





मैं और मेरा तेरा तथा मानव की इच्छाएँ, कामनाएँ अभिलाशाएँ, अभिमान और सांसारिक चीजों से मोह (जैसे- मेरा घर, मेरी संतान, मेरी जायदाद) आदि ऐसी प्रवृत्तियाँ है, जो चिन्ता को जन्म देती है। कभी-कभी ये ही प्रवृत्तियाँ जब ईर्ष्या-द्वेष और वैर-विरोध-जैसी दुष्प्रवृत्तियों में परिवर्तित हो जाती है तो वे भी चिन्ता को जन्म देने एवं उसे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है। इसलिये गोस्वामीजी ने श्रीरामचरितमानस में इन सबको माया के परिवार का सदस्य बताया है-
चिंता साँपिनि को नहीं खाया। को जग जाहि न व्यापी माया।।
कीट मनोरथ दारू सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा।।
सुत बित लोक ईर्ष्या तीन। केहि कै मति इन्ह कृत न मलीनी।।
यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।।
माया समस्त जगत्को नचानेवाली है, परन्तु वह स्वयं भगवान् श्रीराम की दासी है। अतः प्रभु श्रीराम की शरण गहने वाले उनके भक्तों पर वह निष्प्रभावी रहती है। अतः इन समस्त मायासम्बन्धी विपत्तियों से बचने के लिये एकमात्र मायापति श्रीभगवान् का चिन्तन ही श्रेयस्कर है। समस्त चिन्ताएँ उन्हीं परम प्रभु के भरोसे छोड़कर हमें निश्चिंत हो जाना चाहिये।
यह सत्य है कि मानव-जीवन में सुख-दुःख आते-जाते रहते है। मूलतः सुख और दुःख तो आने-जानेवाली परिस्थितियाँ है। इनसे विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। इन दोनों स्थितियों में यथासम्भव समभाव रखने का ही प्रयत्न करना चाहिये, इसे चिन्ता का विषय नहीं बनाना चाहिये। दुःख भी भगवान् का भेजा हुआ प्रसाद ही है। भक्तिमती देवी कुन्ती ने तो भगवान् श्रीकृष्ण से बार-बार विपत्तियाँ आने का वरदान माँगा था, जिससे कि उन्हें सदैव भगवान् का स्मरण होता रहे। वस्तुतः भगवान् का स्मरण होना ही सबसे बड़ी सम्पत्ति और उनका विस्मरण ही विपत्ति अर्थात् चिन्ता का विषय है। अतः दुःखों, कष्टों से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय भगवत्समरण और भगवच्चिन्तन ही है। बस, यही चिन्तन ही हमें चिन्ता से मुक्ति दिलाता है। चीनी दार्शनिक चिंग चाओके शब्दों में, ‘जो समय चिन्ता में गया, समझो वह कुडेदान में गया, किंतु जो समय चिन्तन में गया, समझो वह तिजोरी में जमा हो गया।’
यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो चिन्तन का स्थायी निवास हमारे अन्तर्मन में ही है। अतः हमें उसे बाहर न ढूँढकर अपने अन्तर्मन में ढूँढ़ना चाहिये। चिन्तन जहाँ चिन्ता के निवारण की एकमात्र औषधि है, वहीं वह नैसर्गिक आनन्द की प्राप्ति भी करता है। चिन्तन ही हमारे जीवन का सम्बल है जो हमें चिन्तामुक्त करते हुए उत्तरोत्तर प्रगति की ओर उन्मुख करता है। चिन्तन ही हमारे जीवन को सँवारता, सुधारता है तथा उसे एक नयी दिशा देता है।
अब यहां प्रश्न उठता है कि हम चिन्तन का श्रीगणेश कहाँ से और कैसे करें? वास्तव में उत्कृष्ट विचार अथवा सादा जीवन और उच्च विचार ही चिन्तन का मूल बिन्दू है। यही उत्कृष्ट विचार जहाँ हमारे व्यक्तित्व को निखारता है, वहीं वह हमारे विवेक को भी जाग्रत् करता है, जिससे हम परिवार तथा समाज में एक विशिष्ट स्थान पाते है और हमारा आध्यात्मिक पथ भी प्रशस्त होता जाता है। सात्त्विक और शालीन चिन्तन के क्रम में सामाजिक समृद्धि, राष्ट्रीय समरसता और सौहार्द को बरकरार रखने के लिये हमें उत्कृष्ट विचारों का सहारा लेना चाहिये। भारतीय संस्कृति ‘विश्वबन्धुत्व’ की भावना की पोषक है। वह संसार के सभी प्राणियों को सुखी और समृद्ध देखना चाहती है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चितदुःखभाग्वेत्।।
