





मनुष्य के जीवन में अधिकाशं क्रान्तियां यौवन में ही घटती हैं। एक दिन बहुत सुन्दर घटना घटी, महज तीस वर्ष की आयु में ‘वर्धमान’ नें अपने परिवार और राजपरिवार को, तथा अपनी सांसारिक संपत्तियों का त्याग किया और दुःख, शोक और पीड़ाओं के निवारण का मार्ग खोजने के लिये भिक्षु बन गये।
ऐसा माना जाता है कि ‘वर्धमान’ अपने समय के सबसें सुन्दर व्यक्तियों में से एक थे। शायद मानव इतिहास में कभी भी इतने अद्भुत शरीर और इतनी सुगठित संरचना वाले व्यक्तित्व नहीं हुये। वे सौन्दर्य से प्रेम करते थे; उनके शरीर में व्याप्त सुन्दरता किसी वस्त्रों की मुहताज नहीं थी। वो इतने स्वस्थ थे कि उन पर ऋतुओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।
‘वर्धमान’ ने अपनी इच्छाओं, भावनाओं और आसक्तियों पर विजय पाने के लिये साढ़े बारह वर्ष गहन ध्यान और मौन में व्यतीत किया। लंबे समय अंतराल तक ‘वर्धमान’ बिना भोजन के भी रहे। अथक, असहनीय कठिनाईयों के बावजूद शांत और स्थिर रहे। इसी अवस्था के दौरान उनकी आध्यात्मिक चेतना विकसित हुई और सुषुप्त पड़ी आध्यात्मिक शक्तियाँ पूर्ण रुप से जागृत हुई। अंत में उन्हें पूर्ण बोध, ज्ञान, शक्ति, और आनंद की प्राप्ति हुई। इस अनुभूति को “कैवल्यज्ञान” या “पूर्ण आत्मज्ञान” के रुप में जाना जाता है।
साढ़े बारह वर्ष की कठोर तपस्या के फलस्वरुप ही ‘वर्धमान’, ‘महावीर’ के नाम से सम्पूर्ण विश्व में सुशोभित हुये। भगवान महावीर का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। अनूठा इसलिये कि उनका एक अलग धर्म (जैन धर्म) होते हुये भी, उन्हें हिन्दू धर्म में भगवान शब्द से अलंकृत किया गया है।
महावीर को एक बहुत ही सुंदर नाम दिया गया है- “निर्ग्रन्थ” यानि‘ बंधनरहित’। बुद्ध जब भी महावीर का जिक्र करते हैं तो हमेशा ‘निर्ग्रन्थनटपुत्त’ कहते हैं- यानि नाथ परिवार में जन्मा हुआ वह बालक जो बंधन रहित हो गया हो। जिसकी गाँठें कट गई हो, जो परमसत्ता है, बंधन रहित है, और हम बंधनों से भरे हुये हैं- यही एक मात्र अंतर है।
एक शब्द है ‘इच्छन्तिक’। इसका अर्थ है एक आयामी लोग, जो सत्य के केवल एक पहलु को जानते हैं और ‘इच्छन्तिक’ के ठीक विपरित महावीर और जैन तीर्थंकरों जैसे लोग हैं। इन्हें ‘अनिकन्तिक’ कहा जाता हैं, जो सत्य के हर पहलू को देखते हैं। महावीर बहुआयामी दृष्टिकोण में बहुत गहरे रुप से लीन थे। वे मानव के इतिहास में “सापेक्षताकेसिद्धांत’’ (Theory of Relatability)Þ को लाने वाले पहले व्यक्ति थे।
पश्चिम को इसे समझने में पच्चीस सदियाँ लग गयी। आइंस्टीन ने एक बिल्कुल अलग वैज्ञानिक मार्ग अपनाते हुये सापेक्षता के सिद्धांत का वही दर्शन वही संदेश पहुँचाया।
