





कश्मीर से कन्याकुमारी तक, साक्षर से निरक्षर तक प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति हिंदी भाषा को आसानी से बोल-समझ लेता है। यही इस भाषा की पहचान भी है कि इसे बोलने और समझने में किसी को कोई परेशानी नहीं होती। पहले के समय में अंग्रेजी का ज्यादा चलन नहीं हुआ करता था, तब यही भाषा भारतवासियों या भारत से बाहर रह रहे हर वर्ग के लिए सम्माननीय होती थी। लेकिन बदलते युग के साथ अंग्रेजी ने भारत की जमीन पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है। हम हमारे ही देश में अंग्रेजी के गुलाम बन बैठे हैं और हम ही अपनी हिंदीभाषा को वह मान-सम्मान नहीं दे पा रहे हैं। जो भारत और देश की भाषा के प्रति हर देशवासियों के नजर में होना चाहिए। मातृभाषा के प्रति महात्मा गाँधी कहते थे कि हृदय की कोई भी भाषा नहीं है हृदय हृदय से बातचीत करता है और हिंदी हृदय की भाषा है यह पूर्णतः सत्य है। हिंदी में वह क्षमता है जो आँखों से बहते आंसू धारा का वर्णन इस रूप में करती है कि उसे पढ़ने वाले पाठक को आँसू बहा रहे व्यक्ति की मन स्थिति का बोध हो जाता है। क्या किसी अन्य भाषा के भाव हृदय तल तक महसूस किए जा सकते हैं? हमारी हँसी किसी भी भाषा में अभिव्यक्त हो सकती है। किंतु दूसरों की पीड़ा, दर्द और उसके विचार का अनुभव मातृभाषा में ही होता है। यह भाव से भावों को जोड़ने की एक कड़ी का कार्य करती है। समय के साथ कदमताल मिलाते हुए उन्नति और प्रगति के मार्ग पर चल सफल होना भी आवश्यक है। इसलिए अन्य भाषा का ज्ञान होना या उनका कार्य में प्रयोग करना भी आना चाहिये ये बुरा नहीं है। किंतु अपनी मातृभाषा का अपमान भी किसी भी अर्थ में सही नहीं है। इस भाषा के उपयोग पर अपमान नहीं बल्कि अभिमान जैसे भावों के संचरण की आवश्यकता है क्योंकि यह भाषा हमारी पहचान है।
हिंदी तो हमारी रग-रग में है, इससे अलग जो भी भाषा है वह हमारी नहीं है पर हमने अपना ली है। गुलामी की मानसिकता ढ़ोने की आदत जो पड़ गई है। पहले अंग्रेजों के गुलाम थे अब उनकी भाषा के हो गए हैं। कोई भाषा सीखनी या बोलनी बुरी बात नहीं है लेकिन अपनी भाषा का ज्ञान ना रहे ये उचित भी नहीं है। हिंद के दिल में निवास करती है हिंदी, हिंदी से हमारा अस्तित्व है, हिंदी भाषा के गौरव से ही हमारी पहचान है। मातृभाषा हिंदी को अंतर की गहराई से माप हम पाते हैं कि हिंदी से मूल्यवान कोई भाषा नहीं, हिंदी के शब्दों की गहराई, अर्थों का निरालापन, वाक्यों का सरलीकरण कितना उदात्त है, ये किसी से छिपा नहीं है। हिंदी जनसामान्य की भाषा है, माँ की लोरी से निकलकर हिंदी शिशु की मुस्कान में विलीन हो जाती है, पिता के क्रोध में ढलकर बच्चे का भविष्य बना देती है। मंगलसूत्र में सुहाग बचा लेती है और राखी के धागों में भाई का जीवन सुरक्षित कर देती है। कौन सा स्थान है जहाँ हिंदी नहीं है? फिर भी मातृभाषा हिंदी के लिए कहा जाता है हिंदी अपनाओ।
