





यह कोई छोटी यात्रा नहीं है कि खींच-तान कर पूरी कर ली जाए। यह तो श्वास जैसी सहज हो जाए तो ही पूरी हो सकती है।
तो अगर बुद्धि- केंद्रित व्यक्ति भूल से भी प्रेम के मार्ग पर पड़ गया तो भटकेगा, पहुँच न सकेगा। उसके लिए ध्यान ही मार्ग है। ध्यान है बुद्धि का धीरे-धीरे निराकार-निर्विकार हो जाना।
ध्यान की परिपूर्णता पर समाधि प्रकट होगी, व्यक्ति मिट जाएगा और इस तरह के साधक के जीवन में प्रेम का आविर्भाव होगा। ध्यान से चलने वाला साधक प्रेम से शुरूआत नहीं करेगा, प्रेम पर उसका अंत होगा। ध्यान से शुरूआत करेगा, समाधि पर पहुँचेगा। ध्यान होगा मार्ग, समाधि होगी मंजिल, प्रेम होगा परिणाम। अंततः अचानक वह पायेगा, उसके जीवन में चारों तरफ प्रेम फैलने लगा। लेकिन वह आखिर में घटेगा।
जो हृदय-केंद्रित व्यक्ति है, भाव-केंद्रित व्यक्ति है, जिसके जीवन में विचारों का ऐसे भी कोई बहुत मूल्य नहीं है, जिसकी बुद्धि गौण है, जो जीता है भावनाओं से, संवेदनाओं से, जिसके हृदय पर आघात पड़ता है, जिसके जीवन का संबंध सीधा हृदय से है, सोचता कम है, भावता ज्यादा है, वैसा व्यक्ति प्रेम से ही शुरू कर सकेगा। उसने अगर ध्यान से शुरू करने की कोशिश की तो उसका रास्ता भटकेगा। वह लाख उपाय करे ध्यान करने का, उसमें उसे सफलता न मिलेगी। वह चेष्टा ही रहेगी। वह लाख उपाय करे मन को शांत करने का, मन उसका इतना अशांत है ही नहीं कि वह उसे शांत कर सके। उसे तो हृदय की ऊर्मि को जगाना होगा। उसे ध्यान की बजाय प्रार्थना, पूजा, अर्चना और प्रेम के रूप ज्यादा सहज मालूम होंगे। उसकी आँख से आंसू बहेंगे, तब उसके भीतर सन्नाटा होगा। उसके पैर नाचेंगे, तब उसके भीतर सन्नाटा होगा। जब वह किसी के प्रेम में मदमस्त होगा, तभी उसके भीतर ध्यान लगेगा। उसका ध्यान लगेगा। उसका ध्यान सीधा नहीं हो सकता कि वह शांत बैठ जाए और ध्यान लग जाए। उसका ध्यान परमात्मा के माध्यम से होगा। उसे कोई चाहिए प्रेमपात्र के बिना उसके हृदय में शांति न होगी।
तो अगर प्रेम के मार्ग से चलने वाले व्यक्ति को ध्यान आकर्षित कर ले तो अड़चन होती है। वह असहज होगा। वह बात जमेगी ही नहीं। वह मार्ग उसका है नहीं। उसे प्रेम से ही चलना होगा।
प्रेम से जो चलेगा वह अनायास समाधि को उपलब्ध होगा। लेकिन यह समाधि उसकी भाव-समाधि होगी। और ऐसे व्यक्ति को ध्यान परिणाम में मिलेगा। ऐसे व्यक्ति को जो निर्विचारता है, वह परिणाम में मिलेगी। समाधि में जब वह तल्लीन हो जाएगा, तब अचानक पायेगा कि जिस ध्यान को साध-साध कर नहीं साध पाया, वह अपने आप सध गया है।
प्रेम से जो चलता है, ध्यान उसके लिए परिणाम में मिलता है। ध्यान से जो चलता है, प्रेम उसे परिणाम में मिलता है और दोनों से चलने वाले को समाधि तो सुनिश्चित मिलती है।
सवाल यह नहीं कि कौन सा मार्ग ठीक है-प्रेम का या ध्यान का। दोनों मार्ग ठीक है और दोनों मार्ग गलत है। सवाल तुम्हारा है। तुम्हें जो ठीक लग जाए दो में से। और एक ही ठीक लगेगा, दोनों ठीक नहीं लग सकते है। जो तुम्हें ठीक लग जाए वह ठीक है। जो ठीक न लगे वह ठीक नहीं है। तुम भूल कर भी दूसरे की झंझट में मत पड़ना। दूसरे को भला ठीक लग रहा हो, इससे तुम परेशान न होना। दूसरों के वस्त्र मत ओढ़ना। दूसरों से उधार मत लेना अपनी जीवन-दृष्टि को। ठीक-ठीक अपने को ही पहचानने की कोशिश करना। इसलिए स्वाध्याय – चाहे भक्त बनना हो, चाहे साधक बनना हो-स्वाध्याय सभी के लिए अनिवार्य हैः स्वयं का अध्ययन। ताकि तुम्हें ठीक-ठीक पता हो जाए, तुम किस प्रकार के व्यक्तित्व हो। वह पहली बात ठीक से पता चल जाए तो फिर सब सुलभ हो जाता है, सब आसान हो जाता है।
