





अर्थात् एक बार श्री विष्णु ने माँ पार्वती की आराधना कर उनके समान ही सौन्दर्य की प्राप्ति की थी जिससे भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर दैत्यों को अमृत पान से वंछित रखा था, जिससे दैत्य अमरत्व को प्राप्त न कर सके। श्री विष्णु ने मोहिनी अवतार धारण कर कई असुरों का अंत किया और सृष्टि में पुनः शांति और संतुलन की स्थापना की है।
भस्मासुर नाम का एक दंभी राक्षस था, जिसे येन केन प्रकारेण समस्त विश्व पर राज करना था। इसीलिये उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या की जो कई वर्षों तक चली। दैत्य की गहन तपस्या से प्रसन्न होकर भोलेनाथ प्रकट हुये और उसे वरदान मांगने को कहा, तब भस्मासुर ने भगवान शिव से अमरत्व का वरदान मांगा।
दैत्यों को अमर होने का वरदान सृष्टि विरूद्ध विधान था इसलिये शिव जी ने उसे यह मांग बदलकर कुछ और इच्छा व्यक्त करने को कहा। तब भस्मासुर ने यह वर मांगा कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रखे वह भस्म हो जाये। शिवजी ने उसे यह वरदान दे दिया। यह वरदान प्राप्त कर लेने के बाद भस्मासुर स्वयं को सृष्टि में सबसे अधिक मानने लग गया और इस शक्ति का गलत प्रयोग करने लग गया। उसकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो चुकी थी कि वह एक बार भगवान शिव को ही भस्म करने चल पड़ा। जब श्री विष्णु को यह सब ज्ञात हुआ तब भस्मासुर का अंत करने के लिये उन्होंने मोहिनी रूप धारण किया। भस्मासुर जब शिवजी को भस्म करने के लिये ढूंढ रहा होता है तब मोहिनी से मंत्रमुग्ध होकर भस्मासुर सब भूलकर वही रूक जाता है और मोहिनी से विवाह का प्रस्ताव रख देता है। तब मोहिनी जवाब में कहती है कि वह केवल उसी युवक से विवाह करेगी जो उसकी तरह नृत्य में प्रवीण हो। भस्मासुर को तो नृत्य आता नहीं था तो उसने इस कार्य में मोहिनी से मदद मांगी। मोहिनी भी तुरन्त तैयार हो गई। नृत्य सीखाते-सीखाते मोहिनी ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा और उसकी देखा-देखी भस्मासुर भी शिव के वरदान के बारे में भूलकर अपना ही हाथ अपने सिर पर रख बैठा और खुद ही भस्म हो गया। इस प्रकार श्री विष्णु ने मोहिनी के रूप में दंभी असुर का अन्त किया। इसी भांति समुद्र मंथन से जब अमृत कलश निकला था और उसे असुर देवताओं से छीनकर भागने लगे थे, तब भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार हुआ था। देवताओं की रक्षा के लिये भगवान विष्णु ने मोहिनी स्वरूप धारण किया था। यह भगवान विष्णु का एकमात्र स्त्री स्वरूप माना जाता है।
समुद्र मंथन से अमृत कलश निकलने पर उसे पहले पाने की लालसा असुरों में हुई। वे देवताओं से अमृत छीन कर ले गये। वे उसे पीकर अमरत्व प्राप्त कर लेना चाहते थे। यदि ऐसा हो जाता तो फिर देवताओं के लिए संकट खड़ा हो जाता। अच्छाई पर बुराई हावी हो जाती, सत्य पर असत्य का प्रभाव बढ़ जाता।
इस स्थिति से बचने के लिये भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया। भगवान विष्णु का मोहिनी स्वरूप ऐसा था, जिसे देखकर हर कोई मोहित हो जाता था। असुरों से अमृत कलश पुनः प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु मोहिनी स्वरूप में उनके पास गए।
उनको देखकर सभी असुर उन पर मोहित हो गये। वे सभी अपना सुध बुध खो बैठे। तब भगवान विष्णु ने देवताओं और असुरों को बारी बारी से अमृत पान कराने के लिए राजी किया। जिस पर असुर सहमत हो गए और वे अमृत कलश भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप को दे दिये।
तब भगवान विष्णु ने सबसे पहले देवताओं को अमृत पान कराया। उस दौरान एक असुर देवताओं का स्वरूप धारण कर उनकी पंक्ति में शामिल हो गया, जो अमृत पान करने लगा। लेकिन उसे सूर्य एवं चंद्र देव पहचान गये थे। भेद उजागर होने पर भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उस असुर का सिर एवं धड़ अलग कर दिया। अमृत पान की वजह से वह मरा नहीं, उसका सिर और धड़ जीवित रहा। वह राहु और केतु के नाम से जाना जाता है।
भगवान विष्णु ने जिस तिथि को मोहिनी स्वरूप धारण किया, उस दिन वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि थी। यह एकादशी तिथि मोहिनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गई। जो भी व्यक्ति मोहिनी एकादशी व्रत रखता है, वह मोह माया से मुक्त हो जाता है। उसे कष्ट एवं पाप मिट जाते हैं।
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