





परेशानियों से मुक्ति का कोई उपाय नहीं सूझता और मदद करने वाले भी अपने हाथ खींच लेते हैं। ऐसे में अक्सर मनुष्य या तो लोगों के प्रति दुर्भावनाएं पाल लेता है या हताश हो जाता है। जितने भी श्रेष्ठ महापुरुष ऋषि, संन्यासी हुये हैं, उन्हें भी मानव योनि में परेशानियों का सामना करना पड़ा। उनसे जुड़े विवेचन बताते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में अदम्य साहस और अद्भुत धैर्य का परिचय देकर ही वे अपने व्यक्तित्व को महान बना सके हैं। धैर्य हमारे जीवन में काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, यदि हम जीवन में धैर्य रखते हैं तो सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं, यहां तक कि बड़ी से बड़ी सफ़लता भी हम धैर्यता से प्राप्त कर सकते हैं। बहुत सारे लोगों ने यह साबित किया है कि धैर्य रखकर हम अपने सारे सपनों को साकार कर सकते हैं।
धैर्य ने पोरस को अमर किया सिकन्दर से हारकर जब युद्ध बन्दी के रूप में पोरस को सिकन्दर के सामने प्रस्तुत किया गया। तो सिकन्दर ने दंभ से पूछा, तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाये? पोरस ने भी उतने ही स्वाभिमान से उत्तर दिया, वैसा ही जैसा एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिये। सिकन्दर यह उत्तर सुनकर अचम्भित रह गया। हारा हुआ राजा विश्व विजेता के सम्मुख बराबरी का दावा कैसे कर सकता है? लेकिन पोरस ने किया क्योंकि कठिन परिस्थितियों में भी उसने अपने धैर्य का दामन नहीं छोडा़ था और इसीलिए युद्ध हारने के बावजूद इतिहास में पोरस का नाम अमर हो गया।
सार्वभौकि सत्य यही है कि विफलताओं के बाद भी कोशिशों का क्रम केवल धैर्य और विश्वास के दम पर ही कायम रखा जा सकता है। संयम, विश्वास, आस्था और धैर्य से आप हार को भी जीत में बदल सकते हैं।
सुरसा भी धैर्य के सामने हार गयी हनुमान जी ने जब लंका के लिए छलांग लगाई तो रास्ते में उनका सामना सुरसा नामक राक्षसी से हुआ। सुरसा को यह वरदान था कि वो अपने शरीर को कितना भी बड़ा कर सकती थी। हनुमान जी ने सुरसा से आग्रह किया कि वो उन्हें जाने दे। सुरसा नहीं मानी। हनुमान को भी शरीर को मनचाहा विस्तार देने का वरदान था। सुरसा ने अपने मुंह का आकार जितना बढ़ाया हनुमान जी ने भी अपने शरीर का आकार बढ़ा लिया। जब सुरसा ने अपना मुंह सौ यौजन खोल दिया तो वे लद्यु रूप धारण कर मुंह से बाहर आ गए। धैर्य के साथ वे सुरसा के मुंह में समा भी गए और निकल भी आए।
जब भी आप कोई साधना आरम्भ करते हैं और उसमें आपको बार-बार असफलता ही मिलती रहे तो आप उस साधना को बीच में ही छोड़ देते हैं यानी आप धैर्य नहीं रखते है, तो उस साधना, पूजा, मंत्र जप का कोई परिणाम नहीं मिलेगा लेकिन यदि आप बार-बार अपनी साधना करते रहें, तो एक दिन सफलता अवश्य ही प्राप्त होती है। यह समस्या हम सभी शिष्य साधकों की हैं। हर किसी के जीवन में धैर्य का समावेश होना ही चाहिये।
जब भी कभी आप दीक्षा महोत्सव में गुरूधाम आते हैं, तो आप में धैर्य की बहुत कमी होती है, आप सभी एकदम से धैर्य खो देते हैं। बस एक ही रट लगी रहती है मुझे जल्दी से मिला दो, मुझे घर जाना है, मैं बहुत समय से आया हूं, हर कार्य जल्दबाजी में करना चाहते हैं। यह ही आप में सबसे बड़ी कमी है।
गृहस्थ जीवन में धैर्यवान बनकर ही परिवार में अपना विस्तार व वर्चस्व स्थापित कर पाते हैं। जब तक आप अपने जीवन में धैर्य को धारण नही करते तब तक कुछ नहीं हो सकता, सफलता आ ही नहीं सकती। ठीक उसी तरह जीवन में आप साधना भी करते हैं, तो आपका ध्यान केवल साधना के परिणाम की ओर ही रहता है। साधना का भाव-चिंतन व क्रियाशीलता किसी तरह से गतिशील बनी रहे, उस ओर आपका चिंतन नहीं जाता। इसीलिये साधनाओं में पूर्णता प्राप्त नहीं होती।
