





सारा जीवन ऐसे ही चलता रहता है। प्रति पल मन में कुछ न कुछ चलता ही है वह एक क्षण के लिये भी खाली नहीं होता प्रत्येक व्यक्ति यह मेरा है वह तेरा है इसी उधेड़ बुन में पूरा जीवन निकाल देता है और अपने जीवन काल में उसका उसी के आगे सब कुछ परिवर्तित हो जाता है और उसी का क्यों जो वह दूसरे का समझता है वह भी परिवर्तित हो जाता है और यह दुनिया ज्यों की त्यों रहती है, जिन वस्तुओं पर तुम अपना अधिकार समझते हो वह सब बदलती जाती है। जिन वस्तुओं पर हम अपना अधिकार नहीं समझते केवल वह नहीं बदलती, ये तारे, ये सूर्य-चन्द्रमा, ये आसमां पर्वत आदि किसी के नहीं है अर्थात् कोई भी इनको ये नहीं कह सकता कि मैं मैने बनाये हैं, ये मेरे हैं यह सब स्वरचित है अथवा ईश्वर द्वारा निर्मित है कोई भी वस्तु अपनी नहीं है जो पुत्र-पुत्रियां हमसे पैदा हुये हैं। उन्हें भी अपना नहीं कह सकते। वे भी बदल जाते हैं साथ छोड जाते हैं अतः ध्यान से देखा जाये तो सब कुछ ईश्वर का है और सब में समाया है। यह मेरा है वह तेरा है यह विचार केवल मन के हैं और मन संसार की रचना करता है। अतः मन से मुक्त होकर ही संसार से मुक्त हुआ जा सकता है क्योंकि मन ही संसार है।
तुम धर्म के एक रूप में स्वयं को देखते हो तो यह भी तुम्हारे मन की क्रिया है, यह सब अशुद्ध क्रिया है। यह अलग-अलग धर्म सब तुम्हारे मन की क्रियायें हैं। यह हिन्दु धर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म आदि सभी धर्म तुम्हारी मन की उपज है वरना तुम पैदा होते हो तो विशुद्ध रूप से मानव ही। जहाँ तुम बड़े हुये तो ये सब क्रियायें, धर्म, जाति, रिश्ते-नाते तुम पर लागू हो जाते हैं। जीवन की सत्य धारा से तुम्हारा मुड़ना हो जाता है और असत्य से परिचय। तुम्हारा निजीपन ही तुम्हारा असत्य है और असत्य अनेक होते हैं क्योंकि सत्य तो एक ही होता है। वह मन का कोई विचार नहीं होता वह सार्वभौम होता है। घर में कोई मर जाये तो घर के सभी लोग शीघ्रता करने लगते हैं, पास-पडोस, रिश्तेदार आदि सभी कहने लगते हैं कि जल्दी से ले जाओ क्योंकि जितनी देर लाश घर में रहेगी आंसू बहते रहेंगे, लाश के साथ कोई रहने को राजी नहीं। जिसने पूरा जीवन अपने साथ बिताया, जिसे अपना कहते थे कि यह मेरा है वह भी अपना न रहा। सभी कुछ असत्य मालूम होता है।
इस शरीर के सम्बन्ध माता-पिता, पुत्र, पत्नी आदि जो सम्बन्ध बने हैं वह शरीर के सम्बन्ध ही हैं। जब तक शरीर है, तब तक सम्बन्ध स्थापित रहते है क्योंकि जैसे मैं कहता हूं कि यह मेरा बेटा, यह मेरे माता-पिता हैं, तो बेटा मुझसे पैदा हुआ है, माता-पिता से मैं पैदा हुआ हूं अतः मेरा बेटा है, मेरे माता-पिता हैं। यह सम्बन्ध तब तक है जब तक तुम्हारी या उनकी देह है लेकिन देह समाप्त हुई तो सम्बन्ध भी क्षण भर में समाप्त हो जाता है। पूरे जीवन का सम्बन्ध एक क्षण में समाप्त हो जाता है। देह में अग्नि दी कि देह समाप्त, राख बन जाती है, मिट्टी बन जाती है और कोई पता नहीं बस चित्र में ही देखते रहो। इसलिये ये तन के, देह के सभी सम्बन्ध झूठे हैं।
