





सद्गुरुदेव की ओजस्वी वाणी में एक महान कथन- गोरखनाथ संस्कृत बहुत कम पढ़े लिखे थे फिर भी उन्होंने अपनी गोरखवाणी में संस्कृत के बहुत सुदंर श्लोक उद्धत किए हैं। उन्होंने अधिकतर प्राकृत भाषा में अपने विचार व्यक्त किए हैं। जितने साबर मंत्र है उनमें 80 प्रतिशत से अधिक गोरखनाथ-निर्मित हैं और वे सभी मंत्र अपने आप में प्रामाणिक और प्रभावशाली रहे हैं। फिर भी उनके कुछ श्लोक ऐसे हैं कि उन श्लोकों का चयन करके एक पुस्तक की रचना की जा सकती हैं क्योंकि वे श्लोक गोरखनाथ के पूरे जीवन को अपने आप में व्यक्त करती हैं कि गोरखनाथ कौन थे? हम गोरखनाथ के बारे में बहुत कम पढ़ पाए हैं और समझ पायें हैं। उनको भगवान शिव का अवतार माना गया है, जैसे शंकराचार्य को भगवान शिव का अवतार माना गया है और अवतारी पुरूष और सामान्य पुरूष में बाहरी दृष्टि से कोई बहुत अंतर नहीं होता। सांसारिक व्यक्ति के भी दो आंख, नाक, कान, हाथ, पैर वैसे ही होते हैं, जैसे अवतारी पुरूष के होते हैं। अवतारी पुरूष भी रोते है, हंसते है, उदास होते हैं, चिंतित होते हैं, परेशान होते है, दुखः भोगते है, सुख भोगते हैं। राम भी वनवास के समय, जब रावण सीता को ले गया, तो वे पत्तों से, पौधों से, पेड़ों से पूछते थे- हे खग, हे मृग, हे मधुकर बैनी! कहां गई सीता मृग नयनी?
हे पक्षी! तुम बताओ कि मेरी सीता कहां चली गई है? हे मृग! तुम बहुत दौड़ते हो, तुम्हें शायद पता हो कि सीता को कौन ले गया? हे मधुकरी बैनी! हे भंवरे शायद तुम मुझे उसका पता बता सको— और राम उतने ही व्यथित होते हैं जितने सामान्य सांसारिक व्यक्ति होते हैं। ऐसा नहीं है कि अवतारी पुरूष हमेशा बहुत खुश, बहुत प्रसन्न और बहुत आंनदित ही होते हैं, या सांसारिक व्यक्ति ही दुःखी होते हैं। गोरखनाथ ने एक रास्ता हमें बताया हैं, मनुष्य जाति को एक रास्ता दिया कि मनुष्य का प्रारम्भ पांचवें साल से हो जाता है। पांचवे साल के बाद उसका यज्ञोपवीत संस्कार हो जाता है, वह द्विज कहलाने लग जाता है और उसके बाद उसमें एक समय, एक चिंतन, एक विचारधारा आने लग जाती है, फिर उसकी जैसी समझ होती है, जैसी संगति होती हैं, जैसा मां-बाप का प्रभाव होता है, वह उसका निर्माण समय होता हैं। उस निर्माण में वह राक्षस या दुष्ट भी बन सकता है और भला भी बन सकता है, जो कुछ भी बनना होता है वह उस अवस्था में बन जाता है क्योंकि उसके कोमल चित्त पर उस समय कुछ लिखा हुआ नहीं होता है, स्लेट पूरी तरह से कोरी होती है। घर का वातावरण अगर खराब है और पिता दुष्ट स्वभाव के हैं तो उसके चित्त पर भी दुष्टता अंकित हो जाती है। यदि पिता लालची और स्वार्थी हैं तो वह भी वैसा ही बन जाता है क्योंकि वह रात-दिन देखता है, पिता लूट कर, बेईमानी करके धन एकत्रित कर रहा है या विषय-भोगी है या त्यागी है। उस घर का वातावरण उसके चित्त पर हमेशा के लिए अंकित हो जाता है और उसके जो साथी या मित्र जिस वातावरण से आते हैं उसी वातावरण में वह सात साल व्यतीत करता है और वैसा ही उसके जीवन पर प्रभाव पड़ जाता है। वह चाहे पुरूष हो या स्त्री हो, उन संस्कारों से पिंड छुड़ाना अपने आप में बहुत कठिन होता है क्योंकि वह खून में पूरी तरह मिक्स हो जाता है। उसके विचारों में वह वातावरण मिक्स हो जाता है, उसका निर्माण भी उसी तरीके से होने लगता है। इसलिए गोरखनाथ कहते हैं कि वह अपने आप में मनुष्य जीवन नही होता, वह निर्माण अवस्था होती है, जो उसके हाथ में नहीं होती, उसको कुछ ज्ञान नहीं होता।
