





…तभी तो पूर्ण रूप से गुरूदेव हृदय में स्थापित हो पाते हैं, तभी तो उनका ज्ञान सीधा का सीधा हृदय में उतर जाता है, तभी तो व्यक्ति बैठे-बैठे ही आनन्द के सागर में गोते लगाने लग जाता है, तभी तो जीवन के सभी अभाव मिट पाते हैं- चाहे वह किसी भी प्रकार के हों, तभी तो पूर्णता प्राप्त हो पाती है और तभी तो वह प्राप्त हो पाता है जो चाह कर भी प्राप्त नहीं कर पाता है।
बिना गुरू साधना के अन्य किसी भी साधना का कोई अर्थ ही नहीं, कोई महत्त्व ही नहीं। जीवन में श्रेष्ठ गुरू, उनका दिया गुरू मंत्र और उनके द्वारा दी प्रामाणिक समयानुकूल गुरू साधना तो व्यक्ति के जीवन में तभी प्राप्त हो पाती है, जब वास्तव में उसके द्वारा किया गया त्याग, उसके द्वारा प्रकट की गई श्रद्धा उसके द्वारा की गई तपस्या का प्रतिफल प्राप्त होने का समय आ गया हो। शास्त्रों में प्रमाण है, कि गुरू साधना तभी फलीभूत होती है, जब शिष्य सेवा या त्याग के माध्यम से पूर्ण समर्पित हो जाता है और तभी गुरू को चाहिये, कि वह ऐसे श्रेष्ठ शिष्य को गुरू साधना प्रदान करें।
गुरू जन्मोत्सव दिवस या गुरू पूर्णिमा के अवसर पर ऐसी उच्चस्तरीय साधनाओं को गुरूजन शिष्यों को प्रदान करते हैं। शास्त्रोक्त परम्परा भी यही रही है, क्योंकि गुरू चरणों में उपस्थित होकर यदि गुरू जन्म दिवस पर दिव्य साधनाओं को प्राप्त करता है, तो उसके समान सौभाग्यशाली कोई नहीं होता।
‘गुरू प्राणस्थ धारण साधना’ गुरू साधना की ऐसी ही उच्चस्तरीय साधना है, जिसे गुरू जन्मोत्सव जैसे अवसर पर अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये। जिस प्रकार धूल पड़ने से कपड़ा मैला हो जाता है, उसे पुनः धोने की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गुरू की जो छवि हृदय और प्राणों में अंकित होती है, उस पर भी विषयों की धूल पड़ती है, इस दृष्टि से गुरू प्राणस्थ धारण साधना जैसी शीर्षस्थ साधनाओं को बार-बार जब भी अवसर मिले सम्पन्न कर हृदय पर, मन में, प्राणो में गुरूत्व स्थापन क्रिया करनी ही चाहिये।
प्रातः स्नानादि से नित्य क्रिया से निवृत्त होकर पूजा स्थान में शुद्ध धोती पहन कर आसन पर बैठें। सामने चौकी पर श्वेत या पीत वस्त्र बिछा कर सुन्दर गुरू चित्र स्थापित करें। अपने समीप ही साधना सामग्री-‘गुरू स्थापन यंत्र’ ‘चेतना माला’, ‘रूद्राक्ष’ एवं गुरू गुटिका तथा पूजन की अन्य सामग्री रखें। गुरू चित्र के सामने किसी थाली में कुंकुंम से स्वस्तिक बनाकर उस पर ‘गुरू स्थापन यंत्र’ को स्थापित करें। यंत्र के दाहिनी ओर गुटिका तथा बाई ओर रूद्राक्ष को रख कर धूप, दीप प्रज्जवलित करें। पहले पवित्रीकरण और आचमन करके दोनों हाथ जोड़ कर गुरू प्रार्थना करें।
प्रार्थना
ऊँ सर्व मंगल मांगल्यं चैतन्यं वरदं शुभम्।
नारायणमं नमस्कृत्य गुरू पुजां समाचरेत्।।
अपने सामने किसी पात्र में थोड़ा जल लेकर उसमें कुंकुंम, अक्षत और पुष्प की पंखुडियां मिला ले, उसके बाद उसमें सभी तीर्थो का आवाहन करें-
ऊँ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू।।
भूतापसारण
बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाएं हाथ से ढक दें तथा निम्न मंत्र बोलते हुए सभी दिशाओं में अक्षत छिड़कें-
अपर्सन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः।
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया।।
इसके बाद ‘सर्प विघ्नान् उत्सारय-हूं फट् स्वाहा’ का उच्चारण करते हुए दाएं पैर की ऐड़ी से 3 बार भूमि पर आघात करें। तत्पश्चात् समस्त गुरूओं को दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करें और आगे दिये प्रणाम मंत्रों का उच्चारण करें-
ऊँ ऐं गुरूभ्यो नमः।
ऊँ ऐं परम गुरूभ्यो नमः।
ऊँ ऐं परात्पर गुरूभ्यो नमः।
ऊँ ऐं पारमेष्ठि गुरूभ्यो नमः।
