





रसायन विज्ञान (Chemistry) में एक शब्द है -“उत्प्रेरक (Catalyst)”। सामान्यतः उत्प्रेरक वह पदार्थ है जो किसी अभिक्रिया में भाग लिये बिना उसकी गति को तीव्र या मंद कर देता है और स्वयं सदैव अपरिवर्तित रहता है। ऐसी ही भूमिका एक सामान्य मनुष्य के जीवन में सद्गुरु की होती है। एक ऐसे शाश्वत स्वरुप में अवतरित युगपुरुष जिनके होने मात्र से ही जीवन आनन्द के अश्रुओं से पूरित हो जाता है। एक नृत्यमय महारास से युक्त हो जाता है और नृत्य तो संपूर्ण जीवन का उत्साह है, उमंग है, महारास है। नृत्य से एक मनुष्य, एक शिष्य, एक साधक भूमि से ऊपर उठ कर गुरुत्वाकर्षण से मुक्त हो जाता है क्योंकि भूमि पर रहकर नृत्य नहीं किया जा सकता। भूमि से उपर उठा हुआ व्यक्ति “गुरुतत्वकेआकर्षणसेआकर्षितहोनेलगताहै।”सद्गुरुसेहोनेवालाप्रेमकिसीबंधनमेंबंधकरप्राप्तनहींकियाजासकताक्योंकिप्रेममूलतःमुक्तहोनासिखाताहै।तमामप्रकारकेउलझनोंसेमुक्त, “स्व”सेमुक्त।फिरतुम“स्व”को“पर”मेंविसर्जितकरनेकेलियेउतावलेहोनेलगोगे।
लेकिन क्या तुम “स्व”सेमुक्तहो . . . ?
कृष्ण बार – बार अर्जुन से बोल रहे हैं अपने “स्व”कोमुझमेंविसर्जितकरदो।मगरअर्जुनपड़ाहुआहैउलझनोंमें।कईप्रकारसेकृष्णउसेसमझारहेहैं, सारथी बन कर भी, मित्र बन कर भी। मगर वह तैयार नहीं हो पा रहा है, अपने “स्व”कोविसर्जितकरनेकेलिये।फिरकृष्णकोअपनाविराटगुरुत्वीयस्वरुपदिखानापड़ा।इससृष्टिकासंचालकबनकरउन्होंनेसंपूर्णब्रह्माण्डकोअर्जुनकेसमक्षप्रस्तुतकरदिया।कुरुक्षेत्रकेरक्तरंजीत युद्ध भूमि में उन्होंने अर्जुन को झकझोर कर कहा –
श्रेयान् स्व-धर्मो विगुणः पर धर्मात् स्व-अनुष्ठित।
स्व-धर्मे निधनं श्रेयः पर-धर्मो भय-आवहः।।
अर्थात् “भलेहीअपनेकर्तव्यमेंकुछकमियांहोफिरभीस्वधर्मकापालनकरना, परधर्म के पालन करने से पूर्णत: श्रेष्ठ है।”‘स्व (खुद)’केधर्म(कर्तव्य) कानिर्वहनकरनेमेंअगरवीरगतिभीप्राप्तहुईतोश्रेयस्करहै।‘पर (दूसरे)’केधर्म(कर्तव्य) कानिर्वहनकरनाजोखिमपूर्णहोसकताहै।
कृष्ण को प्रहार करना पड़ा अर्जुन पर, बार-बार। सद्गुरुदेव भी तुम पर निरंतर प्रहार करते हैं। बिना प्रदर्शन किये, बिना चिल्लाए। कृष्ण ने भी अर्जुन से कहा, तुम्हारा सद्गुरु भी तुमसे बोल रहा है-“देखप्रलयगतिमुझमेंहै।”
सृष्टि में प्रलय लायी जा सकती है, सम्भव है प्रलय ला देना। विज्ञान जनित यंत्रों के माध्यम से महज कुछ समय में ही सृष्टि के एक छोर से दूसरे छोर में प्रलय लाया जा सकता है, परन्तु जीवन में प्रलय लाने का सामर्थ्य रखने वाले के लिये ही युगपुरुष, युगसृष्टा जैसे शब्द का प्रयोग किया जाता है।
सबकी पीड़ा के साथ व्यथा अपने मन की जो जोड़ सके,
मुड़ सके जहाँ तक समय, उसे निर्दिष्ट दिशा में मोड़ सके।
युगपुरुष सारे समाज का विहित सद्गुरु होता है,
सबके मन का जो अंधकार, अपने प्रकाश से धोता है।
झर-झर झर अमृत तो निकल रहा है लेकिन उसका पान नहीं कर पा रहे हो तुम।
मुझसे तुम्हारा नाता देह का नहीं है, माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन, प्रेमी-प्रेमिका का संबंध देहगत है। ये स्वार्थ युक्त संबंध शरीर के न रहने से ही समाप्त हो जाता है। मन से भी नहीं जुड़े तुम और मैं। मन को भी परिवर्तित किया जा सकता है। ये मेरा-तुम्हारा संबंध है और आत्मा सदैव शाश्वत ही रहती है। इसका तात्पर्य यह है कि शाश्वत तुम मेरे आत्मीय हो, तुम मेरे प्रिय आत्मन हो। बात देह और मन के तारों की ही नहीं। बाते तो आत्मा के तार की हो रही है। जिसमें विद्युत प्रवाह स्वयं सद्गुरूदेव कर रहे है।