जीवन में सबसे बड़ी बात पहले कदम को ठीक-ठीक उठाना है। आखिरी कदम तो पहले कदम के सिलसिले में आ जाता है। लेकिन अगर पहले कदम पर भूल हो गई तो आखिरी कदम कभी भी नहीं आता। तो पहला कदम ही आखिरी कदम है। अगर वह बिलकुल ठीक उठ गया, तुम्हारे अनुकूल उठ गया, रास आ गया, तुम्हारा जोड़ बैठ गया, तुम्हारे भीतर की वीणा बजने लगी, ठीक जगह चोट पड़ गई, भीतर के जलस्त्रोत फूट पड़े, तो मंजिल दूर नहीं है। मंजिल अपने आप आ जाएगी। अब तुम बहे जाओ। तुम पहले कदम में ही बहे जाओ। उसी में डूबे चले जाओ।
पहले कदम पर सर्वाधिक सावधानी की जरूरत है और वहीं लोग असावधानी करते है। वहीं न मालूम किस-किस कारणों से लोग मार्ग चुन लेते है। तुम किसी घर में पैदा हुए। हो सकता है घर परंपरा से भक्ति संप्रदाय को मानता हो, तो तुमने भी भक्ति को शुरू कर दिया। अगर यह तुम्हारे लिए योग्य न था, तो तुम जीवन भर भटकोगे। अनंत जीवन भटक सकते हो और मंजिल न मिलेगी।
मनुष्य-जाति को भटकाने में जन्म के द्वारा धर्म की धारणा ने बहुत बड़ा हाथ बंटाया है।
तुम भाव वाले व्यक्ति हो, किसी ऐसे घर में पैदा हो गए जो ध्यान की परंपरा का भरोसा करता है, तुम मुश्किल में पड़ोगे। क्योंकि तुम चुनाव इस तरह करोगे कि पिता का धर्म क्या है।
अब पिता के धर्म से बेटे के धर्म का कोई लेना-देना नहीं है। माँ के धर्म से बेटे के धर्म का कोई लेना-देना नहीं है। बेटे को अपना धर्म खोजना होगा। स्वधर्म की खोज करनी होगी। वह स्वाध्याय से होगी। वह कोई जाकर जन्म के दफ्तर को, जन्म की रजिस्ट्री को देख लेने से नहीं हो जाती। तुम कहां पैदा हुए हो, इससे तुम्हारे किस धर्म में आविर्भाव, तुम्हारा उत्थान, तुम्हारे जीवन की क्रांति होगी, इसका कोई पता नहीं चलता।
तुम जैन धर्म में पैदा हुए तो भक्ति की तुम्हारे जीवन में कोई धारणा न होगी, क्योंकि वह मार्ग ध्यानियों का है। अब तुम उलझन में पडोगे। अगर तुम उस मार्ग पर चले तो तुम्हारा तालमेल न बैठेगा। अगर न चले तो तुम्हें अड़चन होगी कि मैं मार्ग में च्युत हो रहा हूँ। अगर तुम कृष्ण के मंदिर में गए और नीचे तो तुम्हें ग्लानि होगी कि मैं महावीर को छोड़ कर कृष्ण के साथ जा रहा हूँ। तुम्हें अंतपीड़ा होगी। क्योंकि बचपन से तुम्हारे मन में जो धारणा डाली गई है, उस धारणा ने काफी जगह बना ली है। वह धारणा कहती है कि यही करना ठीक है और कुछ करना गलत है। अगर तुम उसी धारणा को मान कर चलो तो जीवन में तृप्ति नहीं मिलती। जहां तृप्ति मिलती है वहां लगता है अपराध हो गया, यह तो उचित नहीं है।
दो बातें बहुत महत्त्वपूर्ण हैः ध्यान या भक्ति, ध्यान या प्रेम। और आधी मनुष्यता ध्यान से जाएगी, आधी मनुष्यता प्रेम से जाएगी। अनुपात बराबर होगा। विशेषकर स्त्रियां भाव से जाएंगी, पुरूष ध्यान से जाएंगे। सामान्यतया यह कह रहा हूँ। क्योंकि पुरूषों में बहुत होंगे जो भाव वाले होंगे, स्त्रियों में भी बहुत होगी जो ध्यान वाली होगी। लेकिन मोटे अर्थो में स्त्रियां भाव से जाएंगी, पुरूष ध्यान से जाएंगे। क्योंकि पुरूष मूलतः सक्रियता, कुछ करना, उस पर भरोसा करता है। प्रेम तो ना-करना है। वह निष्क्रिय है। वह प्रतीक्षा है। वह स्त्री के लिए सुगम है।
कृष्ण ने कहा है, स्वधर्मे निधनं श्रेयः। अपने धर्म में मर जाना भी बेहतर।
इसको अगर कोई गौर से समझ ले तो यह बड़ी गहरी मनोवैज्ञानिक बात है जो कृष्ण ने कहीं। स्व को पहचानना, स्वधर्म को पहचानना। उसमें चलते-चलते मृत्यु भी मिले तो भी अमृत जैसी होगी और दूसरे के धर्म में चलते-चलते अमृत भी मिले तो जहर सिद्ध होगा। क्योंकि जो तुमसे मेल न खाएगा, वह तुम्हें मुक्त नहीं कर सकता है। जो तुमसे इतना मेल खा जाएगा कि तुममें और उसमें जरा भी फासला न रहेगा, वही तुम्हारी मुक्ति बन सकता है।
एक कहानी है कि एक पहाड़ के पास एक झील है और उस झील के पास जब भी कोई साधक पहुँच जाता है और आग्रह करता है झील से और आग्रह अगर वस्तुतः प्रामाणिक होता है, तो झील से उत्तर मिलते है।
