





प्रार्थना अगर शुद्धतम हो जाये तो परमात्मा भी आवश्यक नहीं है, प्रार्थना काफी है। परमात्मा रूपांतरित नहीं करता है, प्रार्थना ही रूपांतरित करती है। परमात्मा तो प्रेम का ही गहनभूत अनुभव है। ऐसा नहीं है कि प्रार्थना साधन है और परमात्मा साध्य है। ऐसा है कि प्रार्थना ही जब सघन हो जाती है, तो परमात्मा प्रकट हो जाता है। प्रार्थना का ही सघनीभूत रूप परमात्मा है।
मैं कलकत्ता की यात्रा पर था। एक निपट कंजूस मित्र ने बार-बार आग्रह किया कि उनके घर आऊं, नया घर किराये पर लिया है। घर उनका देखने योग्य नहीं, यह मैं भलीभांति जानता था। जाना व्यर्थ ही होगा-कंजूस, महाकंजूस! फिर भी पीछे पड़े, तो मैं गया।
जाकर पाया कि जाना बेकार नहीं हुआ। एक बड़ा कीमती अनुभव मिला। वे अपना मकान घूम-फिर कर मुझे दिखाने लगे। कुछ भी देखने योग्य न था। पुराने कैलेंडर टांग रखे थे, वे भी पुराने सालों के। सामान भी जो था वह चोर-बाजार में खरीदा होगा। सब फटा-पुराना, सब ऐतिहासिक। लेकिन जो आखिरी कमरा उन्होंने दिखाया, वह बड़ा उद्घाटक सिद्ध हुआ। कहने लगे, यह हमारा संगीत का कमरा है।
चारों तरफ मैंने देखा, न कोई वीणा है, न कोई तबला है। तबला और वीणा तो दूर, कोई रेडियो भी नहीं है। मैने पूछा कि कोई साज-समान नहीं है? सिर्फ टूटी-फुटी दो चार पुरानी कुर्सिया पड़ी हैं।
कहने लगे, साज-समान? साज-समान की जरूरत भी नहीं है। यहीं बैठ कर हम पड़ोसियों के रेडियो से निकली स्वरलहरी को बड़े आनंद से सुन लेते हैं।
प्रार्थना तुम्हारी नहीं है। किसी ने तुम्हें सिखा दी है। माँ-बाप ने सिखाई होगी, समाज ने सिखाई होगी। सदियों-सदियों से चली आती है श्रृंखला संस्कारों की। जिनसे तुमने सीखी है उनमें से पहले भी गाई होगी हृदय से, यह भी संदिग्ध। इस बासे खेल में तुम भागीदार बनोगे और इससे तुम नित-नूतन परमात्मा को पाने की आकांक्षा करोगे।
तु ही नया कर। हम तो हर चीज को पुराना कर लेंगे। हमारे तो होने का ढंग ही जराजीर्ण और बासा है। हमारा तो मन ही उधार है। शब्द कितनी बार होंठों पर दोहरा लिये गये है। उन्हीं बासे शब्दों को तुम दोहराए चले जाओगे। हृदय में कहीं कोई कंपन, कोई लहर भी न उठेगी, कोई सोए प्राण नाचेंगे भी नहीं। और तुम सोचते हो प्रार्थना से सब हो जायेगा, तो गलत सोचते हो।
पहली तो बात है कि प्रार्थना उधार नहीं हो सकती, प्रेम उधार नहीं हो सकता। तुम्हारे बाप-दादों ने कितना ही प्रेम किया हो, इससे तुम प्रेमी न हो जाओगे। और तुम्हारे देश में कितने ही साधु-संत क्यों न हो, इससे तुम भक्त न हो जाओगे। किसी दूसरे से लेना-देना नहीं है। तुम्हें तुम्हारी अपनी निजता को ही खोजना होगा। तुम्हारे ही हृदय के अंतरतम से उठेगी आवाज, तो सार्थक है। वह तुम्हें रूपांतरित करेगी। प्रार्थना भूल कर भी किसी और से मत सीखना। सीखी सभी प्रार्थनाएं झूठी हो जाती हैं।
लेकिन प्रार्थना अपनी ही करना। कोई हर्ज नहीं शब्द न निकलें। क्योंकि परमात्मा को शब्दों से क्या संबंध है? आसू ही बहे, मौन ही बैठे रहो, या कि नाचने लगो उन्मत्त पागल की भांति, या कि हंसो खिलखिला कर, या कि बोलो अनर्गल वाणी-ऐसी वाणी का नाम भारत में पड़ गया है सधुक्कड़ी, वह जो साधु बोलता है। वह कुछ हिसाब नहीं रखता। बड़ा फकीर हुआ । बोलता था तो साफ नहीं होता था, क्या बोलता है! व्याकरण की कभी चिंता नहीं थी। बुद्धि से नहीं बोलता था, हृदय से बोलता था। एक दिन राह से गुजरता था, एक गहरे कुएं से आवाज आई की बचाओ, मै मरा!