लेकिन आत्मा और परमात्मा के बीच विद्युत प्रवाहित करने हेतु एक बहुत पतले, संकरे तार की आवश्यकता है, चेतना रूपी तार और यह तार मिटकर प्राप्त किया जा सकता है जब शिष्य-साधक पूर्णतः समर्पित होकर स्वयं को मिटाने को तैयार हो जाय या स्वयं मिट जाये। आत्मा को आत्मसात् कर परमात्मा को प्राप्त करने के लिये खुद मिटना तो होगा ही। यदि बीज जमीन पर मिलकर मिटे ही नहीं तो उसका होना ही व्यर्थ है, वह कभी छायाकार वृक्ष नहीं बन सकता, अगर वह तर्क करने लगे तो कि जमीन में मिल जाने के बाद ‘‘मैं’’ एक फलदार वृक्ष बनूंगा भी या नहीं, तो वह बीज कभी फलदार वृक्ष नहीं बन सकता। ‘‘मैं’’ को भूमि में विसर्जित करना होगा, तब जाकर एक फलदार वृक्ष का जन्म होगा। ‘‘स्व’’ मैं मिलाना होगा, धूमिल करना होगा, तब जाकर तुम उस फलदार वृक्ष के छायातले बैंठकर ब्रह्म से साक्षात्कार करने के लिये अग्रसर हो सकोगे। उस तार से जुड़ने के लिये आतुर हो सकोगे। मेरे प्राणों की धड़कन बन सकोगे।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, समाज गुरू को और गुरू कार्यो को बहुत मूल्यांकन नहीं कर पा रहा है। और मूल्यांकन शब्द तो अपने आप में एक अपूर्ण शब्द है, क्योंकि वास्तव में, उनके कार्यो को मूल्यांकन तो सामान्य पुरूष के द्वारा संभव ही नहीं है, उसकी चेतना और अगर एक क्षण के लिये भी जाग्रत हो जाये तो भी बहुत कुछ घटित हो सकता है- व्यक्ति के मन और शरीर में, क्योंकि वह कोई सामान्य चेतना नहीं है, जीवन को झकझोर कर रख देने की क्रिया है, आग्रह करके व्यक्ति के हृदय में उतर जाने की प्रक्रिया है, इसका अर्थ तो वही समझ सकता है- जिसने कभी जीवन में कुछ ऐसा प्राप्त करने का सुख जाना हो।
‘स्व’ का पर से मिलन, नदी का समुद्र से मिलन, गुरू का शिष्य से पूर्णरूपेण मिलन एक ऐसे अमृत का स्वाद है, जिसकी सार्थकता बाँटने में ही होती है, और इसी से इसकी तुलना केवल सद्गुरू रूपी अमृत से की जा सकती है। जो अपना प्रेम हर दिशाओं में बिखेरता ही रहता है। अपने बीज को छोड़ देता है हवा में निर्मुक्त कि वे हवा के झोंकों के साथ उड़ें और दूर-दूर तक जाकर, अलग-अलग खेतों और खलियानों में गिरकर अमृत रूपी पुष्प बने, सुगन्ध बिखेर दें और ऐसा पुष्प जो सदैव सुगंधित करे। जिसके अपने आंखो से ओझल न किया जा सके और सद्गुरू ऐसी क्रिया सम्पन्न करते है। क्योंकि तुम उन्ही के अंश हो उन्हीं की धड़कन हो।
सद्गुरू अपने शिष्यों को कथावाचक के समान उपदेश नहीं देते है। उसे भावनात्मक रूप से समझाते है। जब सब भाप जाते है कि शिष्य के मन में कोई शंका है तो किसी दृष्टांत के माध्यम से उसे समझाया जाता है या शिष्य के भाव में जो प्रश्न के विचार बनते है उनका उत्तर उसके हृदय में काल्पनिक चित के रूप में उभर जाता है, उसकी शंका का निवारण हो जाता है। अर्थात् बिना पूछे शिष्य को अपने प्रश्नों के उत्तर गुरूकृपा से हृदय पटल पर उभर जाते है।
