





भगवान में लगने वाली मूलवृत्ति कहीं सांसारिक वृत्ति से दबकर छिप न जाय, मर न जाय, चली न जाय। यह वृत्ति अगर चली जायेगी तो साधक का जीवन साध्य नहीं रह जायेगा। साधक के जीवन की विशेषता क्या है? उसकी जो मुख्य वृत्ति है, वह निरंतर भगवान को विषय बनाती है। उसकी मुख्य वृत्ति का विषय केवल भगवान हैं और सब कार्य यदि भगवान की पूजा के लिये हों, तब तो ठीक है, पूजा के लिये न हों, तब वह उन्हें करता नहीं है। यदि कहीं बाध्य होकर कार्य करता है तो गौण वृत्ति से करता है, मुख्य वृत्ति की रक्षा करता हुआ यदि कभी भूल से वह सांसारिक वृत्ति को मुख्य वृत्ति का स्थान दे देता है तो पतित हो जाता है।
इसलिये साधक की दृष्टि में और सांसारिक बुद्धि-कौशल रखने वाले की दृष्टि में एक मौलिक भेद रहता है। सांसारिक दृष्टि वाले भी बेइमान नहीं हैं, ईमानदार हैं। वे भी चीज को जैसी देखते हैं, वैसी कहते हैं और भगवद् दृष्टि वाला पुरुष भी वैसा ही कहता है, जैसा देखता है, परंतु दोनों की दृष्टि में भेद है। एक में जगत प्रत्यक्ष है, जगत सत्य है, जगत का हानि-लाभ ही हानि-लाभ है, जगत का मान-अपमान ही है, जगत की सिद्धि ही सिद्धि है, जगत उसके सामने है; इसलिये उसकी सारी वृत्ति उस जगत को लेकर सोचती है और जिसकी भगवान में दृष्टि है, उसके सामने जगत इस रुप में है नहीं। जगत जाय या रहे। जगत का हानि-लाभ, जगत का मान-अपमान, जगत की स्तुति निंदा या जगत का जो कुछ भी है- यह सब उसकी दृष्टि में या तो अभिनय है अथवा है ही नहीं। यह सब यदि है तो उसके लिये असत् है अथवा भगवान का लिलाभिनय है। इसलिये वह जगत को इस रुप में देखता नहीं है। दोनों की दृष्टि में यह मौलिक भेद होने से दोनों का सामंजस्य ठीक नहीं बैठता है। एक जिस रुप में देखता है, दूसरा उस रुप में नहीं देखता है। ये अलग-अलग दो द़ृष्टियाँ होती हैं –
‘न रूपमस्येह तथोपलभ्यते’
जैसा यह संसार दिखता है, वैसा मिलता नहीं है। यह जगत का स्वरुप है, परंतु जो जगत को जगत के रुप में देखता है, वह इस बात को नहीं जानता है। वह तो इसी रूप में देखना चाहता है और रक्षा करना चाहता है लेकिन जिसकी दृष्टि इस जगत में इस रुप में नहीं है या इस रुप के जगत को जो हटाना चाहता है, साथ ही वह इस रुप के जगत को देखता नहीं है अथवा देखना चाहता नहीं है; इसलिये दोनों में बुद्धि के हानि-लाभ अलग-अलग हैं।
जब मनुष्य मोह से अत्यधिक तमसाच्छन्न हो जाता है, तब हानि-लाभ बहुत अधिक विपरित देखता है। पाप से, दुराग्रह से, दुराचार से, सांसारिक लाभ हो जाय तो वह उसे लाभ मानता है। संसार में बुद्धिमान पुरूष भी जिनको लाभ नहीं मानता है, उसको भी वह लाभ मानता है, भगवान की बात तो अलग रही। इसलिये दृष्टि-भेद से वस्तु-भेद होता है और वस्तु-भेद से कार्य-भेद होता है। अतएव मनुष्य अपनी आँख से अपने-अपने हानि-लाभ को देखता है कि किस में हानि है और किस में लाभ है। जरा सा किसी ने सलाम-सत्कार नहीं किया तो नाराज हो जाते हैं। अंग्रेजों के जमानें में ऐसी चीज थी कि अफसर को सलाम नहीं किया तो अफसर नाराज हो जाते थे। सलाम में लाभ है, ऐसा मानते थे। कोई हमारे सामने इस प्रकार बैठे, इस प्रकार बोले-बात करे, तब तो लाभ है और ऐसा न हो तो बड़ी हानि हो गयी, बड़ा अपमान हो गया। हम तो गद्दे पर बैठते हैं, पर यहाँ दरी पर बैठे हैं। दुःख हो गया। लाभ-हानि दृष्टि सबकी अपनी-अपनी अलग-अलग होती है। संसार में जो त्यागी होते हैं, उनकी दूसरी दृष्टि और भोगियों की अलग दृष्टि होती है। लेकिन मौलिक भेद दो रहते ही हैं- एक दैवीय संपत्ति का और दूसरा आसुरी संपत्ति का। एक भगवान की ओर जाने वाले जीवन का, इनमें फिर अवान्तर भेद हो जाते हैं।