वह पास गया, अंधेरी रात थी। उसने पूछा, कौन हो भाई? क्या शोरगुल मचाया? क्या कर रहे हो वहां?
उस आदमी ने कहा कि बचाओ, मैं मर रहा हूं। मैं गांव का पंडित हूं, मौलवी हूं।
उसने कहा कि ठहरो , मैं जाता हूं , लाता हूं अभी रस्सी-बाल्टी, जो भी जरूरी है, निकाल लूंगा, घबड़ाओं मत। धीरज रखो।
पर बोला वह अपने ही ढंग से, जिसमें न कोई व्याकरण थी, न कोई ढंग था। जाने को था कि भीतर से आवाज आई कि सुनो। जो भी होओ तुम, लेकिन भाषा तो कम से कम ठीक करो। व्याकरण की भूल तो न हो।
उसने कहा कि ठहरो, फिर तुम्हे ज्यादा देर तक रहना पड़ेगा। मैं जाता हूँ, व्याकरण सीखूंगा। कहते है, साल भर उसने व्याकरण सीखी, तब आया। तब तक तो वह व्याकरणचार्य मर चुका था।
हृदय की भाषा चाहिये, व्याकरण न हो तो चलेगा। क्योंकि वहां तो कोई और डूब कर मर रहा था। अगर तुमने हृदय की भाषा न पकड़ी तो तुम्हीं डूब कर मर रहे हो। भाषा न भी हो तो भी चलेगा। क्योंकि जिससे तुम बोलने चले हो, परमात्मा से- प्रार्थना यानी परमात्मा से एक वार्तालाप, एक गुफ्तगू, कानों की फुसफुसाहट- जिससे तुम बोलने चले हो, वह तुम्हारी भाषा की चिंता नहीं करता, तुम्हारा भाव काफी है।
भाव बड़ी ही बात है। भाव की कोई व्याकरण है? भाव के कोई शब्द है? भाव तो निशब्द में उठी हुई लहर है। शून्य में गूंज गया हृदय का गीत है। काव्य है, गणित नहीं। तुम्हारे हृदय से उठे। तुम उसे पहले से तैयार मत करना। प्रार्थना कोई रिहर्सल नहीं हो सकती। उसकी कोई तैयारी नहीं हो सकती। वह कोई नाटक नहीं है।
ऊब गए नाटक से, बहुत खेल लिये नाटक, अब कुछ जीवन के यथार्थ को जाने की तमन्ना उठी। खेल अब रसपूर्ण नहीं रहा। बचपन जा चुका, पक गए, प्रौढ़ता उठी।
तो तुम घर से तैयार करके मत जाना प्रार्थना। अगर तुमने शास्त्रों से प्रार्थना तैयार कर ली तो तुम उस छोटे बच्चे की भांति हो, जो परीक्षा देने तो चला है, लेकिन सब कंठस्थ कर आया है। तुम्हारे कंठस्थ किए गये की थोडे़ ही परीक्षा होनी है। हृदयस्थ जो है, उसी की परीक्षा होगी।
अगर तुमने याद कर-कर के प्रार्थना की सब व्यवस्था रट ली है, तो तुम दोहरा दोगे जाकर प्रार्थना, लेकिन तुम ग्रामोफोन के रिकार्ड हो, तुम आदमी नहीं हो, प्रार्थना तो तुम्हारे वास्तविक से उठनी चाहिये। उसकी कोई पूर्व-तैयारी नहीं हो सकती। सभी पूर्व-तैयारियां गलती में डाल देती है।