एक बार एक पादरी को अपने ज्ञान पर बहुत भरोसा और अभिमान हो गया। वह अपने धर्म के प्रचार करते हुये बाहर भ्रमण के लिये निकला। पास में ही एक छोटा सा टापू था। जहां केवल तीन प्राणी थे। वे तीनों आदिवासियों की तरह जीवन व्यतीत कर रहे थे। पादरी ने सोचा की ये प्राणी अज्ञानयुक्त है अतः ईश्वरीय ज्ञान नहीं होने से इनका उद्धार नहीं हो सकता। पादरी उनके पास गया और कई प्रकार के उपदेश देने लगा।
उन तीन सामान्य आदिवासी प्राणियों ने कहा-‘‘हम तो सदा एक ही मंत्र जपते हैं, हमारा कोई अन्य सहारा नहीं है। हम तो एक दूसरे के सहायक हैं, अतः हमेशा जपते रहते है- ‘‘हम तीन हमारे तीन’’।
पादरी जन उपदेश देकर नाव में बैठ कर जाने लगा तो वे तीनों प्राणी पानी पर जमीन की तरह दौड़ते हुये आये और बोले ‘‘पादरी जी हम आपका मन्त्र भूल गये है, कृपया दूबारा बता दीजिये ’’
उन्हें पानी में दौड़ते हुये आते देखकर पादरी अचंभित हो गया और उसी क्षण उसका अहंकार टूट गया।
पादरी ने कहा-मैंने अनजाने में ही उस त्रिशान्तिमय परमात्मा का नित्य स्मरण करते रहे हो और तुम्हारी श्रद्धा और समर्पण महान है। अतः तुम जो कर रहे हो उससे श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं है।
आशय क्या है इसका? जब तीन समान्य मनुष्य एक असहज वाक्य से इतनी ऊर्जा प्राप्त कर सकते है तो तुम्हारे पास तो इस संसार का सबसे अमूल्य शब्द है-‘‘गुरू’’ सबसे अमूल्य मंत्र है ‘गुरू मंत्र’। तुम्हारा सद्गुरू तुम्हें जागृत कर रहा है। झकझोर रहा है अन्दर। तुम्हारे भीतर के अंधकार को मिटाने का प्रयास कर रहा हूं मैं।
शिव ने तो स्वयं कहा है- ‘‘जहाँ अज्ञान का अंधकार बहुत घना हो जाये। तो व्यक्ति अपने जीवन में किसी के दर्शन नहीं कर सकता अपने आप के भी नहीं।’’ उस ज्ञान के अंधकार को तो केवल, कितना भी घने से घना अंधकार हो …. सूर्य की केवल एक किरण मिलती है और सूर्य की केवल, एक किरण पूरे पृथ्वी मण्डल पर अंधकार को समाप्त कर देती है। तुम्हारा मन तो फिर भी छोटा मन है, छोटा सा शरीर है, पांच छः फुट का, उस पांच छः फुट के शरीर में एक फुट का अंधकार होगा। दो फुट का अंधकार होगा, उसी दो फुट के अंधकार के दूर करने के लिये शिव ने कहा है-‘‘ज्ञानांजन शलाकया।’’ ‘‘जिसने ज्ञान रूपी काजल (अंजन) और शलाका (सलाई) से अज्ञान रूपी अंधकार युक्त अंधी आँखों को खोल दिया, उन सभी गुरुओं को मेरा नमस्कार है।’’ यह गुरु के उस महान कार्य को दर्शाता है जो वे ज्ञान देकर अज्ञानता के अंधेरे को मिटाते हैं, जिससे शिष्य को सही मार्ग और सत्य का दर्शन होता है।
वास्तव में शिव ने बहुत ही सुन्दर गहरी बात कही है। तुम गुरुरूपी ज्ञान की एक शलाका जलाओ, अगर तुम्हें उस अंधकार को दूर करना है तो, और अगर नहीं करना है तो फिर तुम्हारी उन कीड़े मकौड़ों से ज्यादा वैल्यु नहीं है। बस यह है कि तुम मनुष्य तो हो और मनुष्य होना कोई गौरव की बात नहीं है। मनुष्य होना कोई सौभाग्य की बात नहीं है। मनुष्य होकर के ईश्वर के दर्शन कर लेना ये सौभाग्य की बात है। मनुष्य होकर के उन क्षणों को, उन चिन्तनों को, उन विचारों को, उन धारणाओं को प्राप्त करना गौरव की बात है, सौभाग्य की बात है।
