैं।
सृष्टि के सभी वेद, उपनिषद, शास्त्र, ग्रन्थ और आर्य परम्परा में गुरु का महत्व सर्वोपरि माना गया है, क्योंकि सांसारिक व्यक्ति को अपने जीवन में ऐसे विराट व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है, जो उनके श्रेष्ठ जीवन निर्माण के लिये देव शक्तियों की चेतना से आपूरित होने की पद्धति, क्रिया बता सके, उनके जीवन में अनुकूल स्थितियां निर्माण करने में सहायक हो और उन्हें उच्चता की ओर अग्रसर होने की चेतना प्रदान करें।
सामान्य सांसारिक व्यक्ति को यह ज्ञान नहीं होता कि किस साधनात्मक विधि से देवी-देवता व ईश्वरीय शक्तियों की कृपा, उनका अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि व्यक्ति ऐसे स्थानों पर बिना किसी श्रेष्ठ चेतनावान मार्गदर्शक के केवल और केवल औपचारिकता ही निभा पाते हैं और उस विशिष्ट चेतना शक्ति को अपने भीतर समाहित करने में अपूर्ण रह जाते हैं। जबकि इन चैतन्य दिव्य शक्तियों से ओत-प्रोत तीर्थ स्थान की चेतना से आप्लावित और तीर्थ यात्र कर व्यक्ति अपने जीवन के भटकाव व अपूर्णता की स्थिति को समाप्त कर सकता है, तीर्थ का तात्पर्य ही तारण होता है। तीर्थ स्थानों की दिव्यता से जीवन की विषमताओं और न्यूनताओं को समाप्त कर जीवन को दिव्य शक्तियों युक्त निर्मित करने का क्रियात्मक रहस्य छिपा होता है, जिसे श्रेष्ठमय मार्गदर्शक के सानिध्य में सम्पन्न कर साधक प्राप्त कर सकता है।
शास्त्रों में गुरु को साक्षात शिव कहा गया है पालनकर्त्ता, निर्माणकर्त्ता स्वीकार किया गया है, गुरु ही ऐसे विराट व्यक्तित्व से पूर्ण जीवित देव हैं, जो शिष्य के जीवन की सभी समस्याओं का समाधान कर जीवन में सही चिंतन प्रदान करते हैं, उसके जीवन में आने वाली बाधाओं, दुखों और विपत्तियों का शमन करने की चेतना प्रदान करते हैं, उसे श्रेष्ठ रास्ता दिखाते हैं, जिससे जीवन सुपथगामी बन सके। भगवान शिव ही एक मात्र पूर्ण गृहस्थ देव हैं, जिनकी उपासना, स्तुति से शिव-शक्ति परिवारमय सुस्थितियां बनती हैं। भगवान शिव-गौरी की आराधना व रूद्राभिषेक से जीवन में दुर्गति का नाश होता है व सांसारिक मनुष्य जिसकी आकांक्षा अपने जीवन में रखता है, उसे वह पूर्णता से प्राप्त करता ही है।
पापहारिणी क्षिप्रा तट और सप्तपुरी मोक्षदायिनी चेतनामय ज्योति से आपूरित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन, पूजन, अभिषेक जीवन्त जाग्रत सद्गुरु के सानिध्य में आत्मसात करने पर शिव-गौरी परिवारमय गृहस्थ जीवन की सुस्थितियां निर्मित होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि, आरोग्य, दीर्घायु, संतान सुख, धन लाभ से युक्त हो सकेंगे। आपका अहोभाग्य है कि आप शिव-गौरी परिणयमय चैतन्य दिवस महाशिवरात्रि पर महाकाल ज्योतिर्लिंग की चैतन्य रश्मियों को सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी के दिव्य सानिध्य में रोम-रोम में आत्मसात कर सकेंगे और अपने जीवन की सभी काल रूपी विषमतायें पितृ दोष, तंत्र दोष, पूर्व जन्मकृत दोष, भूमि वास्तु दोष, जाने-अनजाने हुये पापकर्म दोष व नवग्रहों की प्रतिकूलता का शमन महाकाली भैरव सर्व दोष संहारक की तेजमय चेतना में कर सकेंगे।
पापहारिणी क्षिप्रा तट पर स्थित दक्षिणमुखी महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग तांत्रोक्त पीठ है, जो सप्तपुरी मोक्षदायिनी सौभाग्य शक्ति की चेतना से आपूरित है। यहां की चेतनामय रश्मियां जीवन की कालिमा रूपी स्थितियों का विनष्ट करने के लिये जानी जाती हैं, महाशिवरात्रि पर महाकालेश्वर महादेव गौरी के दर्शन, पूजन, अभिषेक से सांसारिक जीवन के लिये अनिवार्य महाकाल विजय प्राप्ति भैरव शक्ति युक्त तेजस्वी चेतना की प्राप्ति होती है।
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