भगवान बुद्ध अपने शिष्यों (भिक्षुओं) को सदैव कहा करते थे कि तुम चिताओं के पास बैठ कर ध्यान लगाया करो जिससे वह समझ सके उनके अंदर एक चेतना जन्म ले सके कि सब कुछ स्वाहा हो जाने वाला है। सभी सम्बन्ध अग्नि में स्वाहा हो जाते हैं चिता के माध्यम से। कोई भी सम्बन्ध हो सभी को चिता की अग्नि की भेंट चढ़ा दिया जाता है। कोई भी व्यक्ति मरने वाले व्यक्ति के साथ जाने को राजी नहीं। जब कि कुछ समय पश्चात् वह भी वहीं आने वाला है जो व्यक्ति पूरा जीवन तुम्हारे लिये कमाता रहा तथा तुम्हारे लिये उल्टे-सीधे कर्म करता रहा हो, उसके साथ होने को राजी नहीं हो, जब कि तुम भी उसी श्रेणी में हो, तुम भी इस देह में कुछ समय के लिये ठहरने के लिये आये हो क्योंकि तुम्हारी भी जिज्ञासा ईश्वर से मिलने की है। भगवान बुद्ध इसीलिये भिक्षुओं को चिताओं के पास बैठ कर ध्यान करने के लिये कहते थे कि यह भिक्षु अपना शाश्वत सम्बन्ध पहचान ले, इन्हें बौद्ध हो सके कि हमारा हमेशा-हमेशा के लिये जो सम्बन्ध है वह एक मात्र ईश्वर से ही हो सकता है। यह देह भी एक सराय की तरह है अपना असली घर नहीं। यहां कुछ समय ठहर कर फिर अपने नये आशियाने में चले जाना है और अपने असली घर को जो ईश्वर है उस में हमेशा-हमेशा के लिये विश्राम पा लेना है।
एक बार भगवान बुद्ध ने अपने एक भिक्षु को एक राजा के पास चेतना देने के लिये भेजा, वह भिक्षु राजा के राज महल के द्वार पर पहुंचा तथा द्वारपालों से कहने लगा कि मुझे इस सराय में कुछ समय के लिये ठहरना है। द्वारपाल कहने लगे – यह राज महल है सराय नहीं, कहीं और जाओ। भिक्षु ने कहा – नहीं, यह राज महल नहीं है, यह सराय है। मुझे कुछ दिन ठहरने दो फिर मैं चला जाऊंगा। द्वारपालों ने कहा – तुम्हें पता नहीं, यहां पर राजा रहते हैं, यह राज महल है तुम्हारे दिमाग की हालत सही नहीं लगती अतः तुम कहीं और जा कर सराय की तलाश करो।
लेकिन भिक्षु वहीं ठहरने की बात पर अड़ा रहा तथा राजा से यह बात कन्फर्म कराने के लिये कहने लगा कि यह सराय नहीं है। तब द्वारपालों ने राजा को यह सूचना दी। तब राजा ने उस भिक्षु को दरबार में बुलवाया। भिक्षु ने राजा से कहा – मैं इस सराय में कुछ दिन ठहरना चाहता हूं। राजा बड़ा ही गुस्से से बोला – तुम्हें यह सराय दिखाई देती है? यह मेरा राज महल है। भिक्षु ने कहा – मैं यहां बहुत समय पहले आया था तब आप यहां नहीं थे तथा आप जैसे ही कोई और थे। उन्होंने भी मुझसे यहीं कहा था जो आप कह रहे है, वह कौन थे? राजा ने कहा – वह मेरे पिता होंगे। भिक्षु ने कहा – मैं उनसे पहले भी यहां आया था, तब कोई और यह मुकुट तथा राज भूषा पहने इस सिंहासन पर बैठे थे, वह कौन थे? राजा ने कहा – वह मेरे दादा जी थे। भिक्षु ने काहा – वह अब कहां है? क्या वे कहीं और रह रहे है? राजा बोला – वह स्वर्ग लोक चले गये। भिक्षु ने कहा – क्यों? राजा ने कहा – उनकी आयु इतनी ही थी। वह अपनी आयु पूरी कर शरीर का त्याग कर चले गये। भिक्षु ने कहा – तो आप भी तो उनकी ही तरह अपनी आयु भोग कर इस सराय से विदा होने वाले है तो यह राज महल किस प्रकार हुआ? जिस प्रकार सराय में कोई व्यक्ति कुछ दिन ठहर कर विदा हो जाते हैं उसी प्रकार सभी लोग अपनी-अपनी आयु पूरी कर अपने दूसरे घर में स्थान प्राप्त कर लेते हैं तो यह सब सराय ही हुई या नहीं?