हृदय का अंतरभाव है प्रार्थना। जाना, छोड़ देना परमात्मा के समक्ष। और तब तो मंदिर जाने की भी कोई खास जरूरत नहीं है। तब तो एक वृक्ष के पास भी बैठ जाना, बहती नदी-धार के किनारे बैठ जाना, या देखना हिमालय के उत्तुंग शिखरों को, या देखना आकाश के तारों को- वहीं मंदिर है। सभी तरफ उसके मंदिर के स्तंभ खड़े हैं। सभी तरफ उसके मंदिर की चांदनी फैली है। सभी कुछ उसका है। जहां भी तुम हो, वहीं पवित्र भूमि पर खड़े हो। वहीं हृदय को निवेदन करने देना। ऐसा निवेदन कि तुम्हें भी चौंकाए। तुम्हें भी पता नहीं था कि तुम्हारे भीतर से यह भाव उठेगा।
प्रार्थना तुम थोड़े ही करते हो! परमात्मा ही तुम्हारे द्वारा करता है और परमात्मा ही तुम्हारे द्वारा लेता है। तुम तो केवल बांसुरी बन जाते हो- बांस की एक पोंगरी। बस तुम राह दे दो, इतना काफी। तुम अवरोध न दो, इतना पर्याप्त। तुम्हारे छिद्र खुले हो, इतना बहुत। परमात्मा ही गाता है अपने गीत को और परमात्मा ही सुनता है। वही प्रतिमा है, वही पूजारी है। वही गायक है, वही श्रोता है।
जिस क्षण तुम्हारे भीतर ऐसी घड़ी आयेगी, जहां तुम देख पाओगे कि मैं ही गाने वाला, मैं ही सुनने वाला, मैं ही प्रार्थी, मैं ही पूज्य, जिस दिन तुम्हारे भीतर प्रार्थना में सब डूब जाएंगे, द्वंद्व, द्वैत, एक उठता हुआ अहोभाव, विराट आकाश की तरफ फैलती हुई एक तरंग- उस क्षण प्रार्थना न केवल पर्याप्त है, पर्याप्त से भी ज्यादा है। उस क्षण प्रार्थना ही परमात्मा है।
उधार ने मारा। उधार ने बुरी तरह मारा। सब झूठा हो गया। प्रेम के शब्द तक बासे! छोड़ो ये झूठी प्रार्थनाएं, ताकि सच्ची प्रार्थना का जन्म हो सके।
जहां तुम प्रार्थना करोगे, वहीं मंदिर है। असली सवाल प्रार्थना है, असली सवाल मंदिर नहीं है। लोगों ने कहा है, प्रार्थना करो परमात्मा से। मैं तुमसे कहता हूँ, बिना प्रार्थना के तुम परमात्मा को जानोगे कैसे? किसके सामने ले जाओगे अपनी अर्चना? किसके सामने रखोगे नैवेद्य? किसके चरणो में झुकाओगे सिर? अगर वे चरण उपलब्ध ही है तो झुकना क्या है, खोजना क्या है, पाने को क्या बचा?