पैदा होना अर्थात् जन्म लेना तो एक घटना है, जैसे एक हाथी का बच्चा पैदा हो गया, एक घोड़े का बच्चा पैदा हो गया, एक मनुष्य का बच्चा पैदा हो गया, वह तो एक घटना हुई। अब घटना है या दुर्घटना? यह तो एक सामान्य तथ्य है। इसके लिये कोई स्कूल, कॉलेज में ट्रेनिंग लेने की जरुरत नहीं है। वह एक स्वभाविक प्रक्रिया है, उसमें कोई तुमने बहुत बड़ा कार्य नहीं किया है और न भगवान ने तुम्हारे ऊपर कोई बहुत बड़ी कृपा कर दी है। यह तो एक रसायन क्रिया है, इस रसायन क्रिया के माध्यम से तुम्हारा जन्म हुआ।
गीता में गुरु को अज्ञान का निवारण करने वाला और सत्य का मार्गदर्शक बताया गया है। जिस प्रकार कृष्ण ने अर्जुन को भ्रम से स्पष्टता की ओर अग्रसर किया, उसी प्रकार एक सच्चा गुरु आत्मा को स्थिर करता है, अंधकार को दूर करता है और ज्ञान का जागरण करता है- इस प्रकार आध्यात्मिक समर्पण ही रूपान्तरण और मुक्ति कुंजी है।
गुरू का अर्थ ही है-“अंधकारदूरकरनेवाला”, अज्ञान के साये को हटाकर सत्य के मार्ग को प्रकाशित करने वाला।
गीता में गुरु तत्व के बारे में संबोधित करते हुये कृष्ण अर्जुन से कहते हैं –
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।
किसी आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य को जानो। उनसे आदरपूर्वक प्रश्न पूछो और उनकी सेवा करो। ऐसा तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकता है क्योंकि उन्होंने सत्य को देखा है। जो यथार्थ तत्त्व को जानने वाले होते हैं, उनके द्वारा दिया गया ज्ञान ही अपने कार्य को सिद्ध करने में समर्थ होता है दूसरा नहीं।
प्रत्येक साधक के लिये यह श्लोक तीन आवश्यक गुणों को रेखांकित करता हैः नम्रता, जिज्ञासा, और सेवा। नम्रता के बिना तुम अहंकार में फँसे रहते हो, यह जानते हुये कि हम पहले से ही सब कुछ जानते हैं। जिज्ञासा के बिना तुम उन प्रश्नों को पूछने में असफल रहते हो जो तुम्हें उच्चतर ज्ञान की ओर ले जा सकते हैं और सेवा तो संपूर्ण शाश्वत जीवन का निचोड़ है, सेवा के बिना हमारा सारा ज्ञान निरस रहता है, उसमें भक्ति और समर्पण का आनंद नहीं रहता।
सद्गुरु स्वयं मार्ग का अनुसरण करके सत्य का अनुभव करते हैं, इसीलिये वे अद्वितीय रुप से ज्ञान का संचार करने में सक्षम हैं। कोई भी पुस्तक अथवा ग्रन्थ जानकारी दे सकती हैं, लेकिन गुरु रूपान्तरण करते हैं। शास्त्र प्रेरणा दे सकते हैं लेकिन गुरु उन्हें हमारे जीवन के सन्दर्भ में व्याख्या करते हैं, शंकाओं को दूर करते हैं, और सीधे ज्ञानोदय की ओर ले जाते हैं।
जिस प्रकार एक दीपक को केवल दूसरी लौ से ही जलाया जा सकता है, उसी प्रकार आत्मा भी गुरु के ज्ञान के प्रकाश से ही जागृत होती है।
भारतीय दर्शन में सद्गुरु को एक दिव्य आध्यात्मिक, आत्मिक सत्ता के स्वरुप में देखा जाता है। मुण्डकोपनिषद में कहा गया हैः
“ सर्वोच्च सत्य को जानने के लिये, व्यक्ति को ऐसे गुरु के पास जाना चाहिये जो शास्त्रों में पारंगत हो और ब्रह्म में दृढ़ता से स्थापित हो।”
आइंस्टीन का नाम लगभग सभी जानते हैं। वो विज्ञान के बहुत गहरे पण्डित थे। उनके जीवन-काल में एक पत्रकार ने उनसे पूछा-“विज्ञानाचार्य! आपइतनेबड़ेविद्वान्हैं, क्या आप एक प्रश्न का उत्तर देने की कृपा करेंगे?”
विज्ञानाचार्य ने कहा-“पुछो।”
उस व्यक्ति ने प्रश्न किया- “संसारमेंइतनेदुःखहै, इतनी अशान्ति है, क्या उसे दूर करने का भी कोई उपाय है?”