उक्त श्लोकों में संसार के सभी प्राणियों की समृद्धि तथा उनके सुख और अच्छे स्वास्थ्य की मंगल कामना की गयी है। अतः यदि हम इसी श्लोक को अपने विचारों की आधारभूमि मान लें तो निःसंदेह हमारे विचार मानवता की रक्षा तथा उसके उन्नयन और विकास में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। उत्कृष्ट विचारों को कार्यरूप में परिणत करने के लिये सर्वप्रथम हमें अपने कर्तव्यों का निर्धारण तथा उनके पालन का संकल्प लेना होगा। चूँकि कर्त्तव्यों के निर्धारण में प्रायः शास्त्रसम्मत निर्णय ही प्रमाण हुआ करते है, इसलिये शास्त्रानुसार जो कार्य अपने अथवा किसी भी अन्य जीव के लिये इन लोक या परलोक में हितकारी है तथा जो कार्य पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय हित के संवर्द्धन तथा विकास में सहायक सिद्ध होते है, वे ही हमारे कर्तव्य है जिनका पालन हमें पूर्ण मनोयोग से करना चाहिये।
‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ को हमें अपने जीवन का मूलमन्त्र मानना चाहिये। दूसरे शब्दों में हमें दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिये जो हम दूसरों से अपने लिये चाहते हैं। सत्पात्रों को सत्प्रयोजन हेतु दी गयी सहायता जितना दूसरों को लाभ पहुँचाती है, उतना ही वह अपना स्तर उठाने तथा अपनी आध्यात्मिक समृद्धि बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध होती है। इसलिये गाढ़े दिनों के मीत बनकर दुःखी जनों को धैर्य बंधाना तथा उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करना आदि ऐसे कार्य है, जिन्हें हम बेझिझक और सुगमतापूर्वक कर सकते है।
यहाँ बृहदारण्यकोपनिषद् के निम्न मन्त्र को दिया जा रहा है, जिसमें भारतीय मनीषा एवं भारतीय संस्कृति की चिन्तन प्रतिबिम्बित होती है-
असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमया मृत्योर्मामृतं गमय।
तीन खण्डोंवाले इस मन्त्र का प्रथम खण्ड हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलता है। दूसरे शब्दों में यह मन्त्र हमें नश्वर जगत् के क्षणिक सुखों से विरत कर सच्चिदानन्द (अर्थात् सत्, चित्, आनन्द) की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
मन्त्र के द्वितीय खण्ड का ‘तमस्’ शब्द मानव में व्याप्त अज्ञान, निराशा, जड़ता, हिंसा, तथा मोह का द्योतक है। अतः मन्त्र के इस खण्ड में ईश्वर से प्रार्थना की गयी है कि वह मानव को उक्त सारे दुर्गुणों से मुक्त कर उसे ज्ञान तथा विवेकरूपी प्रकाश की ओर ले चले।
मन्त्र का तीसरा खण्ड तो हमें मृत्यु से अमरता की ओर बढ़ने का संदेश देता है। लेकिन इस मन्त्र का निहितार्थ लौकिक मृत्यु (जो अवश्यम्भावी है)- से मुक्ति के स्थान पर मृत्युरूपी अपयश एवं देहासक्ति से अपने को मुक्त कर अजर-अमर आत्मा का स्वरूप धारण करने पर विशेष बल देता है।
अतः अन्त में हम निष्कर्ष स्वरूप यही कह सकते हैं कि यदि हम चिन्ता की जगह उत्कृष्ट चिन्तन करें तो निश्चित ही हम सदैव स्वस्थ और प्रसन्नचित रहने के साथ ही साथ जीवन के वास्तविक आनन्द की भी प्राप्ति कर सकते है।
सस्नेह आपकी मॉं
शोभा श्रीमाली
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