नही, मैं तुमसे कहता हूँ, तुम प्रार्थना करो। तुम झुको। चरणों की फिक्र मत करो। तुम जहां झुकोगे, वहीं उसके चरण होंगे। तुम जहां प्रार्थना करोगे वहीं तुम उसे पाओगे। प्रार्थना परमात्मा से बड़ी है। कठिन होगा सोचना कि प्रार्थना परमात्मा से बड़ी है। लेकिन होनी ही चाहिये।
कबीर कहते हैः गुरू गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांव।
दोनों सामने खड़े हो गए है गुरू गोविंद, किसके पैर छुऊं? अड़चन उठी होगी।
फिर कबीर ने गुरू के ही पैर छू लिये। क्योंकि कबीर ने कहा हैः बलिहारी गुरू आपकी, गोविंद दिया बताए।
गोविंद का पता ही कैसे चलता? आज दोनों सामने खड़े है। गोविंद का तो पता ही न चल सकता था बिना गुरू के। तो गुरू गोविंद से बड़ा है। उसके द्वारा ही जाना। इसलिये तुमसे कहता हूँ, प्रार्थना परमात्मा से बड़ी है। क्योंकि प्रार्थना के बिना पता ही कैसे चलता कि परमात्मा है? तुमने उलटा ही पाठ पढ़ा, इसलिये दुनिया अधार्मिक है।
लोग कहते है, पहले सिद्ध कर लो कि परमात्मा है, फिर प्रार्थना करना। उनकी बात गणित-युक्त लगती है। बात साफ लगती है, गणित सीधा है कि जब परमात्मा है ही नहीं, तो प्रार्थना कैसे करनी? लेकिन जीवन के गणित में यह बात ठीक नहीं है। बुद्धि के गणित में ठीक होगी। बुद्धि का कोई गणित है? उसकी कोई गहराई है? सतही है।
जीवन का गहरा गणित कहता है, प्रार्थना होगी तो परमात्मा प्रकट होगा। क्योंकि प्रार्थना परमात्मा को देखने की आंख है। प्रार्थना परमात्मा को जानने का भाव है। प्रार्थना परमात्मा को पाने की पात्रता है। जहां प्रार्थना होती है वहां परमात्मा प्रकट हो जाता है।
अगर तुमने कहा कि पहले परमात्मा मिल जाये फिर प्रार्थना करेंगे, तो बात बड़ी होशियारी की कह रहे हो, पर बड़ी मूढ़ता की। तुम्हें परमात्मा कभी मिलेगा नहीं। परमात्मा मिलेगा नहीं, प्रार्थना कभी होगी नहीं, तुम भटकते ही रहोगे।
इसलिये तो पृथ्वी अधिक मात्रा में नास्तिक है। इसलिये नास्तिक नहीं है कि लोगो को पक्का पता चल गया है कि परमात्मा नहीं है, इसलिये नास्तिक है कि धर्मगुरूओं ने लोगों को सिखाया है कि प्रार्थना तभी हो सकती है जब परमात्मा हो। गलत ही बात सिखा दी।
प्रार्थना पहले है। और अगर प्रार्थना है, तो तुम्हें कहीं से भी द्वार मिल जायगा। वृक्ष में भी वही खुल जायेगा, चट्टान में भी वही दिख जायेगा। प्रेम चाहिये। प्रेम है प्रमाण परमात्मा का। कोई और प्रमाण नहीं है।
इसलिये तुम मत कहो कि क्या प्रार्थना ही पर्याप्त है? मै। तुमसे कहता हूं, परमात्मा भी जरूरी नहीं है। प्रार्थना एकदम पर्याप्त-पर्याप्त से भी ज्यादा। पा ली प्रार्थना, पा लिया परमात्मा।
उलटी खोज में मत पड़ना। उस खोज से आदमी नास्तिक हो जाता है। जो मैं कह रहा हूँ, उसी मार्ग से आदमी आस्तिक हो सकता है। और कोई उपाय आदमी के आस्तिक होने के नहीं हैं।
किसी से मत पूछो। क्योंकि कोई भी रूप दे देगा, प्रार्थना उधार हो जायगी। उठने दो। इतना डर क्या है? इतनी घबराहट क्या है? रूको, शांत बैठो और उठने दो प्रार्थना को।
और तुम पाओगे कि बड़ी अनूठी घटना घटनी शुरू हो जाती है।
लेकिन तुम रिहर्सल के आदी हो। तुम कहते हो- पहले पक्का तो पता चल जाय कि प्रार्थना क्या करनी है। लेकिन अगर पता ही चल गया कि प्रार्थना क्या करनी है, तुम सदा के लिये प्रार्थना से वंचित रह जाओगे। मत पता लगाओ। छोड़ दो उसके अनजान हाथों में। अंधेरा है? छोड़ दो अंधेरे में। प्रकाश का कोई पता नहीं है? अगर मैं कुछ कह भी दूंगा तो भी पता न हो जायेगा। तो तुम प्रकाश के लिये कहे गए शब्दों को याद कर लोगे। उन्हीं को तुम अंधेरे में दोहराते रहोगे।
शब्दों से अंधेरा मिटता है? तुम कितना ही दोहराओः प्रकाश, प्रकाश, प्रकाश……। अंधेरा मिटेगा? दीया चाहिये! शब्द मैं तुम्हें दे सकता हूँ, दीया तुम्हें कौन देगा? दीया तुम्हें ही जलाना पड़ेगा। क्योंकि तुम्हारे प्राणो के प्राणो का ही दीया है। ‘‘प्रकाश’ शब्द मैं दे सकता हूँ। शब्द का क्या करोगे? शब्द से ज्यादा बेजान कोई चीज संसार में और है?
