





पर हम देखते हैं- बहुत ही थोड़े, गिने-चुने लोग उसे पाते है। अधिकांश दुःख के गलत मार्ग में भटकते-भटकते, अपनी आह और कराह लिये, एक दिन दुनिया से विदा हो जाते है।
क्यों है ऐसा? सुख चाहकर भी सुख नहीं, आनन्द के लिये एड़ी-चोटी का पसीना बहाकर भी आनन्द नहीं।
कारण बहुत छोटा है। वह यह है कि हम जानते ही नहीं कि आनन्द का स्त्रोत क्या और कहाँ है या यह कि हमने उस स्त्रोत के मुँह को ढक्कन से बन्द कर रखा है। दरवाजा बन्द किये हुए हम प्रियतम की प्रतीक्षा कर रहे हैं और उसके बन्द किये हुए हम प्रियतम की प्रतीक्षा कर रहे हैं और उसके न आने पर उसकी निष्ठुरता की शिकायत भी करते जाते हैं।
तब क्या है आनन्द का स्त्रोत?
विशुद्ध, शाश्वत आनन्द के दो ही उद्गम हैं-
अपने को देना और अपने को पाना, समर्पण और साक्षात्कार।
पर असल में यह अपने को देना और अपने को पाना भी एक ही है। ये एक ही वस्तु के दो नाम या एक पदार्थ के दो पक्ष हैं।
तुम अपने को पाते तभी हो, जब अपने को देते हो। संचय ही दुःख का कारण है, उत्सर्ग और समर्पण ही आनन्द का राजमार्ग है।
कभी सोचा है कि तुमने वर्षो रात-दिन एक करके अपने सुख के लिये जो धन एकत्र किया है, उससे कभी सुख, संतोष और शांति मिली है? उससे तुमने चिन्ता ही पायी है, अतृप्ति ही पायी है। बाजार में जाकर उस धन से तुम वस्तुयें खरीद सकते हो, पर सुख नहीं।
एक दुखिया है, एक जरूरतमन्द है। उसके पास खाने को नहीं है। जब तुम उसे द्रवीभूत होकर दिल से कुछ देते हो, तब कैसा रसमस हो जाता है तुम्हारा मानस। इसी जमीन पर चलते हुये मानो तुम उससे कुछ ऊपर उठे अनुभव करते हो।
माँ अपने बच्चे के आनन्द के लिये खाना-पीना, शरीर सुख, सोना-सब भूल जाती है। अपना सर्वस्व दे सकती है। तभी है वह माँ, तभी है उसका माहात्मय, तभी है उसका सुख।
प्रेमी अपनी प्रेयसी के लिये क्या देने को तत्पर नहीं होता? क्या वह देकर, भयानक कठिनाइयाँ झेलकर भी एक अनिर्वचनीय स्वाद नहीं पाता? स्वाद, जिसे छोड़ने को वह किसी कीमत पर तैयार नहीं, आह्लाद, सुख और आनन्द, जो उसके लिये सब चीजों से ऊपर हैं।
याद रखो- जो महान् है, बड़ा है, वही दे सकता है, वही दे सकता है, वही देता है। इसे उलटकर यों भी कह सकते हैं कि जो दे सकता है, देता है, दाता है, वही महान है। जिसके पास होता है, वही देता है। तुम्हारे पास जो है, उसे देते चलो, बाँटते चलो।
तुम्हारे पास धन नहीं हैं बाँटने के लिये, न हो, परवाह नहीं। एक अपाहिज की सेवा के लिये हाथ तो हैं।
परवाह नहीं यदि तुम सर्वथा निःस्व हो, अपने संगी कराहते मानव के हृदय को अपने आँसू से, अपनी करूणा से नहला तो सकते हो, उसके कलेजे को सहलाकर उसमें करकता काँटा तो निकाल ले सकते हो। थके-हारे, जीवन की बाजी हारे हुए, लड़खड़ाते इंसान को सहारा तो दे सकते हो, जिसकी आँखों का, दिल का दिया भी निराशा की आँधियों में बुझ चुका है, उसकी लाठी तो बन सकते हो।
ऐसा कोई आदमी नहीं है, जिसके पास देने के लिये कुछ न हो।
ऐसा कोई समय नहीं है, जब तुम कुछ न दे सको।
यह जीवन देने के लिये ही है। अपने को देने का नाम ही ‘प्रेम’ है। जितना ही इसे देते हो, उतना ही यह बढ़ता है। सब कुछ देकर भी वह पूरे का पूरा बच जाता है। वस्तुत देना, उत्सर्ग, समर्पण और प्रेम एक ही वस्तु है। मानव आत्मा शाश्वत विरह से पूर्ण है। वह अपने स्त्रोत से मिलने के लिये विकल है। प्रेम करके ही वह अपनी अपूर्णता को पूरा करती है। प्रेम ही मानव स्वभाव है। जब तक वह प्रेम नहीं करता, प्रेम नहीं देता, तब तक मानो मुर्च्छित है, अपने प्रति विस्मृत है, अपने स्वरूप को भूला हुआ है- उस कस्तूरी-मृग की भाँति, जो सुगन्ध की खोज में मतवाला बना घूमता है, जब कि स्वयं ही उस मृदु गन्ध का स्त्रोत और स्वामी है।