राजा को यह सुनकर सत्य का आभास हुआ और वह भिक्षु के चरणों में गिर पड़ा। भिक्षु उन्हें भगवान बुद्ध की शरण में ले आया। यह मन ही है जो यह सब सोचता-विचारता है। इस मन की मनोदशा ही तो परिवर्तित करनी है। जो हो रहा है वह ईश्वर की इच्छा से ही हो रहा है। तुम जो कर रहे हो या जो तुम्हारे द्वारा हो रहा है वह सब भी उस ईश्वर की इच्छा से ही हो रहा है। वह ही सर्वत्र उपस्थित है वही सब कुछ है। मेरे अंदर भी वह ही सांसे ले रहा है आनंद भी वही है यदि कोई नृत्य युक्त भी होता है तो वही जागृत होने पर करता है, पीडि़त है तो भी वही पीडि़त है मुझमें, तुझमें उसी ने जन्म लिया है तो मृत्यु भी वही लेगा। मैं तो केवल उसकी यात्र का एक कदम हूं जो ऐसी मनोदशा को प्राप्त कर लेता है उसके सभी भ्रम तिरोहित हो जाते हैं।
सभी व्यक्तियों के अपने-अपने मन हैं और अपने-अपने राग है, अपने-अपने रंग हैं जो दूसरे नहीं देख सकते। केवल अपने रंग स्वयं ही देख सकते हो। तुम्हारे मन की दशा दूसरों को कैसे पता चलेगी? तुम्हारा मन ही अपने पराया का भेद करता है। किसी को तुम मित्र मानते हो, किसी को शत्रु, जिसे तुम मित्र कहते हो वह तुम्हारे विचारों के, मन के, अनुकूल हो तो तुम उसे मित्र कहते हो। किसी से तुम घृणा करते हो तो किसी से प्रेम करते हो तुम किसी के पास बैठना चाहते हो तो किसी से दूर भागना चाहते हो, यह सब तुम्हारे मन का खेल ही है। मन की दशा परिवर्तित होने पर तुम भी परिवर्तित हो जाते हो।
संयोग से तुम्हारी शादी किसी से हो जाती है वह तुम्हें अपना पति मानने लगती और और तुम उसे अपनी पत्नी। लेकिन हो सकता था कि तुम्हारी शादी किसी दूसरी लड़की से होती तथा उसकी शादी किसी दूसरे लड़के से तो तुम उसे अपनी पत्नी नहीं कहते न वह अपना पति। जिस प्रकार राह में दो लोग मिल जाते हैं और फिर अपनी-अपनी मंजिल आने पर अलग-अलग हो जाते हैं। इसी प्रकार इस जीवन की पगडंडी पर तुम सब लोगों का मिलना एक संयोग ही तो है जो रिश्ते-नाते हम बनाते हैं वह तभी तक है जब तक हमें मंजिल न मिले तथा मनुष्य अपनी सांसे पूरी कर लेता है तो सबसे सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है फिर पता नहीं वह किसका पति बनेगा और किसका बेटा? यह सभी सम्बन्ध मन से ही तो बनते हैं और मन से ही संसार।
तुम अकेले में घबराते हो इसलिये सम्बन्ध बनाते हो, परिवार बनाते हो, यदि तुम यह जान लो कि तुम नितान्त अकेले हो तो तुम बेचैन हो जाते हो। तुम्हारी कंप-कंपी छूटने लगती है, इसी बेचैनी में तुम दूसरों को टटोलने लगते हो कि यह मेरा सहायक है, यह मेरा है, यही मन झूठा आश्वासन देता है। इस समय तुम केवल ईश्वर को ही अपना सच्चा सहायक मानना गुरु को ही अपना मानना। वह ही तुम्हारा सच्चा सहायक हो सकता है। तुम परिवार में जीते हो, अकेले में तुम्हें डर लगता है। लेकिन परिवार में तुम स्वयं को निश्चिंत कर लेते हो और सब डरे-डरे लोग एकत्र हो जाते है।