एक साधक वर्षो की तलाश के बाद अंततः उस झील के पास पहुँच गया। और उसने चिल्ला कर जोर से पूछा कि मेरा एक ही सवाल हैः जीवन क्या है? झील चुप रही। लेकिन वह पूछता ही गया। कहते है तीन दिन अहर्निश, रात और दिन उसने एक कर डाले। एक ही सवाल कि जीवन क्या है? आखिर झील के देवता को भी झुकना पड़ा और उसने कहा कि तेरी निष्ठा पूरी है। तू कोई साधारण कतूहल से नहीं आया। तू साधारण जिज्ञासू भी नहीं है, तू मुमुक्षु हैः इसलिए तेरे प्रश्न का उत्तर हम देते हैः जीवन एक वीणा है।
उस आदमी ने कहा, और पहेलियां अब नहीं चाहता। सीधा-सीधा उत्तर दो। मैं कोई संगीतज्ञ नहीं हूँ। वीणा मैंने अपने जीवन में अभी तक देखी भी नहीं। सुना है नाम, लेकिन मुझे जीवन का भी पता नहीं, वीणा का भी पता नहीं। अब यह एक और उलझन हो गई। अभी मैं जीवन को हल करता रहा, अब वीणा का भी पता लगाऊं! तुम मुझे सीधा-सीधा ही कह दो।
झील ने कहा, उत्तर दे दिया गया है।
तो उस आदमी ने कहा, थोडे संकेत दो जिससे कि मैं रास्ता खोजूं।
तो झील से उत्तर आया कि तू गांव में जा और पहली तीन दुकानों पर गौर से देख। और जो भी तू पाए, लौट कर उत्तर दे।
वह आदमी गया। उसने पहली दुकान पर देखा, वहां कुछ भी न था, लोहे-लंगर की दुकान थी, धातुओं के अलग-अलग तरह के रूप-रंग के ढेर लगे थे। वह कुछ समझा नहीं कि जीवन से इसका क्या लेना देना! दूसरी दुकान पर गया। वह एक तारों की दुकान थी। वहां भी उसको समझ में नहीं आया कि जीवन से तारों का क्या लेना-देना? तीसरी दुकान एक बढ़ई की दुकान थी।
वह बड़ा नाखुश लौटा। उसने सोचा कि इससे तो हम पहले ही बेहतर थे। इस झील से पूछने के पहले ही बेहतर थे। कम से कम इस तरह की मूढ़ता तो दिमाग में न थी। इससे जीवन का क्या लेना-देना? यह तो ज्ञान न मिला और अज्ञानी हो गए। लौट कर नाराज आया और उसने झील से कहा कि यह-यह मैने देखा। पर इससे जीवन का क्या संबंध है?
झील ने पुनः कहा कि जीवन एक वीणा है। अब तू इस सूत्र को पकड़ ले और इसकी खोज कर।
वर्षो बीत गए। वह आदमी करीब-करीब भूल ही गया वह खोज-जीवन का वीणा होना। एक दिन अचानक एक बगीचे के पास से गुजरते वक्त उसने किसी को वीणा बजाते सुना। वह स्वरलहरी उसे खींच ली। वह खिंचा हुआ जादू के वश बगीचे के भीतर पहुँच गया।
कोई कलाकार वीणा बजा रहा था। साधक को पहली दफा दिखाई पड़ा कि वही तार है जो दुकान पर पड़े थे। वही धातुएं है जो दुकान पर पड़ी थी, वीणा में लग गई। और उस बढ़ई ने भी काम किया है। लकड़ी का भी इंतजाम है।
आज उसे सूत्र साफ हुआ। आज उसे साफ हुआ कि जीवन एक वीणा है। लकड़ी भी है, तार भी है, धातुएं भी है, अलग-अलग पड़े है। कोई संगीत पैदा नहीं होता। तीनों जुड़ जाएं, एक ढंग में बैठ जाएं, तालमेल आ जाए, तो संगीत उठ सकता है। इतना अद्भूत संगीत उठ सकता है-निराकार! इतना प्राणों को मोहित कर लेने वाला संगीत उठ सकता है। ऐसी जादूभरी रहस्यपूर्ण घटना घट सकती है।
मैं भी तुमसे यही कहता हूँः जीवन एक वीणा है। लेकिन तुम्हें अपनी वीणा जमानी है। दूसरों की नकल मत करना। उन्हें अपनी वीणा जमानी है। वीणाएं बहुत तरह की हैं और हरेक व्यक्ति के पास अपने तरह की वीणा है और अपने ही तरह का छिपा हुआ संगीत है।
तुम अपनी वीणा को बजाते हुए मर जाओ तो भी तुम महाजीवन को उपलब्ध हो जाओगे। तुम दूसरे की वीणाओं को ढोते-ढोते मरोगे, उनसे कितना ही सुंदर संगीत पैदा हो, तुम कोरे ही आए, कोरे ही जाओगे। तुम्हारे हाथो में कोई संपदा न होगी। तुमने जीवन व्यर्थ ही गंवाया।