धैर्य का अर्थ है, हमारे पास न दांव पर लगाने को कुछ है, न परमात्मा को प्रत्युत्तर देने के लिए कुछ है, न सौदा करने के लिए कुछ है, देखा जाये तो हमारे पास कुछ भी नहीं है और मांग हमारी है कि हमें अप्सरा मिल जाए, लक्ष्मी सिद्ध हो जाए, काली के दर्शन हो जायें। इसके लिये प्रतीक्षा तो करनी ही पडे़गी, धैर्य तो रखना ही पड़ेगा। ऐसा नहीं कि दो-चार दिन बाद हम पूछने लगें कि- गुरु जी कुछ हुआ नहीं। जैसे छोटे बच्चे आम की गुही बो देते हैं जमीन में और दिन में चार बार उखाड़कर देख लेते हैं कि अभी तक अंकुर निकला नहीं? अधैर्य से अंकुर कभी नहीं निकलेगा। बार-बार उखाड़ने से अंकुरण नहीं होगा। ऐसा भी नहीं कि अंकुर निकलेगा ही नहीं उसके लिये धैर्य जरूरी है।
एक साधक था वह अपने गुरू की बहुत सेवा करता था। गुरु ने उससे प्रसन्न् होकर कहा कि तुझको क्या चाहिए तो उसने कहा कि मुझे खुशी चाहिए, वह भी बहुत बड़ी तो गुरुदेव ने कहा कि ठीक है। कुछ दिन बाद तेरे घर खुशी आयेगी, वह बड़ा खुश होकर अपने घर गया और उसने बहुत सारे पकवान बनाये और खुशी का इंतजार करने लगा।
एक दिन एक छोटी सी लड़की आयी और दरवाजे पर खड़ी थी उस साधक ने पूछा आप कौन तो उसने कहा मैं खुशी हूं, उस साधक ने कहा तुम तो बहुत छोटी हो, मैंने तो बड़ी खुशी मांगी हैं और उसने खुशी को निकाल दिया। वह चली गयी, कई वर्ष बीत जाने के बाद एक दिन ठीक उसी के सामने उसका गुरु भाई रहता था। उसके यहां बहुत खुशी का माहौल था। वह उसके घर गया और उसने पूछा की आपके यहां इतनी खुशी क्यों है तो उसने कहा की आज हमारी खुशी बड़ी हो गई है। तो वह उस लड़की से मिला और देखा यह तो वही लड़की है, जो उसके घर आयी थी और उसने उससे पूछा की तुम मेरे घर क्यों नहीं आयी? तो उसने कहा आयी थी पर तब मैं छोटी थी और अब मैं बड़ी हो गई हूं।
इसलिये जीवन में धैर्य होना बहुत आवश्यक है। ऐसा नही है हम कोई कार्य, साधना, मंत्र जाप करते हैं, तो सफलता नहीं मिलती है, सफलता छोटी भी हो सकती है। इसलिए जीवन में छोटी-छोटी सफलताओं को धैर्य के साथ अपनाकर ही बड़ी सफलताओं को आत्मसात किया जा सकता है। हम धैर्यहीन होकर लघु सफलताओं को भूल जाते हैं और परमात्मा से शिकायत करते हैं। अगर प्रतीक्षा हो, तो विचार शांत हो जाते हैं। जल्दी कुछ हो जाये, इसी से मन में तूफान उठते हैं। कभी भी हो जब होना हो और न भी हो, तो भी ईश्वर पर छोड़ देने का नाम प्रतीक्षा है, धैर्य हो व ईश्वर से कोई शिकायत नहीं रहे।
जिसके पास धैर्य है, उसके पास सत्य का धन तत्क्षण उपलब्ध हो जाता है। आज ही मिल जाए सत्य, अभी मिल जाए, ऐसी मन की वासना हो तो कभी नहीं मिलता और मैं प्रतीक्षा करूंगा, कभी भी मिल जाए थोड़ा ही सही जब भी उसकी कृपा हो मिल जाए, तो अभी और यहीं भी मिल सकता है, जितना बड़ा धैर्य, उतनी ही बड़ी सफलता मिलती ही है।
पंचतंत्र में कौए की कहानी आपको याद होगी। एक कौआ था, आसमान में उड़ते हुए उसे बहुत तेज प्यास लगी। अचानक उसे जंगल में एक घड़ा दिखाई दिया। वह घड़े के पास उतर आया। लेकिन उसे यह देखकर निराशा हुई की घड़े में पानी इतना नीचे है कि उसकी चोंच उस तक पहुंच नहीं सकती थी। कौए ने पास में कुछ कंकड़ों का ढ़ेर देखा और उसने एक-एक करके कंकड़ो को मटके में डालना शुरु किया। पानी ऊपर आ गया। कौए ने पानी पिया और उड़ गया। यदि वह ऐसे में धैर्य खो देता तो शायद मटके के पास रखे हुये कंकड़ों को मटके में डालने का विचार उसके दिमाग में नहीं आता और वह प्यासा ही मर जाता।
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