





इन संन्यासियों का मंत्र क्या है? इनकी साधना क्या है? संन्यासी का मंत्र तो अनाहत है। वह जो अनाहत चक्र है, वहीं वह चोट करता है। उस चोट की अपनी ध्वनियां हैं, जिनसे अनाहत पर चोट की जाती है। जैसे सोहस्, अनाहत पर चोट करने का ध्वनि-सूत्र है।
आपने कभी खयाल न किया होगा कि जब भी आप कोई शब्द बोलते हैं, तो उसकी चोट आपके शरीर के अलग-अलग हिस्सों में पड़ती है। अगर आप भीतर कहें ओम, तो हृदय से नीचे तक ओम की ध्वनि नहीं जायेगी। ओम का अधिक गुंजार मस्तिष्क में होगा।
हर शब्द की गहराई है आपके भीतर। हर ध्वनि आपके भीतर अलग गहराइयों तक प्रवेश करती है। इसलिये मंत्र गुरू के द्वारा दिया जाता रहा। उसका और कोई कारण नहीं था। और जब गुरू मंत्र देता है, तो कई दफे लेने वाले को लगता है कि अरे, यह मंत्र! यह तो हमें पहले ही मालूम था। और गुरू के पास गये, उन्होंने बड़े एकान्त में, कहा कि राम-राम बोलना। हद हो गई, यह भी कोई मंत्र हुआ? यह राम-राम किसको पता नहीं है? यह तो हम पहले ही से बोल रहे थे। तो गुरू ने ऐसा कौन सा खूबी का काम कर दिया,यह बता कर कि राम-राम बोलना। उसके कारण और हैं। राम-राम तो आपको परिचित हैं, लेकिन आपके उपयोग का है या नहीं, यह आपको पता नहीं है।
और कई बार गलत मंत्रों का उपयोग लोग करते रहते हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिये। क्योंकि हो सकता है, उन मंत्रों के उपयोग से उनके भीतर जहां चोट पड़ती हो, वह उन्हें कठिनाई में डाल दे। आज की अधिकतम बीमारियां, आज की अधिकतम चिंता, आज की अधिकतम परेशानी, गलत मंत्रों व क्रियाओं के उपयोग से जुड़ी हुयी है। तो अगर इस युग में कोई भी रूपांतरण करना है, तो एक ऐसी ध्वनि का उपयोग करना पड़ेगा, जो सत् ऊर्जा को जगाये और कुंडलिनी की तरफ प्रवाहित कर दे।
संन्यासी का मंत्र अनाहत है, क्योंकि संन्यासी वह है जिसकी ऊर्जा कुंडलिनी की तरफ चल पड़ी है। उसे वहां चोट करने का सवाल नहीं है। अब वह अनाहत पर चोट करे। अनाहत, सोहम्।
अनाहत का अर्थ होता है, जो बिना चोट के पैदा हो – बिना आहत, बिना किसी चोट के। अगर हम दोनों तालियां बजायें तो यह आहत ध्वनि है। क्योंकि दो चीजों की चोट हुई, तब यह पैदा हुई। जो भी ध्वनि चोट से पैदा होगी, वह आहत ध्वनि है। वह अनाहत चक्र तक नहीं पहुंचेगी। अनाहत तक एक ही ध्वनि पहुंच सकती है, जो बिना चोट के पैदा होती है।
जापान के एक गुरू अपने साधक से कहते है कि जाओ और खोजो उस ध्वनि को, जो एक ही हाथ से पैदा होती है। एक ही हाथ से कोई ध्वनि पैदा नहीं होती। एक ध्वनि है जो अनाहत है, जैसे सोहम्। सोहम् आपको पैदा नहीं करना पड़ता। अगर आप शांत बैठ जायें और केवल अपनी श्वासों को देखते रहें आते और जाते, सिर्फ श्वास को देखते रहें। थोड़ी ही देर में श्वासों में सोहम् का उच्चारण शुरू हो जायेगा बिना आपके। श्वासों की गति ही सोहम् के उच्चारण को पैदा करती है। श्वास के होने में ही सोहम् की ध्वनि छिपी हुई है। इसलिये सोहम् न तो संस्कृत, न किसी और भाषा का है। सोहम्, कहें, निसर्ग की ध्वनि है, जो आपके भीतर श्वास से पैदा होती रहती है।
यह अनाहत ध्वनि है। इस ध्वनि की चोट अनाहत चक्र पर होती है। और इस ध्वनि की चोट बड़ी गहरी और बड़ी बारीक और बड़ी सूक्ष्म है। और अनाहत चक्र में वह सारी शक्ति छिपी है, जो ऊर्ध्वगमन के लिये साधन बनती है।