और इस संसार में बड़े से बड़ा खतरा यही है कि कहीं तुम दूसरे के प्रभाव में न पड़ जाओ। तुम प्रभावित होने को बिलकुल तैयार बैठे हो। क्योंकि अपनी वीणा को जमाना दुष्कर काम है। उधार वीणा ले लेना बहुत सरल बात है। खुद खोजना, स्वाध्याय करना, जोखम से भरी बात है। भूल-चूक हो सकती है। दूसरे से ज्ञान उधार ले लेना जोखमरहित है, सुरक्षित है। और अगर कभी उलझन भी हो जाए तो जिम्मेवार दूसरा होगा। तुम्हें कोई पीड़ा न होगी कि मैने कोई भूल की।
तुम एक गुरू को पकड़ लेते हो। तुम सोचते हो, समर्पण किया। समर्पण सौ में से कभी एकाध शिष्य करता है। निन्यानवे तो धोखा कर रहे है। निन्यानवे समर्पण नहीं कर रहे है, सिर्फ गुरू को उत्तरदायित्व दे रहे है कि अब अगर भटके हम, तुम जिम्मेवार। वे यह नहीं कर रहे है कि हम समर्पण करते है अपने को। वे यह कह रहे है कि अब देख लो। अब खयाल रखना। भटके हम, जिम्मेवार तुम। डूबेंगे हम, बदनामी तुम्हारी होगी। अब तुम्ही बचाना, नहीं तो तुम्हीं फंसोगे।
कहीं जीवन के दायित्व इस तरह टाले जा सकते है? गुरू से सीखा जा सकता है, लेकिन गुरू पर दायित्व नहीं टाला जा सकता। गुरू से मार्ग समझा जा सकता है, लेकिन गुरू का मार्ग उधार नहीं लिया जा सकता। गुरू से संकेत लिए जा सकते है, इशारे लिए जा सकते है, ताकि तुम्हें तुम्हारे स्वाध्याय में सुविधा हो जाए।
तो वास्तविक गुरू तुम्हें जीवन का ढंग नहीं देता, वास्तविक गुरू तुम्हें सिर्फ दीया देता है, ताकि तुम अपने जीवन में अपने ढंग को खोज लो।
इस फर्क को याद रखना। वास्तविक गुरू तुम्हें अनुशासन नहीं देता, आचरण नहीं देता, तुम्हें अंतकरण का जागरण देता है। तुम्हें होश देता है, ताकि तुम अपने को पहचान कर अपना रास्ता बना लो।
जिस गुरू ने तुम्हें मार्ग पकड़ा दिया वह तुम्हारा दुश्मन है। कोई सद्गुरू मार्ग नहीं पकड़ाता। सद्गुरू केवल मार्ग की पहचान देता है। वह कहता है, वह पहचान है।
इस फर्क को ठीक से समझ लेना, बारीक है। असद्गुरू तुम्हारे हाथ में देता है और वह कहता है, यह रहा सोना, सम्भालों। इसको खो मत देना। इसको सम्भाल कर रखना, बहुमूल्य है। सद्गुरू तुम्हें देता है कसौटी का पत्थर, सोना नहीं देता। वह कहता है, यह कसौटी का पत्थर, जहां कहीं सोना मिले, कस लेना। ठीक उतरे तो समझना ठीक है, गलत उतरे तो समझना कि गलत है।
लेकिन सद्गुरू केवल कसौटी देता है कि जीवन में जहाँ भी जरूरत हो, कस लेना, सोने को तुम पहचान लोगे और ध्यान रखना, मानों सोने से छोटा सा कसौटी का पत्थर ज्यादा बहुमूल्य है।
प्रज्ञा देता है तुम्हें सद्गुरू-पहचानों की। बंधा हुआ आचरण नहीं देता, स्वतंत्र बोध देता है। स्वधर्म ही मार्ग है। सद्गुरू तुम्हें इतनी सी सूचनाएं देता है कि ऐसे-ऐसे स्वधर्म को खोजा जाता है। ऐसे-ऐसे मैने अपना स्वधर्म खोजा, ऐसे-ऐसे तुम भी तुम्हारा स्वधर्म खोज लेना।
प्रेम का अर्थ है, देने की क्षमता और देने की क्षमता उसी में हो सकती है जिसके पास हो। तुम वहीं दे सकते हो जो तुम्हारे पास है।
प्रेम जीवन का दान है।
जब भी तुम प्रेम से किसी की तरफ देखते हो, तुम उसके जीवन में हजार चाँद जोड़ देते हो। जब भी तुम प्रेम से किसी का हाथ, हाथ में लेते हो, तुम उसके बुझते दीये को फिर ज्योति दे देते हो। जब भी तुम प्रेम से किसी को गले लगा लेते हो, तब तुमने उसके आयुष्य को बढ़ा दिया।
प्रेम अदृश्य जीवन है। इसलिए जब भी तुम्हें ऐसा लगता है, तुम्हें कोई प्रेम करने वाला नहीं, तुम किसी को प्रेम करने वाले नहीं, तुम्हें आत्मघात का विचार आ जाता है। आत्मघात का विचार ही तब उठता है जब तुम पाते हो जीवन में प्रेम नहीं है। जहाँ प्रेम नहीं है, वहाँ मरने की धारणा उठने लगती है कि मिट जाओं! अब सार क्या है? अब होने का अर्थ क्या है? प्रयोजन क्या है? अब जीना किसलिये है?
जब भी तुम्हारे मन में आत्महत्या का भाव उठता हो- और ऐसा आदमी खोजना कठिन है जिसको न उठा हो- तो तुम विचार करनाः कब उठता है यह भाव?