इन दो भेदों में जिनकी दृष्टि भगवान की ओर है, वे अपने मूल दृष्टि की, मूल वृत्ति की हमेशा रक्षा करना चाहेगा। किसी भी अवस्था में सांसारिक बड़ी-से-बड़ी हानि और सांसारिक बड़े-से-बड़ा लाभ इस वृत्ति को खोने वाला अगर होगा तो वह डरेगा। जगत का बड़ा लाभ हो जाये और उस लाभ के हर्ष में यह वृत्ति कहीं चली जाये तो वह बड़ा नुकसान समझे और जगत की बड़ी-से-बड़ी हानि यदि इस वृत्ति को खो देगी तो उससे भी बड़ी हानि वह इसे समझेगा। लेकिन वह इस वृत्ति की रक्षा करेगा और जगत की लाभ-हानि की परवाह नहीं करेगा। जगत की सारी हानि होकर के भी यदि वह वृत्ति रहे तो वह उसका स्वागत करके वरण करेगा; क्योंकि उसको तो भगवान की ओर लगे रहने वाली वृत्ति में ही परम लाभ दिखता है। यह दृष्टि भेद है। साधक दूसरी चीज चाहता है और विषयी दूसरी दृष्टि चाहता है। ,/strong>
जिसकी साधक-दृष्टि है अथवा जो साधक-दृष्टि करना चाहता है, उसके लिये यह बात आवश्यक है कि वह सर्व प्रथम यह समझ लें कि हमको सामाजिक हानि-लाभ से दृष्टि ऊपर उठानी पड़ेगी। सांसारिक निति-कौशल, बुद्धि-कौशल का आश्रय हमें छोड़ना पड़ेगा। किस एक जगह दो वृत्तियाँ आ जाती हैं। एक वृत्ति सांसारिक लाभ सामने रखती है कि यह काम इस प्रकार करो तो ठीक है, उसे यदि इस प्रकार नहीं करोगे तो बड़ी हानि है। दूसरी ओर दूसरी वृत्ति कहती है कि नहीं यह लाभ तो अवश्य होगा, परंतु इस लाभ से जो अमुक साधन है; वह कुछ शिथिल पड़ जायेगा तब वह कहेगा-यह नहीं चाहिये।
श्रीमद्भगवत में भागवतोत्तम पुरुषों की व्याख्या की गयी है, वहाँ कहा गया है कि कोई भगवान का स्मरण करता था। उससे किसी देवता ने कहा कि तुम तीनों लोकों का वैभव ले लो और इसके बदले में तुम आधे क्षण के लिये भगवान को भूल जाओ। तब उसे त्रिभुवन का वैभव स्वीकार नहीं और वह आधे क्षण के लिये भी भगवान को भूलना नहीं चाहता है।
‘त्रिभुवनविभवहेतऽपि’
त्रिभुवन का वैभव मिलने पर भी वह भगवान को नहीं छोड़ता है। श्रीमद्भागवत में दृष्टि भेद के बड़े सुन्दर-सुन्दर प्रसंग है। एक प्रसंग में बताया गया है कि यह तो त्रिभुवन के वैभव की बात है, अगर मोक्ष मिलता हो तो? एक तरफ तो मोक्ष है और दूसरी तरफ एक पल के लिये भगवत प्रेमी का संग है। किसे स्वीकार करें? भागवतकार कहते हैं-
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
भगवत्संगीसंगस्य मर्त्यानां किमुताशिषः।।
ऐसे श्लोक श्रीमद्भगवत में तीन-चार बार आये हैं। इसका तात्पर्य है कि सांसारिक भोग की तो कोई बात ही नहीं, मर्त्यलोक के भोगों की चर्चा ही नहीं। स्वर्ग और अपुनर्भव अर्थात् मोक्ष से भी एक पल मात्र के भगवत प्रेमी के संग की तुलना नहीं हो सकती है, वह मोक्ष का भी परित्याग करके संग करना चाहते हैं। तीसरी बात, भगवान ने कहां तुम पाँचों प्रकार की मुक्ति ले लो, तुम्हें मुक्त कर देते हैं। इस पर भगवत प्रेमी ने कहा- फिर आपकी सेवा में यहां रहेंगे? भगवान ने कहा- नहीं, फिर कैसे? मुक्त हो जाने पर यह सब नहीं होगा। तब तुम हमारे पास रहोगे, हमारे समान ऐश्वर्य प्राप्त कर लोगे, हमारे समान चतुर्भुज रूप प्राप्त कर लोगे, हमारे समान लोक प्राप्त कर लोगे और हम में मिल जाओगे। तब भगवत्प्रेमी ने कहा- यह सब नहीं चाहिये।
सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः।।
भगवान के ये अपने वाक्य हैं कि जो मेरे जन हैं, उनको कहा जाय कि तुम मेरी सेवा छोड़ दो और सालोक्य- भगवान के समान लोक, सर्ष्टि- भगवान के समान ऐश्वर्य, सामीप्य- भगवान के पास रहना, सारूप्य-भगवान के समान रूप प्राप्त हो जाना और एकत्व (सायुज्य) – भगवान में मिल जाना – इन पांचों प्रकार की मुक्तियों को ले लो, किन्तु वह कहता है कि हम सेवा को छोड़कर अन्य कुछ नहीं लेंगे। यह दृष्टिभेद है।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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