प्रार्थना कोई किसी को बता नहीं सकता। तुम्हारी प्रार्थना तुम्हारे जैसी होगी, मेरी प्रार्थना मेरी जैसी होगी। तुम्हारे पड़ोसी की प्रार्थना उसके जैसी होगी। प्रार्थना तो तुम्हारे हृदय की अद्वितीयता से निकलेगी। तुम उसे निकलने दो। तुम छोटे बच्चो की भांति हो जाओ। परमात्मा के सामने भी तैयार होकर क्या जाना! उससे क्या छुपा है? उसके सामने क्या रूप दिखलाने! क्या प्रदर्शन करना है। क्या भाषा और व्याकरण। क्या लय-ताल। कुछ भी तो नहीं है। वहां तो तुम्हारा सीधा भाव ही समझ लिया जायेगा। रोने जैसा लगे, रोना, वही तुम्हारी प्रार्थना होगी। हँसने जैसा लगे, हंसना, वही तुम्हारी प्रार्थना होगी।
हंसो, उससे भी प्रार्थना बन जायेगी। रोओ, उससे भी प्रार्थना बन जायेगी।
ध्यान रखना, रोने को कोई संबंध दुःख से नहीं। ये गलत संबंध मनुष्य ने जोड़ रखे है। तुम्हारे मन में, सभी के मन में यह बात बिठा दी गई है कि रोने का संबंध दुःख से है। कोई मर जाए, तब तुम रोते हो, कुछ नुकसान हो जाए, हानि हो जाए, तब तुम रोते हो। दिवाला निकल जाए, मकान में आग लग जाये, तब तुम रोते हो। तुम यह भूल ही गए हो कि रोने से कोई संबंध दुःख का नहीं हैं।
कभी तुम ठीक से हंसो, और तुम पाओगे- आंसुओं की धार लग गई। रोने का कोई लेना-देना दुःख से नहीं है। रोने का अनिवार्य संबंध तो अतिशय से है। कोई भी भाव-दशा अतिशय हो जाय, वह आंसू बन जाती है। दुःख अतिशय हो जाय तो आंसु बन जाता है, सुख अतिशय हो जाय तो आंसू बन जाता है।
लेकिन मनुष्य-जाति को वंचित कर दिया गया है, कुछ भ्रांत धारणाएं बिठा दी गई हैं- कि रोओं मत। रोना दुःख जाहिर करता है।
तुमने कभी किसी को हँसते हुए और रोते हुए साथ-साथ देखा है? उसकी प्रार्थना में बड़ी गति होगी। वह हंसेगा परमात्मा के लिये, रोयेगा अपने लिये। या उसका हँसना इतना अति हो जायेगा कि उसके आंसुओं से हंसी बहने लगेगी। आंसुओं का अर्थ है, ऊपर से बह जाना। इतना ज्यादा हो गया है भीतर भाव घना कि अब उसे भीतर संभाल रखने का कोई उपाय न रहा। वह पात्र के ऊपर से बह रहा है। आंसु दिव्य हैं। और अगर तुम परमात्मा के लिये रोते हो- चाहे दुःख से रोओ, चाहे सुख से रोओ, चाहे आनंद से रोओ, चाहे पीड़ा से रोओ- रोना प्रार्थना हो जायेगी। हंसना प्रार्थना हो जायेगी।
लेकिन बुद्ध न कभी हंसे, न कभी रोए। उनकी प्रार्थना मौन है। वह उनकी प्रार्थना है। तुम्हारे लिये शायद ठीक बैठे, न बैठे। मीरा नाची। तुम महावीर को नाचने कहोगे, जंचेगी न बात। वह व्यक्तित्व नाचने वाला नहीं है। मीरा पर जब प्रार्थना का आघात हुआ, तो मीरा नाची। उसका यंत्र तैयार था नाचने को। हाथ पड़ गए परमात्मा के, स्वर छिड़ गए, तार कंप उठे। चैतन्य महाप्रभु नाचे, नाचते रहे। बुद्ध बैठे रहे, महावीर खड़े रहे। उनके लिये वहीं प्रार्थना थी।