लेकिन जो अपने अकेलेपन को जान लेता है वह ईश्वर को भी जान लेता है। मन की अवस्था बिलकुल धोबी के कुत्ते के समान होती है जो न घर का होता है न घाट का। मन सदैव दुविधाग्रस्त रहता है, किसी के भी प्रति आश्वस्त नहीं होता न ही पूरी तरह ही संदेह ग्रस्त होता। यदि किसी पर विश्वास करते हो तो एक बार पूरा विश्वास करके देख लो और छोड़ दो सबको और यदि संदेह करते हो तो भी पूरा ही करो और अपने संदेह को दूर करने के लिये कम से कम पूछ-ताछ तो करोगे, कन्फर्म तो करोगे, कोई निष्कर्ष तो करोगे और आधे-अधूरे संदेह करने पर न तो किसी से पूछ पाओगे, न कन्फर्म कर पाओगे तथा न ही किसी प्रकार का निर्णय ले पाओगे। अतः जो भी करो पूर्णता से करो तो ही मुक्ति संभव है। पूर्ण का मतलब यह होता है कि अब आगे कोई गुंजाईश किसी किस्म की नहीं है। अब आखिरी मंजिल आ गई है, अब कुछ करना होगा।
और आपको यह निर्णय लेना होगा कि आप संदेह करें या भरोसा, स्थिति स्पष्ट होनी चाहिये, और जब स्थिति स्पष्ट होगी तो ही आपको एक मार्ग मिलेगा, नहीं तो ऐसे ही राम भरोसे झूलते रहेंगे, या तो अपने आपको पूरी तरह सौंप दो अथवा अपना स्वयं का मार्ग बनाओ और उस पर चल पड़ो, लेकिन हर स्थिति में निर्णय तुम्हें करना होगा, निर्णय से बचने का कोई मार्ग नहीं है। चाहे आप निर्णय ना लेने का निर्णय लें, चाहे आप कल निर्णय लेने को कहें, इन सब स्थितियों में भी आप निर्णय लेते ही हैं, यह आपको लगता होगा, कि आपने निर्णय नहीं लिया, लेकिन निर्णय को टालने का निर्णय ले लिया, यह आपको मालूम होना चाहिये, कि आप स्वयं को धोखा दें रहें हैं, कि आप निर्णय नहीं लिये, आपने निर्णय को टालने का निर्णय ले लिया है, यह भी एक निर्णय है, आपको निर्णय लेना ही होगा।
हिम्मत करें और अपने को बदलने का निर्णय लें, नूतन वर्ष के प्रवेश द्वार पर खड़े हो आप, जहां तक मैं जानता हूं, शायद ऐसे क्षणों में लोग नये-नये संकल्प लेते हैं, निर्णय लेते हैं, आप भी दो-चार तो ले ही लोगे, लेकिन दस-पन्द्रह दिन तक के लिये, फिर उसी धुरी पर लौट आओगे, किस बात का इंतजार है तुम्हें, क्या प्राप्त करना चाहते हो, क्यों नहीं बदलाव कि ओर बढ़ते, जीवन का काफिला पूर्णता की ओर, समाप्ति की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा है, तुम एक दम उसके निकटता की ओर बढ़ रहे हो, तुम्हें लग रहा है तुम समझदारी की तरफ, बडप्पन की तरफ बढ़ रहे हो, लेकिन मुझे दिख रहा है तुम समाप्ति की ओर बढ़ रहे हो, तुमने अपने जीवन के बहुमूल्य वर्षों को यूं ही संसार में गंवा दिया, एक नूतन वर्ष पुनः तुम्हारे समक्ष खड़ा है, और फिर झक-झोरने का, जगाने का, चैतन्य करने का अवसर दिखा तो मैं तुम्हारे दरवाजे पर आ गया, कि शायद इस वर्ष तुम्हारी तन्द्रा अवस्था टूट जाये, तुम जाग्रत हो जाओ, नववर्ष तो बहाना है, मुझे तो तुमसे मिलना है, तुम्हें समझाना है, बताना है, वास्तविकता से परिचित कराना है, नूतनता को तुम्हारे भीतर उड़ेल देना है, लेकिन तुम सोये हुये हो, तुम निर्णय लेने के लिये तैयार नहीं।