तुम सदा पाओगे कि प्रेम जब नहीं होता जीवन में, तभी उठता है। तब बात साफ हो जाती है कि प्रेम जीवन है। प्रेम का अभाव मृत्यु को पास लाने लगता है।
तुमने कभी खयाल किया कि तुम बीमार पड़े हो, और अगर चिकित्सक तुम्हारे प्रति अति प्रेमपूर्ण है, तो औषधियां शीघ्रता से काम करती है। और चिकित्सक अगर सिर्फ उपेक्षा से भरा है, एक पेशेवर की तरह आता है और देख कर चला जाता है, तटस्थ है, तुम्हारी तरफ उसका कोई ध्यान नहीं है, बीमारी और दवा, इसमें उसका विचार है, लेकिन तुमसे कुछ लेना-देना नहीं है, तुम हो या नहीं, इससे कोई संबंध नहीं है, यंत्रवत तुम्हारे साथ व्यवहार करता है, तुम्हारी बीमारी लंबी हो जाएगी। जो बड़े से बड़े चिकित्सक हुए है दुनिया में, उन सभी के संबंध में यह बात है कि उनकी दवा से ज्यादा उनके हाथ में गुण है। हाथ में गुण का क्या मतलब होता है? हाथ में गुण का मतलब यह है कि दवा गौण है, जिस ढंग से वे देते है, वह महत्त्वपूर्ण है। उस देने में वे कुछ और भी देते है।
कभी तुमने खयाल किया कि तुम बीमार हो, चिकित्सक आया- अगर वह प्रेमपूर्ण है, तो उसने अभी दवा भी नहीं दी है, तुम्हारी जाँच ही की है, लेकिन जाँच में ही तुम्हारी बीमारी आधी हलकी हो जाती है। निरीक्षण करोगे तो साफ हो जाएगा। क्योंकि अभी दवा नहीं दी गई, इसलिए चिकित्सक ने कुछ किया तो है नहीं, सिर्फ नब्ज ली, हृदय की धड़कन सुनी, लेकिन उसका ढंग, उसका प्रेमपूर्ण व्यवहार, उसका आश्वस्त भरोसा कि तुम ठीक हो जाओगे, उसका तुम्हारे प्रति इतनी उत्सुकता से निरीक्षण करना कि तुम मूल्यवान हो, तुम्हारा बचना जरूरी है- तुम्हारे भीतर कोई चीज बदल गई। अब तुम उतने बीमार नहीं हो। अभी चिकित्सक ने कुछ किया भी नहीं है, लेकिन चिकित्सा शुरू हो गई।
ऐसे प्रयोग किए गए है कि प्रेमपूर्ण चिकित्सकों ने सिर्फ पानी दिया है और बीमार ठीक हो गए है और तटस्थ चिकित्सकों ने कीमती से कीमती दवाएं दी है और मरीज पर परिणाम नहीं हुआ है। पानी भी संवाहक हो जाए अगर प्रेम का, तो औषधि हो जाती है। स्वर्ण-भस्में भी दी जाएं और प्रेम का हाथ पीछे न हो, तो शरीर पर केवल बोझ-रूप हो जाती है, औषधि नहीं बनतीं।
अब तो वैज्ञानिक कहते है, वृक्षों- पौधों को भी अगर तुम प्रेम से देख लो तो उनकी बढ़ती तेज हो जाती है। अगर तुम रोज उसे पौधे को आशीर्वाद के भाव से देख लो, उसके लिए प्रार्थना करो परमात्मा से, तुम पाओगे कि दूसरे पौधे पीछे रह गए। जिस पौधे के लिए तुमने रोज-रोज प्रार्थना की वह दुगुना हो गया। कम दिनों में उसमें फूल आ जाएंगे। असमय में फल भी लग सकते है।
सद्गुरूओं के प्रेम के नीचे शिष्य परमात्मा को उपलब्ध हो गए है। बिना कुछ किए भी कभी यह घटा है और कभी-कभी बहुत कुछ करने पर भी, अगर सद्गुरू की प्रेम-छाया न हो, तो कुछ भी नहीं घटा है। इसलिए तो समर्पण का इतना मूल्य है। समर्पण का कुल इतना ही अर्थ है कि गुरू के जीवन से जो प्रेम की धारा बह रही है, उसके लिए तुम दीवार मत बनो, दरवाजा बन जाओ। उसे आने दो, ताकि वह तुम्हें रूपांतरित कर दे।
प्रेम जीवन है। प्रेम से रहित जीवन का कोई अर्थ नहीं है। और प्रेम से भरी हुई मृत्यु भी सार्थक हो जाती है। प्रेम से भरी मृत्यु में भी एक काव्य प्रकट होता है-अलौकिक। और प्रेम से रहित जीवन में एक दुर्गंध होती है, एक सड़ांध होती है। आदमी जीता है, लेकिन जीता नहीं। भीतर कुछ भी नहीं है। भीतर सब खाली है।
तुम्हारे अनुभव से भी जानते हो कि जब भी तुमने प्रेम किया है, तभी तुम्हारे भीतर एक पुलक उठी है, एक लपट उठी है। तुमने जीवन को उसकी चरमता से जाना है। तुम्हारे भीतर मशाल दोनों तरफ से एक साथ जलने लगी है। एकदम आलोकित हो गया है सब। कभी-कभी क्षण भर को ऐसा हुआ है, लेकिन फिर भी बिजली कौंध गई है।