प्रत्येक व्यक्ति की प्रार्थना ऐसी होगी, जैसे तुम्हारे अंगूठे का निशान है। अलग-अलग होगी। उसका कोई सामूहिक ढंग नहीं हो सकता। इसलिये मैं निरन्तर कहता हूं, समूह में प्रार्थना नहीं हो सकती। प्रार्थना निजी निवेदन है, अत्यंत वैयक्तिक है। क्योंकि तुम्हारा पूरा व्यक्तित्व उस पर छाया होगा।
अगर तुम मीरा से कहो कि तू चूप बैठ कर प्रार्थना कर जैसे बुद्ध बैठे है! तो तुम मीरा को अड़चन में डाल दोगे। उसकी प्रार्थना हो ही न सकेगी। क्योंकि उसे सतत यह ध्यान रखना पड़ेगा, कहीं शरीर नाचने न लगे। क्योंकि जैसे ही वह भाव-दशा में आयेगी, शरीर नाचेगा। नाच उसके लिये श्वास जैसा है। तुमने अगर कहा कि नाचना नहीं, बस शरीर को सीधा करके, रीढ़ को सीधा करके, बिलकुल ऐसे बैठ कर जैसे मुर्दा प्रतिमा हो पत्थर की, ऐसे ही प्रार्थना करना। तो मीरा की प्रार्थना ही न हो सकेगी। तुम मीरा को डुबो दोगे। क्योंकि जब भी प्रार्थना आयेगी तभी वह नाचने लगेगी।
तुम अगर बुद्ध को कहोगे, नाचो, महावीर को कहोगे, नाचो, पतंजलि को कहोगे कि नाचो, तभी प्रार्थना होगी, देखो मीरा को, देखो चैतन्य प्रभु को! वे सब सिर हिला देंगे। वे कहेंगे, यह हम से न होगा। और अगर हमें तुमने नाचने को कहा, तो हमारी जो शांति है, सब खो जायेगी।
जब उनके तार छेड़े परमात्मा ने, तो वहां शून्य का संगीत उठा। जब उनके तार छेड़े परमात्मा ने, तो सारी गति शांत हो गई, जैसे झील पर एक भी लहर न रही।
ध्यान रखना, मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मीरा ठीक है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि बुद्ध ठीक है। कौन ठीक या गलत है, इसका तुम हिसाब ही मत रखो। तुम्हारे लिये क्या ठीक है, इतना ही भर तुम हिसाब रखना, तो तुम्हारा रास्ता भटकेगा नहीं।
प्रत्येक के लिये धर्म अनूठा होगा। होना ही चाहिये। तुम दूसरे के कपड़े पहनने को राजी नहीं होते, दूसरे के उपयोग किये जूते में पैर नहीं डालते, दूसरी की थाली में भोजन नहीं करते। तुम दूसरे के धर्म को क्यो उधार लेते हो? शरीर पर तुम कपड़े दूसरे के पहनना पसंद नहीं करते, वे दीनता की खबर देते हैं। तुम आत्मा पर क्यों प्रार्थना के वस्त्र दूसरों के ओढ़ना चाहते हो? वे तो महा-दीनता की खबर देंगे। वहां तो तुम्हें ठीक वैसे ही जाना पड़ेगा जैसे तुम हो। परमात्मा पुनरूक्ति नहीं करता।
स्वधर्मे निधन श्रेयः। कृष्ण यह कह रहे है कि जो तुम्हारी स्वसत्ता का धर्म है, उसमें अगर खो भी जाओ, मृत्यु भी हो जाए, तो भी श्रेयस्कर है। क्योंकि उसी भांति तुम अपने को पा लोगे। मिट कर भी अपने को पा लोगे।