गुरू पंक्ति को प्रणाम करने के बाद अपने हृदय में गुरू तत्व को स्थापित करें-
ऊँ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्री निखिलेश्वरानन्द देवतायाः प्राणा इह प्राणाः।
ऊँ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौ हसः श्री निखिलेश्वरानन्द देवतायाः जीव इह स्थितः।
ऊँ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं हौं हंसः श्री निखिलेश्वरानन्द देवतायाः सर्वेन्द्रियाणि।
ऊँ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्री निखिलेश्वरानन्द देवतायाः
वाङ्मनष्च चक्षु श्रोत जिह्वा घ्राण प्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।
अब अपने को गुरूत्व चेतना से सम्पन्न अनुभव करें।
मातृका न्यास (विनियोग)
दाहिने हाथ में जल लेकर विनियोग करें-
ऊँ अस्य मातृका मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः, मातृका सरस्वती देवता, ह्रीं बीजानि, रचरा शक्तयः अव्यंक्त कीलकं सर्वाभीष्ट सिद्धये मातृका न्यासे विनियोगः।
इसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए विभिन्न अंगो को दाएं हाथ से स्पर्श करें-
ऊँ ब्रह्मणे ऋषये नमः – सिर
ऊँ गायत्रीच्छन्दसे नमः – हृदय
ऊँ मातृका सररचत्यै देवतायै नमः -मुख
ऊँ हत्भ्यो बीजेभ्यो नमः – मूलाधार
ऊँ स्वरेभ्यः शक्तिभ्यो नमः -दोनो पैर
ऊँ अव्यक्त कीलकाय नमः -सभी अंग
गुरूदेव को दोनों हाथ जोड़कर आवाहन करें-
आवाहयामि रक्षार्थं पूजार्थं च मम कुतोः।
इहागत्य गृहाण त्वं पूजां यागं च रक्षये।।
श्री गुरूदेवाय नमः, आवाहनं समर्पयामि।
आसन
यंत्र व चित्र को पुष्प का आसन दें-
ऊँ सर्वभूतान्तरस्थाय सर्वभूतान्तरात्मने।
कल्पयाम्युपवेषार्थमासनं ते नमो नमः।
इदं पुष्पासनं समर्पयामि नमः।
पाद्यं
चित्र के समक्ष दो आचमनी जल चढ़ायें-
यत् भक्तिलेश सम्पर्कात् परमानन्द सम्प्लवः।
तस्मै ते परमेशान पाचं शुद्धाय कल्पये।।
इदं पाद्यं समर्पयामि नमः।
अर्घ्य
दुर्वाक्षत समायुक्तं बिल्व पत्रं तथा परम्।
शोभनं शंख पात्रस्यं गृहाणार्घ्यं महेश्वर:।।
अर्घ्य समर्पयामि नमः।
आचमन
मन्दाकिन्यास्तु यदवारि सर्व पापहरं शुभम्।
गृहाणाचमनीय त्वं मया भक्त्या निवेदितम्।।
आचमनीयं समर्पयामि नमः।
स्नान
इदं सुशीतलं वारि स्वच्छं शुद्धं मनोहरम्
स्नानार्थं ते मया भक्त्या कल्पितं प्रतिगृह्यताम्।।
स्नानं समपर्यामि नमः।
यंत्र के साथ रूद्राक्ष एवं गुटिका का भी उपरोक्त प्रकार से पूजन करते रहे, उन्हें भी स्नान, अक्षत, धूप आदि से पूजन करते रहें।
वस्त्र
मायाचित्र पटाच्छत्रं निजगुह्यताम्।।
वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि नमः।।
तिलक
महावाक्योत्थ विज्ञानं गन्धाढयं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम्।।
चन्दनं समर्पयामि नमः।सकुंकुमं अक्षतान् समर्पयामि नमः
चन्दन एवं अक्षत चढ़ाएं।
धूप, दीप नैवेद्यं
शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादुचोत्तमं।उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।।
शुद्ध जल से पांच बार आचमन करावें।
इसके बाद मुख शुद्धि के लिये पान समर्पित करें-
ताम्बूलं समर्पयामि नमः।
इसके बाद चैतन्य माला से निम्न मंत्र की एक माला जप सम्पन्न करें-
फिर गुरू आरती सम्पन्न करके पुष्पांजलि समर्पित करें। यह 3 माह की साधना है, इसमें नित्य उपरोक्त मंत्र की एक माला जप करना अनिवार्य है, नित्य पूजन सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है। उपरोक्त पूजन को हर माह की 21 तारीख को दुहरा लें तथा प्रसाद घर में सभी को वितरित करे। 3 माह बाद सभी सामग्री को जल में विसर्जित कर दें।
इस साधना द्वारा शनैः शनै साधक के अन्दर गुरूदेव की समस्त शक्तियां स्वतः ही उतरने लगती है, आवश्यकता है तो धैर्य और संयम की।
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