और जब तुम्हारे जीवन में कोई प्रेम न रहा, एक रोजमर्रा की आदतन जिंदगी रही-उठना है, बैठना है, दफ्तर जाना है, कमाना है-कर्तव्य तो रहे, प्रेम न रहा, तभी तुमने पाया कि तुम्हारे भीतर कुछ मर गया है। तुम खिंचे जा रहे हो, चले जा रहे हो, लेकिन अब चलने में नृत्य नहीं है। बोलते हो, लेकिन बोलने में अब गीत नहीं है। देखते हो, लेकिन आँखों से कुछ बरसता नहीं। आँखे कोरी और खाली है। छूते हो, लेकिन स्पर्श में ऊष्मा नहीं है। ऐसे छूते हो जैसे किसी ने मुर्दे का हाथ छू लिया हो, ठंडा है, उसमें कोई भाव-दशा नहीं है, कोई लहर नहीं है, कोई स्पंदन नहीं होता। एक ठूंठ की तरह हो गए हो, जिसमें न अब पत्ते लगते है, न फल आते है, न फूल खिलते है, न पक्षी जिस पर घोंसला बनाते है, न राहगीर जिसके नीचे बैठ कर विश्राम करते है। एक ठूंठ की तरह तुम खडे़ हो। प्रतीक्षा में हो कि कभी कोई लकड़हारा आएगा, काट कर ले जाएगा, झंझट मिटेगी।
प्रेम है दान और मजा यह है कि जितना तुम देते हो, उतना बढ़ता है तुम्हारे भीतर और जितना तुम रोकते हो, उतना सड़ जाता है। जैसे कुआं भरा है, मत खींचो पानी, मत उलीचो पानी। सड़ जाएगा और इस बुरी तरह सड़ जाएगा कि सब झरने धीरे-धीरे धूल धवांस से भर जाएंगे, बंद हो जाएंगे। उलीचो और रोज झरने नये पानी को ले आते है। कुआं चुकेगा नहीं। तुम जितना उलीचोगे, उतने ही नये जलस्त्रोत आते जाएंगे।
ऐसा ही जीवन का कुआं हो तुम। अगर दोगे, बांटोगे, उछालोगे, कृपणता न करोगे जीवन की, जहां भी मौका पाओगे उलीचोगे अपने को, बांटोगे, दोगे, तुम पाओगे नये जलस्त्रोत तुम्हारे खुलते जाते है। तुम एक दिन पाओगे कि तुम कुआं नहीं, सागर हो।
कुआं है क्या आखिर? कुआं सिर्फ एक खिड़की है जिससे झांक रहा है। नीचे तो कुआं सागर से जुड़ा है, अनंत-अनंत झरनों से जुड़ा है। कुआं एक झरोखा है, जहाँ से सागर ने झांका है। घबराओं मत, तुम भी एक झरोखे हो, जहाँ से परमात्मा ने झांका है। डरो मत। तुम भी जुड़े हो। उलीचो और तुम पाओगे कि तुम बढ़ते हो। रोको और तुम पाओगे कि तुम घटते हो और सड़ते हो और एक दुष्टचक्र है। अगर तुमने रोका, न बांटा, प्रेम न दिया, तो तुम डरने लगोगे कि वैसे ही तो सड़ा जा रहा है सब, वैसे ही तो सब चूका जा रहा है, अगर दिया तो और मुसीबत होगी और कम हो जाएगा। तुम और घबरा कर रोक लोगे। जितना रोकोगे, उतना ही कम होता जाएगा, सूखते जाओगे।
हिम्मत करो। देकर देखो और तुम पाओगे, जैसे ही तुमने दिया, कोई जलस्त्रोत खुल गया, झरना सक्रिय हो गया और जल आने लगा। तब तुम पाओगे कि देते जाओ, बढ़ता जाता है। तब तुम बात ही छोड़ दोगे रोकने की। तुम देने में लग जाओगे।
उलीचने में प्रेम है। प्रेम है अपने आनंद को बांटना।
पर आनंद तुम्हारे पास हो तभी न! तुम्हारे पास अभी दुःख है। अगर तुम देने भी जाते हो तो दूसरे को दुःख ही देते हो। प्रेम के नाम पर भी तुम दूसरे को दुःख ही देते हो। तुम्हारे पास कुछ और है नहीं। तुम्हारे पास आत्मा तो नहीं है कि तुम दे सको। तुम्हारे पास एक गहन अंधकार है, वही तुम दे आते हो। दूसरे के मार्ग में वैसे ही बहुत अड़चनें थी, तुम और थोड़ी अड़चने बड़ा देते हो। दूसरा वैसे ही मुश्किल में पड़ा था, तुम्हारी मुश्किल का और बोझ बढ़ जाता है। प्रेम के नाम पर तुम मुक्त थोडे़ ही करते हो, बांधते हो। प्रेम के नाम पर तुम दूसरे के गले में फांसी लगाते हो। पंख नहीं देते कि दूसरा भी खुले आकाश में उड़ सके। पर जो तुम्हारे पास नहीं है वह तुम दोगे कैसे?
इसलिए मैं कहता हूँ, पहले स्वयं को खोजो, पहले स्वयं को पहचानो, पहले स्वयं को बढ़ाओ, पहले स्वयं को विकसित करो, प्रौढ़ करो, पहले स्वयं की संपदा में नये-नये फल लगने दो, कुछ घटने दो भीतर, तो तुम बांट सकोगे।
मनुष्य-जाति की बड़ी से बड़ी भूलों में से एक भूल यह है कि प्रत्येक व्यक्ति यही सोचता है कि प्रेम करने की क्षमता उसे जन्म से ही मिली है। इस भूल ने जितना नुकसान किया है, किसी और भूल ने नहीं किया। हर आदमी यही सोचता है कि प्रेम तो जन्मजात मिला ही हुआ है। पैदाईश से ही हम प्रेम करने की कला जानते हुए आए है। इसलिए अगर प्रेम नहीं घट रहा है तो दूसरे की कोई भूल होगी। हम तो प्रेम करने में समर्थ ही है।
अगर इस गलत तर्क में तुम पड़ गए तो भटक जाओगे। प्रेम सीखना पड़े। प्रेम अद्भूत कला है। उसमें कोई सूक्ष्म कला नहीं। उससे ज्यादा कोई अदृश्य शिल्प नहीं। बड़ी सूक्ष्म है। तुम सीखोगे धीरे-धीरे तो ही खयाल में आएगी। बड़ा नाजुक गीत है, उसे गाने के लिए कंठ को साधना होगा। तुम भर्राए गले से उसे न गा सकोगे, अन्यथा गीत मर जाएगा।
