





गुप्त नवरात्रि विशेष रूप से उन साधकों के लिए होती है जो महाविद्याओं की उपासना, तांत्रिक प्रयोग अथवा आत्मबल बढ़ाने की साधना करते हैं। यह काल विशेष रूप से बहुत ही शक्तिशाली ऊर्जा से परिपूर्ण होता है। तंत्र शास्त्र के अनुसार, इस दौरान साधना, मंत्र-जप, अनुष्ठान व ध्यान की क्रियायें अत्यंत गोपनीय होनी चाहिये, तभी यह फलदायी होती है। इस समय माँ दुर्गा के दस महाविद्याओं जैसे काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भैरवी, बगलामुखी आदि की साधना की जाती है। ये शक्तियाँ साधक को सिद्धि, सुरक्षा और आत्मज्ञान प्रदान करती हैं। क्योंकि, यह पर्व भीड़-भाड़ से दूर मनाया जाता है, इसलिए यह ध्यान, मंत्र-जप, मौन और आत्मनिरीक्षण का सर्वोत्तम समय माना जाता है। गुप्त नवरात्रि के दौरान किए गए तांत्रिक प्रयोग और देवी साधनाएँ नकारात्मक शक्तियों का शमन, शत्रुओं का नियंत्रण और दुर्घटनाओं से सुरक्षा प्रदान करती हैं। यह नवरात्रि पर्व गुप्त साधना और शक्ति जागरण का समय है, इस हेतु यह पर्व उनके लिये सर्वश्रेष्ठ है जो शक्ति की गहराई में उतरना चाहते हैं। इस नवरात्रि के दिवसों में की गई सच्ची और शुद्ध साधना से रहस्यमयी सिद्धियाँ (इच्छानुसार फल) की प्राप्ति निश्चित ही होती है।
यह तो प्रकृति का एक साधारण नियम है कि शक्ति तत्व के बिना इस सृष्टि में कोई भी क्रिया-प्रतिक्रिया संभव नहीं है, इसीलिए साधकों को शक्ति-साधना करने की आवश्यकता बताई गई है। यहां तक कि जितने भी देवता हैं- विष्णु, शिव या ब्रह्मा उन सब ने ही शक्ति तत्व को ही धारण किया है, जिसके आधार पर वे सृष्टि को गतिशील करते हैं।
भारतीय अध्यात्म में ‘शक्ति’ को विशेष स्थान दिया गया हैं, यहां तक कि उसकी अनुपस्थिति में शिव को भी ‘शव’ के समान ही माना गया है। भगवत्पाद शंकराचार्य जी-ने ‘सौन्दर्य लहरी’ में भगवती की स्तुति करते हुये कहा है, कि यदि शिव शक्ति से युक्त न हों, तो उनमें सामान्य रूप से हलचल भी संभव नहीं है। शक्ति ही शिव की आत्मा है। बिना आत्मा के शरीर जिस प्रकार निर्जीव पड़ा रहता है, उसी प्रकार से शिव भी शक्ति के बिना निर्जीव रहते हैं।
यदि सही अर्थों में देखा जाय, तो सृष्टि का प्रत्येक कण ही शक्ति तत्व से आपूरित है। शक्ति तत्व की आराधना-उपासना करने का यों तो कोई विशेष काल या क्षण नहीं है, क्योंकि जब भी बालक किसी आपदा में फंसता है, तो वह काल तथा क्षण का निर्णय किये बगैर ही मां का आवाहन कर लेता है और मां को उसके समक्ष प्रस्तुत होना ही पड़ता है। फिर भी कुछ क्षण विशेष में प्रकृति व मां की अमृत वर्षा को साधक निरन्तर अनुभव कर सकता है। ऐसा ही क्षण होता है गुप्त नवरात्रि का, जिसके सम्बन्ध में स्वयं भगवती ने कहा है-
गुप्तकाल महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वां भक्ति समविन्तः।।
सर्व बाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादने भविष्यति न संशयः।।
अर्थात् ‘गुप्त नवरात्रि में जो साधक मेरी साधना सम्पन्न करता है, उसे मैं धन, धान्य, पुत्र, यश, सम्मान आदि प्रदान कर उसे समस्त बाधाओं से मुक्ति प्रदान करती हूं।’ जब भगवती स्वयं अपने साधक को ये सब कुछ प्रदान करने के लिये प्रयत्नशील रहती हैं, तो साधक के लिये तो मात्र यही क्रिया शेष रहती है कि वह उचित विधि से उनकी साधना कर उनसे सब कुछ प्राप्त कर ले।