महावीर अपने सापेक्षता के सिद्धांत में इतने मगन हो गये थे कि उन्होंने कभी किसी बात पर एक ही कथन नहीं किया क्योंकि “कोईभीएककथनकेवलएकपहलूकोहीदर्शाताहै।उन्होंनें यह भी पाया कि प्रत्येक सत्य के केवल सात पहलू होते हैं। इसलिये उनसे केवल एक प्रश्न पूछे जाने पर, वो केवल एक ही प्रश्न के सात उत्तर देंगे और सारे उत्तर एक दूसरे के विरोधाभासी होंगे जो मनुष्य को और भ्रमित कर सकते हैं। जबकि महावीर को पृथ्वी पर अब तक के सबसे स्पष्ट व्यक्तियों में से एक माना जाता है। भगवान महावीर की व्याख्याओं ने बताया कि एक सत्य और वास्तविकता के बहुत जटिल और बहुआयामी पहलु हैं और ऐसी वास्तविकता को समझाने के लिये परस्पर विरोधी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता। यही कारण है कि भगवान महावीर कुछ आत्माओं के लिये नींद की अवस्था बेहतर मानते हैं कुछ आत्माओं के लिये जागृति की अवस्था। पाप कर्मों में लगे व्यक्तियों के लिये नींद बेहतर है और पुण्य कर्मों में लगे व्यक्तियों के लिये जागृति बेहतर है।
भगवान महावीर का ज्ञान इतना विराट था कि उनके द्वारा बोले गये एक-एक शब्द एक गहरी, जटिल और बहुआयामी वास्तविकता (Multidimensional Reality) के संकेत देते हैं। उनके इस असीम ज्ञान और अनुभव का भाषाओं की निश्चित सीमा के कारण पूरी तरह से व्यक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि भाषा मनुष्य की रचना है।
दुनिया के प्रति हमारा अनुभव एक गहरा विरोधाभास प्रस्तुत करता है जिसे हम अस्तित्वगत रुप से अनदेखा कर सकते हैं लेकिन दार्शनिक रुप से नहीं। यही विरोधाभास परिवर्तन का विरोधाभास है। ‘अमुक’ बदलता है इसलिये स्थायी नहीं हो सकता; दूसरी तरफ़ यदि ‘अमुक’, स्थायी नहीं है, तो क्या बदलता है?
‘स्थायित्व’ और ‘परिवर्तन’ के बीच इस बहस में, हिन्दू धर्म दुविधा के पहले पहलू को समझने की ओर अधिक आकर्षित होता है और बौद्ध धर्म दूसरे पहलू को। जैन धर्म इन दोनों पहलुओं को निडरतापूर्वक एक साथ समझने का दार्शनिक साहस है और किसी से आहत ना होने का दार्शनिक कौशल भी।
वस्तुतः ‘वीर’ होना ‘महावीर’ होने का पहला चरण है। शायद इसलिये जैन धर्म के चौबीसों तीर्थंकर क्षत्रिय कुल से आये। महावीर एक बहुत बड़ी संस्कृति के अंतिम व्यक्ति हैं, जिस संस्कृति का विस्तार कम से कम दस लाख वर्ष है। महावीर जैन, विचार और परंपरा के अंतिम तीर्थंकर हैं- चौबीसवें। शिखर की लहर की आखरी ऊंचाई हैं, महावीर के बाद वह लहर, वह सभ्यता और वह संस्कृति सब बिखर गई। आज उन सूत्रों को समझना इसलिये आवश्यक है क्योंकि वह पूरा का पूरा वातावरण जिसमें वे सूत्र सार्थक थे, आज कहीं भी नहीं हैं। भगवान महावीर के साधना का ही परिणाम है कि सम्पूर्ण चराचर जगत के इतिहास में निर्वस्त्रता केवल दो रूपों में आदर पाते हैं। एक आँगन में खेलते हुये निर्वस्त्र शिशु के रुप में, जिसका कोमल हृदय दुनिया के पाप-पुण्य, छल-प्रपंचों से सर्वथा अनभिज्ञ रहता हैं और दूसरा सबके हृदय में विराजने वाला वह सिद्ध-योगी, वह महावीर, जो पाप-पुण्य, छल-प्रपचों से ऊपर उठ चुका है। अद्वितीय युगपुरोधा बन चुका है।
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