नूतन वर्ष का मेरे जीवन से कोई से कोई लेना-देना नहीं है, मैं तो केवल उस प्रत्येक अवसर पर तुमसे मिलकर, तुम्हारे भीतर ईश्वरत्व, नारायणत्व की अलख जगाना चाहता हूं, तुम्हारे भीतर ज्योति को प्रज्ज्वलित करने की अग्नि पैदा करना चाहता हूं, लेकिन तुम्हारी ओर से रिस्पान्स नहीं मिलता, आता तो मैं हर बार इसीलिये हूं, पर तुम जागते हो थोड़े समय के लिये, फिर तुम उसी तन्द्रा में, उसी नींद में सो जाते हो। इसलिये मैंने कहा हिम्मत करो, साहसिक निर्णय लो, दुविधाग्रस्त जीवन के धरातल से निकलो, आसमान की ओर देखो, तुम्हें ऊचां उठना है, गगन को अपनी बांहो में समेटना है। और तुम्हें याद होगा ही, सद्गुरु नारायण ने कहा था- हंसा उड़हू गगन की ओर यह कोई सिर्फ एक लाइन का कविता नहीं है, यह जीवन का सार है, मुक्त गगन में उड़ने का आवाहन है।
उन्होंने कहा है- तुम सभी मेरे मानस के राजहंस हो और जितना ही मेरा शरीर कई-कई वर्षों को अपने आप में मेरे स्व को संजोए हुये है, उसी प्रकार मेरा मन भी कई-कई जन्मों का साक्षी है, कि तुम मेरे मानस के राजहंस हो और मैं तुम सबसे बहुत अच्छी तरह से परिचित हूं। तुम्हारे पूर्वजो की परम्परा रही है कि तुम मानसरोवर झील में उतरो, डुबकियां लगाओ और अपने पंखों को अधिक स्वच्छ और अधिक बलशाली बनाकर मुक्त आकाश में विचरण करो। तुम कई वर्षो से इस मानसरोवर में उतरने से घबराते रहे हो, तुम्हारे मन का भय हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है और पिछले कई वर्षों से तुमने आनन्द के मुक्त गगन में विचरण करना भी छोड़ दिया है, इसीलिये तुम्हारे पंखो में उड़ने की ताकत नहीं रही, उस आनन्द के आकाश में विचरण करने की क्षमता नहीं रही, तुम्हारे पास शुभ्र श्वेत क्षमतावान पंख होते हुये भी तुम जमीन पर चलने को बाध्य हो।
नववर्ष के चेतनावान चिंतन में तुम्हें स्मरण दिलाता हूं, सद्गुरुदेव नारायण के शब्दो को जो तुम्हारे हृदय में गुंजरित होते रहते हैं, जिसकी धुन तुम कभी भी शांत-चित्त मन से बैठने पर सुन सकते हो, जिनकी गंभीर वाणी तुम्हारा आवाह्न करते हैं, जिनके स्मरण मात्र से तुम्हें सुकून और शांति मिलती है और इन सब के माध्यम से आपकी सुप्त अवस्था को जाग्रत और चेतनावान बनाने का यह एक और प्रयास है, उठो, जागो! निखिल वन्दो!! गगन की ओर, आसमान की ओर, उच्चता की ओर, परमार्थ की ओर, सिद्धाश्रम की ओर, पूर्णता की ओर जाना है तुम्हें! जीवन की विषमतायें बनी रहेंगी, इनसे लड़ते हुये आगे बढ़ो, कल पर कुछ मत टालो, कल किसने देखा है, जो भी है, आज ही निर्णय करो, नूतन वर्ष की नवीन क्रान्ति के जयघोष को अपने भीतर उतारो——-आओ साथ- साथ चलें, गगन की ओर———!!
आपको नववर्ष का मंगलमय आशीर्वाद्—–हंसते रहो—– मुस्कुराते रहो—–आगे बढ़ते रहो—–!!
सद्गुरुदेव
कैलाश चन्द्र श्रीमाली
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