भौतिक रूप से वह देवों के समान सभी सुखों का उपभोग स्थायी रूप से कर पाने में सक्षम होता है। उच्चकोटि के योगियों-सन्यासियों ने भी शक्ति तत्व की साधना सम्पन्न की और फिर उस परब्रह्म को प्राप्त कर सकने में समर्थ हुये। स्वयं राम ने भी रावण से युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिये ‘शक्ति तत्व’ की ही साधना सम्पन्न की थी।
प्रत्येक व्यक्ति, सन्यासी, योगी इस प्रकार की साधना को सम्पन्न करने मे गौरव अनुभव करता है और फिर कलयुग में तो ‘क्लौं चण्डी विनायकौ’ कलयुग में तो गणपति और जगदम्बा ही शीघ्र सिद्धि देने वाली शक्ति हैं। अन्य देवताओं की साधना जहां कठिन है, लम्बी है, वहां जगदम्बा और गणपति की साधना सरल है, सामान्य है, स्पष्ट है, शीघ्र सिद्धिदायक है।
जिसकी साधना करने से हाथों-हाथ फ़ल मिलता है, सभी स्वरूपों में रक्षा करने, धन प्राप्ति, परिवार की उन्नति स्वास्थ्य-कामना की साधना हो सभी प्रकार की इच्छाओं का परिपालन जगदम्बा की साधना में ही निहित है। भगवती जगजननी की इसी प्रकार प्रति क्षण सूक्ष्म या स्थूल उपस्थिति मानना ही यथार्थ में ‘आस्था’ और इस प्रकार मानते हुये सदैव प्रमुदित रहना ही ‘साधना’ या ‘उपासना’ है, क्योंकि ‘मां’ को अपने शिशु से मुस्कान की अपेक्षा होती है, किसी आरती या धन्यवाद की नहीं।
अतः जो साधक शक्ति तत्व की साधना सम्पन्न करता है वह निरन्तर उच्चता की ओर अग्रसर होता चला जाता है। भगवती दुर्गा के स्वरूप का वर्णन करना तो सहज नहीं है, क्योंकि जिनकी आभा कोटि सूर्य के समान प्रभावान हो, जिसमें समस्त ब्रह्माण्ड की गति, चेतना, समाहित हो, वे प्रकट हो भी जायें, तो भी साधक में यह सामर्थ्य नहीं होता कि वह उनके उस परब्रह्म स्वरूप का विवेचन कर सके, उनकी स्तुति कर सके।
दस महाविद्याओं के मंत्र (बीज मंत्र सहित)-
इस मंत्र का जाप भय नाश, शत्रु निवारण और रक्षण के लिए किया जाता है।
यह मंत्र संकट से मुक्ति देता है।
यह मंत्र सौंदर्य, आकर्षण और इच्छापूर्ति के लिए जपा जाता है।
यह मंत्र व्यापकता और प्रबंध शक्ति के लिए जपा जाता है।
यह मंत्र ऊर्जा जागरण और कुटिलता नाश के लिए जपा जाता है।
यह मंत्र आत्मबल और अभय पाने के लिए जपा जाता है।
यह मंत्र वैराग्य, विधवा विद्या और रहस्यात्मक शक्ति प्रदान करता है।
यह मंत्र शत्रु स्तंभन और विवाद नियंत्रण में मदद करता है।
यह मंत्र वाणी शक्ति, कला, संगीत और विद्या प्रदान करता है।
यह मंत्र धन, वैभव, सौभाग्य और लक्ष्मी कृपा प्रदान करती है।
मंत्र का जाप करने के नियम महाविद्याओं के गूढ़ मंत्र द्वारा मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है। जाप से पहले आसन, स्थान और मानसिक शुद्धि आवश्यक है। मंत्रों का जप प्रत्येक महाविद्या से संबंधित विशेष मंत्र सिद्ध चैतन्य माला से ही करना चाहिये। मंत्र का उच्चारण स्पष्ट और श्रद्धापूर्वक होना चाहिये, तब ही इसका पूर्ण लाभ प्राप्त होता है।
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