विज्ञानाचार्य बोले-“हाँ, है, और केवल एक कि अच्छे मनुष्य उत्पन्न किये जाये।”
आइंस्टीन साधारण नहीं थे बल्कि बहुत बड़े विज्ञानाचार्य थे। उन्होंने यदि कहा है कि श्रेष्ठ मनुष्य उत्पन्न करने से आनन्द और शान्ति उत्पन्न होगी तो क्यों कहा है? यह क्यों नहीं कह दिया कि विज्ञान के अमुक आविष्कार से आनन्द प्राप्त हो जायेगा, अमुक आविष्कार से शान्ति हो जायेगी? इसलिये कि विज्ञान के जितने भी आविष्कार हुए हैं उनसे मनुष्य को वास्तविक सुख नहीं मिला, वास्तविक आनन्द नहीं मिला। कुछ आराम अवश्य मिला है। मैं इन आविष्कारों की निन्दा नहीं करता। अपने स्थान पर ये अच्छे हैं, परन्तु इन्हीं के कारण अशान्ति भी बढ़ती ही जाती है। मनुष्य पहले से ज्यादा अशांत होता जा रहा है। आइंस्टीन की तरह वैज्ञानिक तो नहीं परन्तु विज्ञान के भक्त थे मैक्सिम गोर्की। एक गांव में भाषण देते हुये उन्होंने कहा-
“देखिये सज्जनों! विज्ञान ने कितने सुख-साधन उत्पन्न कर दिये हैं। फिर उन्होंने बताया कि पहले एक दीपक जलाने के लिये कितना परिश्रम करना पड़ता था; अब बटन दबाने से प्रकाश उत्पन्न हो जाता है। महीनों की यात्रा घंटों में, घन्टों की यात्रा मिनटों में होने लगी हैं। ऐसी कितनी ही बातें उन्होंने बताईं। तभी एक देहाती ने उठकर कहा-‘यह सब कुछ सच है श्रीमन! परन्तु क्या विज्ञान ने मनुष्य को मनुष्य बनना भी सीखाया है?’
गोर्की इसका उत्तर न दे सके। विज्ञान ने मनुष्य को मनुष्य बनना सीखाया ही नहीं। सिखाया होता तो लड़ाइयाँ, ये झगड़े और ये युद्ध न होते, यह घृणा न होती, यह अशान्ति न होती। आज सब लोगों में दौड़ हो रही है कि कौन अधिक विनाश कर सकता है, कौन अधिक लोगों को मार सकता है। क्या वास्तव में यही वह प्रसन्नता, सुख और आनंद है, जिसे मनुष्य खोजता फिरता है? सीधी-सी बात यह है कि विज्ञान से आनंद और शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती। शान्ति अच्छे मनुष्यों में उत्पन्न होती है और अच्छे मनुष्य बनाना विज्ञान के बस की बात नहीं। इसलिये यदि एक सुयोग्य पूर्ण मनुष्य बनना है तो पूर्ण पुरूष का सहारा लेना ही होगा, यदि आज के युग में भी शंकराचार्य को पाना है, या अपने व्यक्तित्व को अद्धितीय बनाना है तो गुरू के सेवा में जाना ही होगा; इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है। परमात्मा के अलावा सही अर्थों में इस जीवन में कौन सहारा दे सकता है भला। सम्पूर्ण चराचर जगत किसी न किसी रुप में एक दूसरे पर आश्रित है। यह पृथ्वी और इसके उपर कई खरब मीलों में फैला हुआ यह द्युलोक किसी आधार के नहीं है। प्रत्येक मनुष्य अपने से बड़े का सहारा लेता है। मनुष्य को भी ऐसी शक्ति का सहारा चाहिये जो इससे बड़ी हो। सहारे के बिना कोई चलता नहीं। किसी को दुकान का सहारा है किसी को मासिक वेतन का। किसी को भूमि की आय का सहारा है, किसी को मकान से मिलने वाले किराये का। पिता को बेटे का सहारा है, बेटे को पिता का। ये सब-के-सब सहारे अच्छे हैं; मैं इनकी निन्दा नहीं करता। परन्तु ये सब सहारे क्षणिक हैं। आज हैं, कल रहेंगे नहीं। पिता और पुत्री, पति और पत्नी, भाई और भाई, ये सब एक दूसरे का सहारा लेते हैं। प्रत्येक सहारे में थोड़ी देर के लिये सुख मिलता है, परन्तु यह सुख क्षणिक है, सदा रहता नहीं।