आज आपको ज्ञात है कि मुझे सड़क की बांयी ओर चलना चाहिए। उस समय उसको ज्ञात नहीं होता। वह सड़क के बीच में भी चला जाता है। गोरखनाथ ने इस श्लोक में बताया कि जब मनुष्य का जन्म होता है तो वह दो किनारों के बीच खड़ा होता है। एक ओर वासनाएं होती हैं और एक ओर त्याग होता है। वैराग्य नहीं कह रहा हूं मैं, संन्यास भी नहीं कह रहा हूं। उन्होंने त्याग शब्द का प्रयोग किया है। विषय वासनाओं का अर्थ गृहस्थ नहीं है, गृहस्थ तो एक कर्तव्य है जो जीवन निर्माण करता है, जीवन नष्ट नहीं करता। भोग का अर्थ मन में यह चिंतन आना कि बहुत अच्छा मकान हो, कार हो, ए-सीलगा हो, बहुत अच्छे कपड़े हों, मैं धन एकत्र करूं। यह सब भोग है। इसका गृहस्थ से कोई सबंध नहीं और त्याग का वैराग्य से कोई सम्बन्ध नहीं। इसलिए गोरख ने कहा कि वैराग्य और गृहस्थ, इन दोनों के बीच में मनुष्य नहीं हैं, मनुष्य है त्याग और विषय भोग के बीच में। वह बारह साल की उम्र से जीवन की अंतिम सांस तक, उसके बीच में झूलता रहता है। बहुत कम ऐसे लोग होते हैं जो उन विषय वासनाओं से अपने आप को परे हटा लेते हैं। उस निर्माण-अवस्था के समाप्त होते-होते व्यक्ति के मन में एक भावना, एक चिंतन, एक विचार उदय होने लग जाता है कि मैं क्या करूं? उसके सामने विषय वासनाएं खड़ी होती हैं। उसके सामने एक पत्नी का चेहरा होता है, एक परिवार का चेहरा होता है, समाज का चेहरा होता है, उसकी इच्छाएं होती हैं और वे सारी इच्छाएं विषय वासनाओं की ओर ही होती हैं, त्याग की ओर नहीं होती। गोरखनाथ के जीवन की सबसे बड़ी घटना, सबसे अच्छी घटना यह थी कि जब वे छः साल के थे तो उन्होने मां को कहा कि मैं विषय-वासनाओं की ओर जाना नहीं चाहता, मैं त्याग करना चाहता हूं सब कुछ – अपना सुख, अपना दुःख, अपना चिंतन, अपना विचार, अपने बंधु-बांधव। आप जिसे संन्यास कहते हैं, मैं उसे त्याग कहता हूं, वही जीवन-निर्माण है।
जीवन का आनंद उन्मुक्ता और सर्वोच्चता में है, बीच में रहने में नहीं हैं। मैं आपको कहता हूं कि आप बनें तो सर्वश्रेष्ठ बनें, ईमानदार बनें तो एक अद्वितीय बने, योगी बने तो महायोगी बनें और त्यागी बनें तो श्रेष्ठतम बनें। जो कुछ भी बने वह आप अद्वितीय बने। बीच में तो करोड़ो लोग जूझ रहे हैं और संसार मे 99-9 प्रतिशत लोग बीच में ही जूझते हैं। —और गुरु के इतना कहने के बाद भी, जो उसके चित्त पर प्रभाव पड़ा हुआ हो, वह प्रभाव मिटता नहीं है, बड़ी मुश्किल से गुरु उसको बदल पाता है या उसे मन की संकल्प-शक्ति मिटा सकती है। मेरी टेबल पर पैसे पड़े हों और कोई देख रहा हो और कोई उन्हें उठाने का प्रयास करे तो मां-बाप के खून में कोई ऐसी वृत्ति मिली होगी। मैं मां-बाप को दोष नहीं दें रहा हूं, वह खून भी कहीं से आया होगा और वह पैसे जेब में डाल लेगा, चोरी कर लेगा। इन चोरी के सौ रूपयों से जिदंगी नहीं कटती है पर वह धीरे-धीरे हैबिच्चुअल हो जाता है, वह सोचता है- मैंने चोरी की, किसी को पता नहीं लगा। चलो, आज दो सौ रूपये चुरा लेते हैं, पांच सौ चुरा लेते हैं, किसी को क्या पता लगेगा और धीरे-धीरे वह उस प्रवृत्ति में फंस जाता है, उस वृति की ओर अग्रसर हो जाता है जिसे मानवी नहीं कहते हैं, राक्षसी कहते हैं, जिसको अमानव कहते हैं और व्यक्ति ऐसे बन जाते हैं क्योंकि इनके चारों ओर का परिवेश ऐसा होता है।
गोरख कहते हैं कि उनसे परे हटना बड़ा कठिन है। जब वे छः साल के थे तो उन्होने अपनी माँ को कहा कि मैं त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहता हूं, मुझे विषय वासनाओं में कोई रूचि नहीं है क्योंकि भोगे रोग भयं। भोग से केवल रोग पैदा हो सकता है बाकी कुछ नहीं हो सकता। रोग का अर्थ है संसार का रोग, घर का रोग, आसपास का रोग, कुल का रोग और शरीर का रोग। मैं जीवन को उस पूर्णता तक पहुंचा देना चाहता हूं, जहां शरीर रोग-रहित हो सके, लोग एहसास कर सके कि मैं कुछ हूं। जब रैदास चमार, जूते गांठने वाला व्यक्ति एक अद्वितीय बन सकता है तो आप क्यों नहीं?—- और जब सिद्धार्थ बुद्ध जैसा महान बन सकता है तो आप क्यों नहीं बन सकते?
