





माँ लक्ष्मी के कई प्रकार से, कई विधि द्वारा व कई उद्देश्य से पूजन-व्रत सम्पन्न किये जाते हैं। इस लेख में आप प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली अष्टमी पर सम्पन्न किये जाने वाले माँ लक्ष्मी के चुनरी पूजन व्रत अनुष्ठान के बारे में जानेंगे।
इस व्रत का आरंभ माता लक्ष्मी के जन्म दिवस यानि कि भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को आरंभ किया जाता है। इसी दिवस को “राधाष्टमी”केरूपमेंपर्वभांतिदेशभरमेंमनायाजाताहै। यह व्रत मुख्यत: सुहागिन महिलाओं द्वारा घर की समृद्धि, सम्पन्नता बनाये रखने के लिये, धन प्राप्ति की अभिलाषा व माँ लक्ष्मी की कृपा दृष्टि बनायें रखने के लिये किये जाते हैं। कुंवारी कन्यायें भी श्री भगवान विष्णु समान सर्व गुण सम्पन्न वर प्राप्ति हेतु ये व्रत सम्पन्न करती हैं। साथ ही साथ यह व्रत करने से इनके जीवन में समृद्धि, भौतिक सुख, सौभाग्य, कुशल वैवाहिक जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है।
राधाष्टमी के व्रत पश्चात् प्रत्येक माह को आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर माँ लक्ष्मी का व्रत पूजन किया जाता है जो 16 माह तक सम्पन्न किये जाते हैं।
इस व्रत के अर्न्तगत अपनी सहुलियत अनुसार 16 श्रृंगार सुहाग सामग्री, चुनरी, मुकुट, छत्र, पुष्प, माला, खीर का भोग माँ लक्ष्मी को अर्पित किये जाते हैं। इस दिन एक बार भोजन कर व्रत खोला जाता है। व्रती महिलायें मन्दिर जाकर सभी सामग्री माँ लक्ष्मी को अर्पण कर भजन-पूजन सम्पन्न करती हैं। 16 माह तक व्रत करने के पश्चात् उचित दान किया जाता है। इन व्रत से माँ लक्ष्मी की कृपा अवश्य प्राप्त होती है, जिससे घर के सभी सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति के साथ दीर्घायु, धन-धान्य की परिपूर्णता, कामकाज में सफलता, व्यापार में तरक्की, संतान प्राप्ति, सुख-समृद्धि और वैभव मिलता है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,