कृष्ण तुम्हें जीवन का गहनतम सूत्र कह रहे है कि तुम तुम जैसे हो, तुम्हारे जैसा कोई नहीं। कोई तुलना नहीं हो सकती। तुम किसी भी लकीर पर ठीक न बैठोगे। लकीर के फकीर मत बनना। क्योंकि तुम्हारे लिये कोई लकीर खींची ही नहीं गई। तुम्हीं को खींचनी है। कोई राजपथ नहीं है, जिस पर तुम चल पड़ना भीड़ के साथ। तुम्हें अपनी पगडंडी बनानी होगी। और पगडंडी भी ऐसी नहीं कि बनी हुई मिल जाए कि कोई तुम्हें बना चुका हो पहले से। नहीं। यह जीवन का क्षेत्र आकाश में भी कोई पगडंडी नहीं बनती। बुद्ध चलते है, महावीर चलते है, मीरा नाचती चलती है, लेकिन कोई पगडंडी नहीं बनती। राजपथ का तो सवाल ही नहीं है, जहां कि सारी भीड़ चल सके और राजनैतिक पार्टियां अपनी रैली कर सके- यह तो कोई सवाल ही नहीं है। राजपथ तो है ही नहीं धर्म में, पगडंडी भी बनी बनाई नहीं मिलती, रेडीमेड नहीं मिलती।
फिर कैसे रास्ता बनता है? ज्ञानियों ने कहा है, चल-चल कर ही रास्ता बनता है। तुम्हीं चलते हो और थोड़ा सा रास्ता निकालते हो। जैसे तुम जंगल में भटक गए हो, कोई रास्ता नहीं है, क्या करोगे? चलोगे, खोजोगे, झाड़ियां काटोगे, रास्ता बनाओगे।
तुम्हारा रास्ता किसी और के काम आने वाला नहीं है। क्योंकि न तो पहले से रास्ता तैयार होता है, तुम चलते हो उतना ही तैयार होता है। और दूसरी बात भी याद रखना, तुम जितना चल चुके उतना शून्य हो जाता है, आकाश में खो जाता है। वह पीछे नहीं रह जाता। इसीलिये किसी के पीछे चलने की कोई सुविधा नहीं है।
कृष्ण कहते हैः परधर्मो भयावहः। वह जो दूसरे का है, उससे भयभीत होना, उससे डरना। और बड़ा मजा यह है कि सभी लोगों ने दूसरों के धर्म स्वीकार कर लिये है। महावीर का धर्म जैन, जैन मानते है। वह महावीर के लिए बिलकुल परिपूर्ण था, नहीं तो महावीर पहुँचते कैसे? लेकिन उनके पीछे चलने वाले कहीं पहुँचते नहीं मालूम पड़ते, सिर्फ अपने को तकलीफ देते मालूम पड़ते है। दूसरे का धर्म भयावह है।
तुम्हारा धर्म तुम्हारे भीतर से उठेगा। तुम्हारा वेद प्रतीक्षा कर रहा है लिखे जाने कीं। तुम्हीं उसे लिखोगे तो लिखा जायेगा। तुम्हारे उपनिषद प्रतीक्षा करते है जन्म लेने की। वे तुम्हारे गर्भ में छिपे है। तुम जन्म दोगे तो ही उनका जन्म होगा। तुम्हारी गीता अभी गाई नहीं गई। तुम गाओगे तभी गाई जायेगी। और तुम्हारी गीता तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी नहीं गा सकता है।
मैं अपना गीत गा रहा हूँ। तुम्हें इससे केवल गीत गाने का ख्याल आ जाये, बस इतना काफी है। गीत तो तुम अपना ही गाना। मैं अपनी प्रार्थना कर रहा हूँ, इससे तुम्हें सिर्फ स्वाद लग जाये प्रार्थना का। प्रार्थना तो तुम अपनी ही करना।
इसलिये मैं तुमसे कहता हूँ, तुम भी ध्यान रखना। न बुद्ध, न महावीर, न कृष्ण- किसी का राजपथ, किसी की बनी पगडंडी तुम्हारे लिये नहीं है। मेरी भी पगडंडी तुम्हारे लिये नहीं है। ऐसे तुम भटकोगे।
प्रार्थना के लिये पूछो ही मत। जब छोटे बच्चे को भूख लगती है तो वह क्या करता है, पूछता है? पूछेगा तो कौन बतायेगा उसे? और बता भी देगा कोई, तो वह भाषा नहीं समझता। बच्चा पैदा हुआ माँ के पेट से, वह पूछता है डॉक्टर को कि अब मैं क्या करूं, मुझे भूख लगी है? वह रोता है। कभी रोया नहीं इसके पहले। माँ के पेट में कभी भूख लगने का मौका ही न आया था।