संवेदनशीलता बढ़ाओं और तुम्हारी प्रेम की कला बढ़ती जाएगी। चट्टान पर भी बैठो, तो चट्टान को स्पर्श करो, छूओ, दोस्ती बनाओ। आसान है आदमी की बजाय। क्योंकि आदमी के साथ तो अहंकार खड़ा हो जाता है। वृक्ष के पास जाओ, उसे गले लगाओ। थोड़ी देर वृक्ष के कंधे पर सिर रख कर रूक जाओ। किसी आदमी के कंधे पर सिर रखने में तुम्हें अड़चन होगी। पता नहीं, वह इनकार कर दे, अस्वीकार कर दे। अस्वीकार का एक भय है। तुम प्रेम का निवेदन लेकर जाओ और वह कह दे कि हटो भी! क्या बकवास लगा रखी है! क्या समझा है, यह मेरा कंधा है या कोई विश्राम करने की जगह? कि तुम किसी को गले लगाने जाओ और वह हटा दे दूर।
लोग प्रेम करने को पैदा हुए है और प्रेम से भयभीत है। लोग बिना प्रेम के जीवन की गहनता को न जान पाएंगे और प्रेम से भयभीत है। लोग बढ़ना चाहते है, प्रेम करना चाहते है, लेकिन डर है अस्वीकार का। चोट लगेगी। उससे बेहतर अकेले जी लेना है। कम से कम किसी को चोट देने का मौका तो नहीं दिया, अपमान तो नहीं हुआ।
इसलिए तुमसे कहता हूँ कि चट्टान से, वृक्ष से-वे तुम्हें इनकार न करेंगे और वे उतने ही प्रेम के लिए आतुर है जितना कोई और और उनसे तुम्हें कभी चोट न पहुँचेगी।
प्रेम के पहले पाठ सीखने हो तो चट्टानों के पास, पहाड़ो के पास, नदियों के पास, वृक्षों के पास। फिर धीरे-धीरे बढ़ना और जब तुम प्रेम का पाठ खूब सीख जाओ, जब तुम्हें यह पता चल जाए कि प्रेम की इसकी कोई प्रयोजना ही नहीं है कि दूसरा लौटाएगा कि नहीं, प्रेम सिर्फ दान है। जब तुम वृक्षों को दे-दे कर आनंदित होओगे और वृक्षो जैसी हरियाली तुम्हारे भीतर छा जाएगी, जब तुम नदी, चाँद-तारो को दे-दे कर आनंदित होओगे और ठीक वैसी ही स्वच्छता तुम्हारे भीतर उतर आएगी, तब तुम इसकी फिक्र छोड़ दोगे कि दूसरा लौटाता या नहीं, दूसरा अस्वीकार करता या नहीं। तब तुम उन्मुक्त भाव से दोगे। अगर दूसरे ने न लौटाया, तो तुम्हें दया आएगी कि बेचारा! प्रेम में यह तो इतना असमर्थ हो गया है कि मैने नमस्कार किया और वह नमस्कार भी न लौटा सका। कितना सिकुड़ गया होगा! तुम्हें दया आएगी, अनुकंपा आएगी। क्रोध नहीं आएगा और न ही पीड़ा होगी।
और एक बार तुम यह राज जान गए कि प्रेम का मजा उसके देने में है, तब तुम चकित होओगे कि हजारों तरफ से प्रेम हजारों गुना होकर लौटने लगता है। क्योंकि प्रत्येक तैयार खड़ा है- कोई प्रेम दे, वह लौटा दे। क्योंकि वह भी डरा हुआ है। तुम जैसा ही डरा हुआ है। एक बार तुम देना शुरू करो, लौटना शुरू हो जाता है।
कोयल गीत गाती है, किसी की ताली की कोई फिक्र नहीं। ऐसा ही प्रेम वस्तुतः बांटता है, कोयल के गीत की भांति। कोई ताली बजाता है, नहीं बजाता, यह उसकी मौज। बजाई तो खुद भी थोड़ा आनंदित ज्यादा हो लेगा। नहीं बजाई तो दया का पात्र है। गीत सुन कर ताली न बजी, इससे केवल इतना ही पता चलता है कि गीत सुनना भी न आया, गाना तो बहुत दूर। गीत सुनने का भी सलीका न आया। ताली भी न बजा सके, ऐसी कंजूसी! कुछ भी न लगता था, अहोभाव प्रकट न कर सके, तो गा तो सकोगे ही नहीं।
जो ताली बजाता है गीत सुन कर, वह गाने की तरफ कदम उठा रहा है। वह आज नहीं कल गाएगा भी। आज नहीं कल सोचेगा कि दूसरे के गाने से इतना आनंद मिलता है, अपना गीत जब फूटेगा प्राणो से तो कितना आनंद न मिलेगा। जब दूसरे के झरने को बहते देख कर ऐसी पुलक छा जाती है, तो अपना झरना जब बहेगा तो कैसा नृत्य न घटेगा।
जब तुम दूसरे के प्रेम को अहोभाव से स्वीकार करते हो तो तुम्हारे प्रेम को फैलने की सुविधा बनती है, रास्ता मिलता है।
प्रेम सीखना होगा। प्रेम देना होगा। दे-दे कर बढ़ेगा। और जब तुम पाओगे कि जितना तुम देते हो उतना बड़ता जाता है, तो तुम्हारा जीवन सघन होता है। उसकी त्वरा बढ़ती है। वह घनीभूत होता है। तुम एक छोटे से घर में विराट जीवन के मालिक हो जाते हो। छोटी सी देह में अनंत समा जाता है। जैसे बूंद में सागर सिकुड़ गया हो, जैसे एक किरण में पूरा समा गया हो, ऐसे तुम्हारी छोटी सी देह में और छोटे से आंगन में अपूर्व नृत्य होता है विराट का।
और जब तक कोई वैसी स्थिति को न पहुँच जाए, तब तक कैसे धन्यवाद देगा परमात्मा को? जिस जीवन में धन्यवाद के योग्य कुछ भी नहीं है, उससे प्रार्थना कैसे उठेगी?
