





मनुष्य का शरीर अपने आप में सृष्टि के सारे क्रम को समेटे हुये है और जब यह क्रम बिगड़ जाता है, तो शरीर में दोष उत्पन्न होते हैं, जिसके कारण व्याधि, पीड़ा, बीमारी का आगमन होता है, इसके अतिरिक्त शरीर की आन्तरिक व्यवस्था के दोष के कारण मन के भीतर दोष उत्पन्न होते हैं, जो कि मानसिक शक्ति, इच्छा को हानि पहुँचाते हैं, व्यक्ति की सोचने-समझने की बुद्धि क्षीण होती है, इन सब दोषों का नाश सूर्य तत्व को जाग्रत कर किया जा सकता है। क्या कारण है कि एक मनुष्य उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता है और एक व्यक्ति पूरा जीवन सामान्य ही बना रहता है, दोनों में भेद शरीर के भीतर जाग्रत सूर्य तत्व का है। नाभिचक्र, सूर्य चक्र का उद्गम स्थल है और यह अचेतन मन के संस्कार तथा चेतना का प्रधान केन्द्र है, शक्ति का स्त्रोत बिन्दु है, साधारण मनुष्यों में यह तत्व सुप्त होता है,न तो इनकी शक्ति का सामान्य व्यक्ति को ज्ञान होता है और न ही वह इसका लाभ उठा पाता है। इस तत्व को अर्थात् भीतर के मणिपुर सूर्य चक्र को जाग्रत करने के लिये बाहर के सूर्य तत्व को आत्मसात करना आवश्यक है, बाहर का सूर्य अनन्त शक्ति का स्त्रोत है और इसको जब भीतर के सूर्य चक्र से जोड़ दिया जाता है तो साधारण मनुष्य भी अनन्त मानसिक, शारीरिक शक्तियों का अधिकारी बन जाता है और जब यह तत्व जाग्रत हो जाता है, तो बीमारी, पीड़ा, बाधाएं उस मनुष्य के पास आ ही नहीं सकती हैं।
सूर्य तेजस्विता का प्रतीक है और प्रकृति को ऊष्मा प्रदान कर धन-धान्य वृद्धि करते हैं, लेकिन हमारे आर्य ऋषियों ने विचार किया कि जब तक मनुष्य धनहीन, दरिद्र है तो उसमें तेजस्विता कैसे आ सकती है, यदि धरती में बीज ही नहीं, तो कैसे पौधा उग सकता है वह वृक्ष बन ही नहीं सकता, ठीक ऐसे ही यदि व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ नहीं है तो उसमें तेजस्विता नहीं आ सकती है। ऋषियों के निष्कर्ष के अनुसार मकर संक्रान्ति के शुभ अवसर पर यदि कोई तीव्र साधनात्मक क्रिया सम्पन्न की जाये तो शीघ्र ही सफलता मिलती ही है। इस हेतु सूर्य उत्तरायण शक्ति चेतना पर्व पर जीवन को उक्त सुस्थितियों से परिपूर्ण करने हेतु सद्गुरूदेव जी वैदिक विधिनुसार सूर्योपासना सम्पन्न कर दीक्षा प्रदान करेंगे। जिससे जीवन सूर्य तेजस्विता युक्त सुख-समृद्धि, सुमंगलमय निर्मित हो सकेगा।
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