अंतर्निहित है बात- भूख लगेगी, तुम रोओगे। परमात्मा की प्यास जगेगी, तुम प्रार्थना करोगे। सत्य की खोज की जरा सी भी ललक आ जायेगी, आंसू झरने लगेंगे, नाचने लगोगे, हंसने लगोगे- कुछ घटेगा। वह ऐसे ही तुम्हारे भीतर पड़ी है तुम्हारी प्रार्थना, जैसे अजन्मे बच्चे के भीतर रोने की संभावना पड़ी है। तुम्हारी प्रार्थना तुम साथ ही लाए हो। तुम्हारे खून, हड्डी, मांस-मज्जा में छिपी है। बस मौका उसे दो कि वह प्रकट हो सके। दूसरों के द्वारा सिखाई गई प्रार्थनाओं में दबी जा रही है। उसकी गर्दन घुटी जा रही है। तुम उसे मार डाल रहे रहे हो।
हटाओं दूसरों का कचरा जो तुम्हारे ऊपर हो! ताकि तुम्हारी निपट निजता प्रकट हो सके अपनी परिपूर्ण शुद्धता और नग्नता में। छोटा बच्चा रोता है। जब भूख लगती है तब रोता है। माँ भागी चली आती है। तुम रोओ, परमात्मा भागा चला आयेगा। तुम छोटे बच्चे की भांति हो जाओ।
मैं तुमसे यह नहीं कह रहा हूँ कि रोना तुम्हें न आता हो तो रोओ। तब तुम चूक जाओगे। हंसो! नाच सकते हो, नाचो। चुप बैठ सकते हो, चुप बैठों आकाश की तरफ आंख करके कुछ बात करने का मन हो, बात करो, बोलो। जो तुम्हें ठीक लगे, जो तुम्हें सहज मालूम हो, जो सहजस्फूर्त हो, उसी को तुम्हारी प्रार्थना बनने दो। तुम्हारी प्रार्थना तुम लाये हो। मैं तुम्हें प्रार्थना नहीं सिखाता। मैं। तुम्हें सिर्फ इतनी याद दिलाता हूं कि कहीं ऐसा न हो कि तुम मर जाओ और तुम्हारी प्रार्थना का जन्म न हो पाये।
तुम्हें मेरी बात कठिन लगेगी। क्योंकि तुम सस्ती बातों के आदी हो गये हो। तुम चाहते हो मैं तुम्हें एक प्रार्थना दे दूं, झंझट मिटे। तुम अपने घर जाकर रोज दोहरा लो और सो जाओ। तुम कुछ भी खोजना नहीं चाहते। तुम परमात्मा के लिये एक कदम भी उठाना नहीं चाहते। यह भाव-दशा ही प्रार्थना के विपरीत है। मेरी बात तुम्हें कठिन लगती है, क्योंकि तुम्हें कुछ खोजना पड़ेगा। तुम्हें लोग चम्मचों से धर्म खिलाते रहे है। तुम्हें अपने हाथ ही भूल गए हैं कि इनसे हम भोजन उठा सकते हैं। दूसरे चबा कर तुम्हारे मुँह में डालते रहे हैं। वह जूठा था, लेकिन उसमें श्रम नहीं करना पड़ता।
नहीं, मैं तुम्हारे लिये ऐसा कोई काम करने को तैयार नहीं हूँ। मेरे पास कोई बंधी प्रार्थना नहीं है, सिर्फ प्रार्थना की तरफ इशारे हैं। उन इशारों को तुम समझ जाओगे तो तुम अपने ही भीतर छिपे हुए इस हीरे को पा लोगे, जो सदा से वहां तुम्हारी प्रतीक्षा करता है। मैं तुम्हें चलने का मार्ग नहीं देता, मैं तुम्हें सिर्फ समझ देता हूँ, ताकि तुम अपना मार्ग बना सको।
परम् पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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