इसी से कहते हैं, देना ही आनन्द की स्थिति है।
यदि तुम्हारे पास धन है तो धन दो।
यदि तुम्हारे पास तन है तो तन दो।
यदि तुम्हारे पास मन है तो मन दो।
यदि तुम्हारे पास वस्त्र है तो वस्त्र दो।
और यदि तुम्हारे पास यह सब कुछ नहीं है तो मुस्कान दो।
जब कुछ भी न हो तो हृदय कहाँ जायेगा? वह तो है। बस, वह हृदय दो। इस हृदय दान से महान् और कुछ नहीं हैं।
यही है सुख का मार्ग, आनन्द का स्त्रोत-जितना अपने को दे सको, दो।
अपने लिये सभी रोते है। इसीलिये दुःख है, इसीलिये छटपटाहट है, इसीलिये पराजय है, इसीलिये पीड़ा है।
कभी दूसरे के लिये रोकर देखो- एक ही बार, आजमाइश के तौर पर। वह आनन्द, वह स्वाद मिलेगा कि फिर अपने लिये रोने का नाम न लोगे।
अपने लिये जीना ही दुःख है।
दूसरों के लिये जीना ही सुख है।
अपने बच्चों के लिये जियो, अपनी पत्नी के लिये जियो, अपनी माता के लिये जियो, अपने पिता के लिये जियो, अपने मित्रों, बन्धु-बान्धवों के लिये जियो, अपने देश के लिये जियो, मानव-मात्र के लिये जियो।
जिस सीमा तक तुम दूसरों के लिये जियोगे, उसी सीमा तक आनन्द के निकट होंगे।
राम ने पिता के लिये राज दे दिया, भरत ने उस राज में रहते हुये भी राज छोड़ दिया, कृष्ण ने सब कुछ पाकर भी सब कुछ छोड़ दिया, बुद्ध ने दुःखी मानव के लिये, सुख का अनुसन्धान करने के लिये सांसारिक वैभव एवं ऐश्वर्य का त्याग किया, दूसरे जिये, इसलिये ईसा ने जीवन दिया। यह अपने को उत्सर्ग करना, अपने को देना ही परम पौरूष है।
तुम कहोगे, ये बडों की बातें है, इसे हम सामान्य जन कहाँ कर सकते है? पर तुम भूलते हो। संसार में कोई ऐसा प्राणी नहीं हैं, जो जान में या अजान में अपना कुछ – न-कुछ बिना समर्पण किये-थोड़ा या बहुत – वह एक क्षण जी नहीं सकता। आवश्यकता इतनी ही है कि इस विवश देने को हार्दिक देन में बदल दो। विवश होकर नहीं, स्वेच्छा से दो, दिल से दो, प्रेम से दो। जो प्रेम से देता है, वही वस्तुतः देता है और जब यह प्रेमदान की क्रिया आरम्भ होती है तो ऐसा अनिर्वचनीय सुख मिलता है कि फिर कोई उस दान की धारा की गति रोक नहीं सकता है। एक बार देने का स्वाद मिला कि फिर मनुष्य देता ही जाता है, यहाँ तक कि अपने को पूरा-का पूरा लुटा देता है।
इसलिये सुख चाहते हो, आनन्द के लिये भटक रहे हो तो जितना भी दे सको, दो। अपने जीवन की गति संचय की ओर से दान की ओर मोड़ दो।
यह जरा भी मुश्किल नहीं, बिलकुल तुम्हारे स्वभाव के, प्रकृति के अनुकूल है। एक बार करके देखो, आजमाकर देखो, फिर किसी को कहना नहीं पडे़गा, किसी को सिखाना न होगा। देकर स्वयं देखो, देने में कितना आनन्द है।
और जो अपने को दे देता है, पूरा-का-पूरा दे देता है, वह सब कुछ पा जाता है। वह निःस्व होकर भी पूर्ण हो जाता है। वह अपने को देकर ही अपने को पा लेता है। यह आत्मदान जड़ में प्राण की सृष्टि करता है, यह समर्पण मरण की सेज पर अमृत हो जाता है।
बस, आनन्द का यही एक राजमार्ग है- अपने को लुटाना, अपने को देना। देते चलो, लुटाते चलो और घूँघट उठाकर अपने हृदय में छिपे परम प्रियतम को निहार लो। देखो, एक बार करके देखो, आनन्द मिलेगा, अवश्य मिलेगा।
‘घूँघट के पट खोल री, तोको पीव मिलेंगें।’
सस्नेह आपकी मॉं
शोभा श्रीमाली
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