नदियों की गति भी सदैव प्रवाहमान बनी रहती है। ये भी किसी को सहारा बनाकर, आधार बनाकर, भागी जाती हैं। गंगा और यमुना, कृष्णा और गोदावरी, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र, रावी, व्यास, सतलज, झेलम सब का आधार है। करीब साढ़े तेरह हजार फीट की ऊँचाई पर गौमुख है। वहाँ करीब चौदह मील लंबा अर्द्धचंद्राकार जैसा बर्फ का पहाड़ है; उसके भीतर से गंगा बाहर आती है- उछलती, कूदती, नाचती, चीखती, चिल्लाती हुई। बड़ी-बड़ी चट्टानें इसके आगे ठहर नहीं सकतीं। हाथी भी ठहर नहीं सकते। जैसे कोई छलांग लगाकर नीचे की ओर आती हो, इस प्रकार वह कूदती है, इसलिये उसे गंगोत्री-“गंगासेउतरी”कहतेहैं।चलीवहाँसेआगेगरजतीहुई, चट्टानों को तोड़ती, फोड़ती, उखाड़ती हुई। आगे पहुँची तो ‘केदार गंगा’ उसमें आ मिली; तो भी वह रुकी नहीं, भागती रही। ‘गौरी कुण्ड’ में पहुँच गयी। उसमें इस प्रकार से समा गई जैसे अब चलेगी नहीं। परन्तु थोड़ी ही दूर जाकर वह फिर उभरी, फिर दौड़ पड़ी। ‘भैरों घाटी’ के पास पहुँची तो उसमें सफेद रंग की ‘भोट गंगा’ आ मिली।‘हर्शल’ के पास पहुँची तो एक साथ पाँच नदियाँ सम्मिलित हो गई; तो भी वह रुकी नहीं; दौड़ती-उछलती हुई आगे बढ़ी। ‘उत्तर काशी’ पहुँची; फिर भी नहीं रुकी। आगे बढ़ी ‘अलखनन्दा’ उसमें आ मिली, तब वह ‘ऋषिकेश’ पहुँची, उसके बाद ‘हरिद्वार’। हरिद्वार में इंजीनीयरों ने बाँध बनाया की उसे रोक लें। लेकिन वह नहर बनाकर ‘हर की पैड़ी’ के पास पहुँची और पुनः नदी बनकर ‘कानपुर’ पहुँची। फिर आगे बढ़ी प्रयाग, बनारस, पटना से होती हुई हावड़ा में पहुँच गई। वहाँ भी रुकी नहीं; आगे बढ़ती गई, बढ़ती गई, क्योंकि उसे आधार के पास पहुँचना है। वहाँ पहुँचने से पूर्व, उसके लिये रुकना नहीं है, ठहरना नहीं है। और अन्ततः ‘गंगा सागर’ आ गया। उसने आव देखा न ताव, एक ही बार में उसमें कूद पड़ी और शान्त हो गई। सागर ने प्यार से कहा-“तुमआगईहोगंगा!”
गंगा ने उत्तर दिया-“हाँप्रितम! तुम्हारेलियेदौड़तीआईथी।तुमहीमेराआधारहोऔरतुमहीमेरासहाराहो।”औरवास्तवमेंनदीकाआधारसागरहीहै।नदीकीपूर्णतासागरहै, सागर में मिल जाना है। शिष्य की पूर्णता भी गुरु में मिल जाना है, समाहित हो जाना है। शिष्य और गुरु के बीच में कोई भेद रहे, तो फिर उसका जीवन ही व्यर्थ हैं। इसलिये आपके जीवन का आधार आपके गुरु हों, आपके इष्ट हों।
“यस्यच्छायाऽमृतम्’’
उसकी छाया में जाकर, उसको आधार बनाकर, उसको सहारा बनाकर ही अमृत तत्व को प्राप्त किया जा सकता है। और आज इसकी परम आवश्यकता है। तब ही आप निरंतर गुरु की तरफ उन्मुख हो सकेंगे, गुरु नाम का आधार ही उसे हर समय चैतन्य, सम्पन्न और भरपूर बनाये रख सकती है।
ये वेदों ने कहा है-
“सुनीतिभिर्नयसि त्रायसे जनं यस्तुभ्यं दाशान् न तमंहो अश्नवत्’’
जो प्रत्येक मनुष्य को उत्तम, कल्याणकारी मार्गों की तरफ ले जाता है, जो मनुष्य को हर प्रकार के पाप, दुःख, कष्ट, संकट, और क्लेश से, पराजय और गिरावट से बचा लेता है, जो मनुष्य की प्रतिक्षण, प्रत्येक स्थान पर रक्षा करता है, जिन्होंने अपने आप को ही सबके लिये अर्पित कर दिया है। ऐसे श्रेष्ठ सद्गुरुदेव निश्चित ही वन्दनीय हैं।
एक कसाई ने एक कुत्ता पाल रखा था, जो पहरा भी देता था और रक्षा भी करता था। उसके साथ-साथ उसने एक बकरा भी पाल रखा था। बकरे को वह अच्छे-अच्छे भोजन देता था, घास देता था, दाना देता था। कुत्ते को कभी कोई हड्डी, कभी कोई सूखी रोटी डाल देता था। कुत्ते के मन में आया की कसाई तो बहुत अन्यायी है। मैं इसके लिये पहरा देता हूँ, दुकान और मकान की रक्षा करता हूँ। मुझे यह सूखी रोटी देता है, और इस बकरे को जो कुछ भी नहीं करता, दिन भर जो खुटे के साथ बँधा रहता है, बिल्कुल ही निखट्टू है। एक पैसे का भी काम नहीं करता, इसको भाँति-भाँति के वस्तुएं खिलाता है, बिस्कुट भी खिला देता है, कभी-कभी तो दूध भी पिला देता है। मैं दिन-प्रतिदिन सूखता जाता हूँ और यह बकरा दिन-प्रतिदिन मोटा हुआ जाता है। निश्चितरुपेण यह कसाई अन्याय कर रहा है। यह अच्छा नहीं है। परन्तु तभी ईद का दिन आ गया, बकरा हो गया बहुत मोटा। कसाई ने छुरी पकड़ी और उसकी गर्दन पर फेर दिया, उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये, उसका माँस बेच डाला। तब उस कुत्ते ने कहा-“भलाहोतेराभगवान्कीतूनेमुझेबकरानहींबनाया।”