संन्यासी का मंत्र अनाहत है। वह ऐसे मंत्र का उपयोग नहीं करता जो होंठों से बोला जाये। क्योंकि जो होंठों से बोला जायेगा, वह होंठों से गहरा नहीं जाता। वह ऐसे मंत्र का उपयोग नहीं करता, जो कंठ से बोला जाये। क्योंकि जो कंठ से बोला जायेगा, वह कंठ तक ही रह जाता है। वह ऐसे मंत्र का उपयोग नहीं करता, जो मन से बोला जाये। क्योंकि जो मन से बोला जायेगा, वह मन के पार नहीं ले जा सकता।
ऋषियों ने एक ऐसे मंत्र को खोजा है, जो अनाहत है। जो न कंठ से बोला जाता है, न होंठ से बोला जाता- जो बोला ही नहीं जाता, अबोला है, अजपा है। उसका जप नहीं होता। उसका जप चल ही रहा है, सिर्फ हमने सुना नहीं है। जैसे कभी अंधेरी रात में सन्नाटा होता है। आप गपशप में लगे हैं, सुनाई नहीं पड़ता है। फिर गपशप बंद हो गई, आप अकेले बैठे हैं, अचानक चारों तरफ सन्नाटे की आवाज गूंजने लगती है। वह जब आप बोल रहे थे, तब भी गूंज रही थी, लेकिन आपके बोलने में इतनी दबी थी।
हम जब बंद हों, तो हमें अनाहत नाद का पता चले। वह चल रहा है पूरे वक्त। कहना चाहिये वह जैविक है, Built-in। वह हमारे होने में ही है। जब कुछ भी ध्वनि नहीं रह जाती भीतर, तब भी एक ध्वनि रह जाती है, जो हमारी पैदा की हुई नहीं है, अनाहत है। अपने आप हो रही है, स्व-आविर्भूत है। उस ध्वनि का नाम अनाहत है। और वह ध्वनि जहां चोट करती है, उस चोट के स्थान का नाम अनाहत चक्र है।
और अनाहत की वह ध्वनि ही संन्यासी का मंत्र है, क्योंकि संन्यासी उसकी ही खोज पर निकला है, जो असृष्ट है। संसारी उसकी खोज पर निकला है, जो बनाया हुआ है, बनाया गया है। संन्यासी उसकी खोज पर निकला है, जो अनबना है, जो बना नहीं है। अगर अनबने को खोजना है, अनबना ही ब्रह्म है, तो फिर अनबने साधन से ही खोजना पड़ेगा।
अक्रिया ही वह अनबना साधन है, अक्रिया ही संन्यासियों की साधना है। वह अक्रिया में ही प्रतिष्ठित रहता है क्रिया करते हुये भी। क्रिया तो संन्यासी भी करेगा। चलेगा, उठेगा, बैठेगा, सोयेगा, भोजन करेगा, थकेगा, विश्राम करेगा। क्रिया तो संन्यासी को भी करनी ही पड़ेगी। इस जगत में क्रिया तो अनिवार्य है। इसलिये अगर कोई सोचता हो कि अक्रिया कर लूंगा, तो संन्यासी हो जाऊंगा, तो गलती है। अक्रिया तो सिर्फ मरने से ही होती है। जीवन में क्रिया अनिवार्य है। जीवन क्रियाओं का नाम है। फिर संन्यासी क्या करेगा? गृहस्थ भी क्रिया करता है, संन्यासी भी क्रिया करना है, फिर फर्क क्या रहा? गृहस्थ भी चलता है, संन्यासी भी चलता है, फिर फर्क क्या रहा? प्रतिष्ठा का फर्क है।
चलते वक्त गृहस्थ चलने में ही प्रतिष्ठित हो जाता है, बोलते वक्त बोलने में ही प्रतिष्ठित हो जाता है, भोजन करते वक्त भोजन करने में ही प्रतिष्ठित हो जाता है। संन्यासी इन क्रियाओं से दूर खड़ा देखता रहता है। उसकी प्रतिष्ठा अक्रिया में बनी रहती है। संन्यासी क्रिया करते हुये भी अक्रिया में प्रतिष्ठित रहता है- उसका मूल ध्यान व चिंतन अनाहत की वह ध्वनि ही रहती है, जिसकी खोज में वह नित्य लगा रहता है।
संन्यासी का उठना, बैठना, बोलना, करना, सोचा-विचारा नहीं है, सहज है। जैसे हवायें बहती हैं और पानी दौड़ता है सागर की तरफ और आग की लपटें दौड़ती हैं आकाश की तरफ, ऐसा ही स्वभाव में रहता है संन्यासी। परब्रह्म में बहना ही उनका आचरण है। चलते भी नहीं, तैरते भी नहीं, बस उस दिव्य परमात्मा में बहते हैं। यही उनका आचरण है।
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