इसलिए मैं कहता हूँ, प्रेम हो तो ही प्रार्थना होती है। अगर प्रेम न हो तो प्रार्थना के नाम से शिकायत होगी, प्रार्थना नहीं हो सकती।
तुम्हारी प्रार्थनाओं में तुम्हारी शिकायतों का पता चलता है। तुम्हारी प्रार्थनाओं में तुम्हारा अहोभाव विदित नहीं होता। तुम यह नहीं कहते मुक्त कंठ से कि मैं धन्यभागी हूँ कि तूने मुझे पैदा किया। मैं धन्यभागी हूँ कि मैं हूँ। मैं धन्यभागी हूँ कि श्वास चलती है। मैं धन्यभागी हूँ कि मैं तेरे इस विराट उत्सव में सम्मिलित होने का हकदार माना गया है। मैं धन्यभागी हूँ कि तेरे चाँद तारे देखे, तेरे फूलों को खिलते देखा, तेरे फूलों की सुवास को आकाश में उड़ते देखा। मैं धन्यभागी हूँ कि तेरे झरने, तेरे पहाड़ देखे। तेरे सागर, तेरी अनंत लीला देखी।
जिस दिन तुम्हारी प्रार्थना धन्यवाद की होगी, उसी दिन प्रार्थना है।
लेकिन वह प्रार्थना के पहले तुम्हें प्रेम की प्रक्रिया सीखनी होगी। उसमें देर मत करो। जितना समय बीता वह व्यर्थ ही गया। जल्दी करो और प्रेम को बुलाओ और प्रेम को अपने घर में बसाओ और प्रेम के बढ़ने में जिससे भी सहायता मिले, वह सब करो। और प्रेम के घटने में जिन-जिन चीजों से सहायता मिलती हो, वह भूल कर मत करो। क्योंकि तुम्हारे भीतर अगर प्रेम घना न हो, तो घृणा घनी होगी। तुम बच न सकोगे- या प्रेम, या घृणा, या भय, या मौत। तुम बच न सकोगे। चुनाव तो करना ही होगा।
तुम इतने डरे हो मौत से इसलिये कि तुम प्रेम को नहीं जान पाए। प्रेमी मौत से नहीं डरता। प्रेमी की कोई मौत ही नहीं है, क्योंकि प्रेम शाश्वत है। उसका मृत्यु से कभी मिलना नहीं हुआ, ऐसे ही जैसे सूरज का कभी अंधकार से मिलना नहीं हुआ है।
धारणा हो तो समर्पण नहीं होता। धारणा तुम्हारी है। तो तुम जो समर्पण करोगे वह भी तुम्हारा अपने ही प्रति है। वह तुमने झुक कर अपने ही पैर छू लिए। तुमने दर्पण के सामने खड़े होकर अपनी ही आरती उतार ली। तुम्हारी धारणा के कारण अगर समर्पण होगा तो समर्पण नहीं हुआ। तुम्हारी धारणा तुम्हारी धारणा है, समझो।
समर्पण के पूर्व तुमने धारणा बना ली। धारणा तुम्हारी है। अब तुम धारणा को लेकर चले जाँचने। कभी कोई आदमी अगर तुम्हारी धारणा से मेल खा जाएगा तो तुम समर्पण कर दोगे। वह समर्पण तुमने उसके प्रति किया? या तुमने अपनी ही धारणा के प्रति किया? वह तुमने झुक कर अपने ही पैर छू लिए। वह आदमी तो बहाना हुआ, खूंटी हुआ। तुमने अपने को ही उस पर टांग दिया।
और इस तरह का समर्पण हमेशा अधूरा रहेगा, पूरा नहीं हो सकता। क्योंकि तुम कभी भी पूरे तृप्त नहीं हो सकते ।
तुम्हारी धारणा से समर्पण नहीं होता। जहाँ तुम्हारी सारी धारणाएं छूट जाती है वहाँ समर्पण है। जिस व्यक्ति के पास जाकर तुम अपनी सब धारणाएं नीचे रख देते हो। तुम कहते हो कि बहुत धारणाओं से देख लिया, सिवाय अंधेपन के कुछ भी न पाया। अपनी धारणाओं के चश्मों से लगा-लगा कर बहुत देखा, कहीं परमात्मा न दिखा। अब हम सब धारणाएं चरणों में रख देते है। अब हम निर्धारण होते है। अब हम शून्य होकर तुम्हें देखते हैं।
समर्पण का यही अर्थ है। किसी व्यक्ति के पास शून्य होकर बैठ जाना समर्पण है। तुम शून्य हो जाओ, समर्पित हो गए। समर्पण कोई घोषणा थोड़े ही है कि तुम बैंड-बाजा बजाओ। समर्पण तो शून्य का स्तर है। वह चुप्पी में घट जाता है। कुछ शोरगुल थोड़े ही करनी है। कोई गवाह थोड़े ही जुटाने है। तुम जिस व्यक्ति के भी पास जाकर शून्य बैठ गए, वहीं समपर्ण हो गया। और तब व्यक्ति की भी क्या बात है! तुम अगर वृक्ष के पास भी शून्य होकर बैठ गए, समर्पण वहीं हो गया। तुम अगर आकाश के पास शून्य होकर बैठ गए, समर्पण वहीं हो गया। समर्पण तुम्हारे न होने का नाम है। समर्पण कोई कृत्य नहीं है कि तुमने किया। तुम करने वाले रहे तो समर्पण तो होना ही नहीं है। वह तो तुम ही रहोगे पीछे। समर्पण तो ऐसी दशा है, तुम्हें पता चला कि मैं हूँ ही नहीं।
जिस व्यक्ति के पास अपने न होने का पता चले, वही गुरू है। जिसके पास तुम्हें अपने होने का पता चले, वहां से भागना। वह महामारी है। क्योंकि वही तो तुम्हारी बीमारी है जन्मों-जन्मों की कि मैं हूँ। जिस व्यक्ति के पास तुम्हारे मैं की सब दीवारें गिरने लगे, वहां टिक जाना। कहना कि अब यही रूकेंगे। यहाँ मिटने की जगह है।
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