यह है प्रभु का न्याय। यह अपने आराध्य, अपने ईष्ट, अपने ईश्वर और अपने गुरु पर विश्वास की बात है। जिन्होंने इस विश्वास की चट्टान पर पाँव रख दिया उसके लिये चहुँ ओर सौन्दर्य जाग उठता है, माधुर्य जाग उठता है। उसे दुःख में भी सुख मिलता है, शोक के समय भी प्रसन्नता अनुभव होती है; क्योंकि वह जानता है कि यह यब कुछ उसके भले के लिये है। इसीलिये उपर मैंने यह वेद का यह मंत्र बताया था-
“सुनीतिभिर्नयसि त्रायसे जनं यस्तुभ्यं दाशान् न तमंहो अश्नवत्’’
जो व्यक्ति अपने आप को प्रभु में समर्पित कर देता है। सद्गुरु रुपी परमात्मा उसको अच्छे मार्ग पर ले ही जाता है। जब कोई मनुष्य उत्तम कार्य करने का विचार करता है, तो उसके अन्दर एक नवीन उत्साह उत्पन्न होता है, आनन्द उत्पन्न होता है, साहस उत्पन्न होता है और जब कोई बुरा कार्य करने को तैयार होता है तो उसके मन में शंका, भय और लज्जा उत्पन्न होती है। यह जीवात्मा की ओर से नहीं अपितु परमात्मा की ओर से है। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर बैठा वह परमाराध्य सद्गुरु उत्तम कार्य करने वाले को कहता है-“तूनेजोविचारकियावहबहुतअच्छाहै।आगेबढ़, अवश्य कर, तुझे सफलता प्राप्त होगी। और बुरा कार्य करने वाले को कहता है-“ऐसाकामनकर, यह कार्य गलत है। इसका परिणाम दुःख और अपमान है, कष्ट और संकट है। ”यहईश्वरकीआवाजहै, उनकी प्रेरणा है। परन्तु यह प्रेरणा मिलती किसको है? उनको, जिन्होंने अपने आप को प्रभु में अर्पण कर दिया है, उनका सहारा ले लिया है, उसे अपना बना लिया है।
सद्गुरू कहते हैं, यह मत सोच कि यदि ऐसा है नहीं, तो ऐसा लगता क्यों है? जल का धर्म ठंडक पहुँचाना है, लेकिन जब वह अग्नि के सान्निध्य में जाता है तो वह उसकी दाहकता (जलाने के धर्म) को स्वीकार कर लेता है। वह गर्म जल जब किसी के शरीर पर गिरता है तो कहा जाता है, पानी ने जला दिया। क्या सच है ऐसा कहना? बिलकुल नहीं! जलाया तो है दाहकता ने, जो अग्नि का धर्म था, लेकिन माध्यम बनाया पानी को। और पानी भी अपना स्वभाव भूल स्वयं को गरम स्वभाववाला मानने लगा। बस यही स्थिति तेरी है। सुख-दुःख, शांति-अशांति, लाभ-हानि, जीवन-मरण आदि धर्म शरीर के है, उनकी प्रतीति उस आत्मा में होती है जो तेरा वास्तविक स्वरूप है। जिसका धर्म सत्, चित्, आनंद है।
धर्माऽर्मौ सुख दुःखं मानसनि न ते विभो।
न कर्ताऽसि न भोक्ताऽसि मुक्त एवासि सर्वदा।।
धर्म और अधर्म सापेक्ष शब्द हैं। धर्म क्या है और अधर्म क्या है, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। एक के लिये एक कर्म धर्म होता है जबकि दूसरे के लिये वही अधर्म। एक समय में जो धर्म होता है वही किसी दूसरे समय में अधर्म हो जाता है। एक स्थान पर जो धर्म कहलाता है, वही किसी दूसरे स्थान पर अधर्म कहलाता है। धर्म और धर्म का संबंध व्यक्ति, स्थान और समय सापेक्ष है। धर्म के पीछे जो बात सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य करती है, वह है भावना। और यह भावना तुम नहीं हो। इसीलिये विचार करके देखो, ये धर्म-अधर्म तुम्हारे धर्म नहीं बल्कि मन के धर्म हैं।