अर्थात् अपनी भाषा में ही हमारी प्रगति है, पश्चिमी सभ्यता अपनाकर कुछ लोग अंग्रेजी परिधानों के आवरण में लिपटकर अंग्रेजी बोलते हैं। अपने बच्चों को भी अंग्रेजी के शब्दों को बोलते देख फुला नहीं समाते हैं। बनावटीपन व कृत्रिमता जिनके रोम-रोम से प्रकट होती है वे हिंदी के महत्व को क्या समझेंगें ? जिन्हें हिंदी बोलने में शर्म और अंग्रेजी पर गर्व होता है वे आज भी कहीं ना कहीं गुलाम हैं। हिंदी के दुश्मन हैं, मातृभाषा हिंदी हमारी माँ के समान है। हिंदी हमारे माथे की बिंदिया में है, चूड़ियों की खनखनाहट में है। चुनरी के साथ लहराती है, साड़ियों की चुन्नटों में परत दर परत छिपी होती है। हिंदी हमसे अलग कहाँ है? हम इसकी उपस्थिति को नजरअंदाज कर ही नहीं सकते, हिंदी किसानों की भाषा है, कमजोरों की ताकत है। ये स्वाभिमान है हमारा, अभिमान है।
हिंदी समृद्ध और मधुर भाषा है, सरल है, भावों से भरी है, हर किसी के हृदय को स्पर्श करने की क्षमता है इसमें, अंग्रेजी कविताओं से खुश होने के साथ-साथ हिंदी की प्राथमिकता पर भी बल दें। वर्णमाला के कम होते ज्ञान से परिचय कराएं, हिंदी की महत्ता को बताएं। आलीशान स्कूलों की होड़ में अंग्रेजी माध्यम के पीछे दौड़ने वालों के कदम हिंदी की ओर मुड़ने चाहिए। देश की मातृभाषा को माता के समान ही गौरव मिलना चाहिए। परिवार में माता-पिता ही हिंदी की गरिमा को नहीं समझेंगे तो बच्चों की रुचि कैसे जगाएंगे? बात-बात में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करने वाले ना अंग्रेजी के निकट हो पाते हैं ना हिंदी के ज्ञान से परिपक्व। भाषा कोई भी हो बोलने में हर्ज नहीं लेकिन प्रमुखता अपनी ही भाषा को दें। अपनी भाषा की नैतिकता पर आँच आए ये असहनीय है। आज हिंदी भाषा कहीं ना कहीं सिसकिती दिखाई देती है। उसके दर्द को अपने सीने में महसूस करें, उसकी कराह को सुने, हिंदुस्तान में रहकर हिंदी का प्रयोग करने में कैसी आनाकानी? हिंदी हमारी रगों में दौड़ता लहु है, हर पड़ोस का दर्द है, बच्चे की किलकारी है। हिंदी में गंगा की लहरों सी पवित्रता है, यमुना की श्यामलता है। हिंदी अनंत विशाल आकाश है।
गर्व में भरकर हम भले ही अंग्रेजी को प्रमुखता देते हो पर हमारा सम्मान हिंदी भाषा के सम्मान में ही है। कई बार तो अंग्रेजी माहौल में बड़ी घुटन होती है जैसे सब मुखौटे लगाए हुए है, तब गांव की चौपाल के हिंदी ठहाके बड़े अच्छे लगते हैं। पणिहारिनों के गीत बड़े प्यारे लगते हैं। लगता है हिंदी यहीं सिमट गई है लेकिन हिंदी का रास्ता बहुत लंबा है। राष्ट्र भाषा का गौरव प्राप्त हिंदी भाषा को 14 सितंबर 1949 को केन्द्र सरकार की अधिकारिक भाषा के रुप में माना गया। हिन्दुस्तान में हिंदी बोलने वाले हर क्षेत्र से हैं इसलिए हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला और 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। सभी हिंदी की महत्ता को समझें और हिंदी भाषा की उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहें।
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