यही बात सुख-दुःख के संबंध में भी जानो। सुख-दुःख भी व्यक्ति, समय और स्थान सापेक्ष हैं। और तुम प्रत्येक समय रहते हो। सब बदलता है, तुम नहीं बदलते। विचार कर देखो, तुम न करने वाले हो न ही भोगनेवाले। ये दोनों शब्द भी सापेक्ष हैं। कर्ता है, तो भोक्ता है। जब कर्ता ही नहीं, तो भोगनेवाला कैसे। जो कुछ करता है, वही तो भोगता है। कर्ता तो मन है। उसी में वासनाएं है, इच्छाएं हैं। वही कुछ करने की प्रेरणा देती हैं।
वही कराती हैं। तो मन ही करनेवाला मन ही भोगे। तुम तो मन नहीं। मन तुम्हारी शक्ति पाता है इसलिये तुम मन कैसे हो सकते हो। मन तुम्हारा है, तुम मन नहीं। तुम्हारा मकान हो सकता है, तुम मकान नहीं। सिर्फ अज्ञानवश मकान से खुद को जोड़कर तुम स्वयं को मकान समझने लगे हो। रिक्शेवाले को ‘रिक्शा’ इस शब्द द्वारा पुकारने पर जैसे वह भागा आता है उसी प्रकार धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, कर्ता-भोक्ता आदि जो तुम्हारे मन के धर्म हैं, उन्हें तुमने अपना स्वरूप मान लिया है जबकि असल में ऐसा है नहीं।
इस सूत्र का अंतिम चरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें महर्षि ने ज्ञानमार्ग के परमसिद्धांत को स्पष्ट कर दिया-‘मोक्षं प्राप्त इव’, मोक्ष प्राप्त सा है। मोक्ष प्राप्त नहीं होता, वह तो प्राप्त है। मुक्ति अप्राप्त सी नहीं, प्राप्त की प्राप्ति है। आपने सुनी होगी उन दस यात्रियों की कथा, जिन्हें रास्ते में एक नदी को पार करना पड़ा था। नदी पार करने के बाद उन्होंने सोचा कि क्यों न गिन लिया जाये-दस ही हैं न। कोई छूट तो नहीं गया। नदी में तो बह नहीं गया कोई। सबने गिना। सबकी गिनती नौ की थी। विश्वास हो गया, कोई बह गया। रोना-पीटना शुरू हो गया। वहां से गुजरते एक व्यक्ति ने जब सारा तमाशा देखा तो रोनेवालों से कारण पूछा। उन्होंने कारण बताया। उस व्यक्ति को सारी बात समझ आ गयी। उसने कहा कि कोई नहीं छूटा, कोई नहीं बहा। कोई नुकसान नहीं हुआ। क्योंकि नुकसान ही नहीं हुआ इसलिये रोने-धोने की बात ही नहीं बनती। यात्रियों को विश्वास नहीं हुआ। ऐसा कैसे हो सकता है। गलती एक से हो सकती है नौ से गलती कैसे हो सकती है। बेचारे शायद ये नहीं जानते थे वो कि बारंबारता से सही गलत का कोई लेना-देना नहीं होता। बल्कि जितनी बार दोहरायी जाती है वह उतनी ही पक्की हो जाती है।
खैर, उस गुजरने वाले ने पहले यात्री से ही दोबारा गिनने को कहा। जब उसने नौ गिन लिये तो उसने उस यात्री को संबोधित करके कहा-‘दशमस्त्मसि’ अर्थात् दसवें तुम हो। देखो, हम बाहर की वस्तुओं का गणित कितनी सरलता से कर लेते हैं, जबकि स्वयं के मामले में भूल कर जाते हैं। बताइए वह जो दसवां था, उसकी प्राप्ति हुई या उसकी सिर्फ स्मृति कर ली गयी। महर्षि संकेत देते हैं, जो अप्राप्त था और प्राप्त हुआ उसका क्या भरोसा कि वह फिर अप्राप्त नहीं हो जायेगा। और जो प्राप्त है उसका तो स्मरण मात्र करना है। यही है सिमरन। ‘एव’ शब्द का प्रयोग संस्कृत भाषा में निश्चय के अर्थ में होता है। महर्षि क्षेत्रीय ही नहीं ब्रह्मनिष्ठ भी हैं। इसलिये वह इस शास्त्रसम्मत बात को अपने अनुभव का पुट भी दे रहे हैं। मोक्ष सदा से प्राप्त है, ऐसा शास्त्रवचन है, और महर्षि का स्वयं का अनुभव भी।
एक बात और! इस श्लोक में अष्टावक्र ने जिस सम्बोधन का प्रयोग किया वह भी कम विचारणीय नहीं है। वे अब तुम आदि से आगे ‘आत्मा’ के रूप में शिष्य को संबोधित कर रहे हैं। कहते है न, जिसे आप जो बनाना चाहते हैं, उसे आप वैसा विचारने को मजबूर कर दें, वह वैसा ही हो जायेगा। विचारों में असीम और अलौकिक शक्ति है। महर्षि कहते हैं, हे सर्वव्यापक! तू तो सर्वत्र है, सबमें व्याप्त है। इसीलिये तुझे किसे पाना है। सब प्राप्त ही तो है।
परम् पूज्य सद्गुरू
कैलाश श्रीमाली जी
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