एक चमार और एक राजा का बेटा, दोनों दो छोर पर बड़े महान बन सकते हैं तो कोई भी व्यक्ति महान बन सकता है और महान का अर्थ है सर्वोच्चता प्राप्त करना और सर्वोच्चता प्राप्त करने के रास्ते पर गुरु के शब्दों पर चल कर ही बढ़ा जा सकता है, नीचे गुरु के शब्द बिछे होते हैं, उन पर ही चलकर के वहां तक पहुंचा जा सकता है। गोरखनाथ की मां ने मना कर दिया कि तुम ऐसा नहीं कर सकते, तुम त्यागमय जीवन व्यतीत नहीं कर सकते, घर-बार छोड़कर नहीं जा सकते। उन्होंने बहुत हठ की, नदी के किनारे खड़े-खड़े, मां मना करती रही। स्वाभाविक है कि मां मना करेगी, पत्नी मना करेगी, बेटे मना करेंगे। आदमी अपने आप में इकाई है, समाज ने उसे बांध दिया है। मनुष्य, समाज नही हैं, मनुष्य तो अपने आप में अकेला हैं क्योंकि वह अकेले पैदा हुआ है और अकेला ही मृत्यु को प्राप्त करेगा, इसलिए मनुष्य समाज है ही नहीं। समाज ने उसे घेर रखा है इसलिए वह समाज का हिस्सा बन गया है। सब कहते हैं मैं तेरा चाचा हूं, मैं तेरा बाप हूं, मैं तेरी बहन हूं, पड़ोसी हूं। यह सब मिलकर समाज बन गया। वह व्यक्ति समाज नहीं हैं। वह अपने आप में एक इकाई है तो जब मां ने बहुत मना किया और कहा तुम चलो घर, मैं तुम्हारी शादी कर देती हूं और मेरी यही इच्छा है तो गोरखनाथ ने कहा, शादी करना बहुत बड़ी बात नहीं है, शादी तुमने भी की और सैकड़ों, हजारों लोग करते हैं। मैं अपने आप में अलग बनना चाहता हूं और उन विषय वासनाओं को दमित करके, उन वासनाओं से परे हट करके अपने आप में खुद-सद्गुरु, जगद्गुरु बनना चाहता हूं। इसलिए मैंने गोरखनाथ को युग-सृष्टा शब्द से सम्बोधित किया है। जब मां नहीं मानी तो वहां एक कैंची थी, उसनें कहा कि इस कैंची से अपने लिंग को काटकर के तुम्हारे सामने फेक देता हूं। उसने कहा-फिर मेरी शादी कर दो। इतनी सी चीज के लिए शादी पर जोर दे रही हो? जब वह चीज ही नहीं रहेगी तब शादी मेरी कहां से होगी? तो मां ने कहा तुम जाओ और त्यागमय जीवन व्यतीत करो।
वह उसका पहला त्याग था और आज वह पंथ भारतवर्ष में सबसे बड़ा पंथ है, बौद्धपंथ से भी बड़ा, जैनपंथ से भी बड़ा हिन्दू पंथ से भी बड़ा। एक व्यक्ति ने बहुत बड़ी घटना घटित करके दिखा दी, बता दिया कि त्याग क्या होता है? जिस चीज के लिए तुम मुझे बांधना चाहती हो, तो वह चीज मैं समाप्त कर देता हूं और नवीन मंत्रों की रचना की, नवीन चिंतन दिया, नवीन विचारधारा दी। —-और इस श्लोक में उन्होंने बताया कि त्याग कहां से आंरभ कर सकते हैं? परन्तु हम त्याग नहीं कर पाते हैं। हमारे जीवन में त्याग जैसी कोई चीज है ही नहीं। हमारे जीवन में केवल वासना और विषय हैं। हम बाहरी वातावरण से दो मिनट में ही जुड़ जाते हैं, उससे कट नहीं पातें। ज्यों ही बाहर निकलते हैं और वापस आते हैं तो उससे जुड़े हुए ही आते हैं और हमारे ऊपर इतना विषय वासना का मैल चढ़ जाता हैं कि दूसरे दिन गुरु धोए तो धुले, अन्यथा नहीं धुले और 24 घंटे गुरु आपके पास नहीं रह सकता।
यदि आपके हृदय में गुरु नहीं हैं तो गुरु आपके शरीर के पास नहीं रह सकता, यह संभव है भी नहीं। उनको शरीर से जोड़ कर रखने की जरूरत भी नहीं। उनको अपने हृदय में, धारण करने की जरूरत है। ऐसी स्थिति में गोरखनाथ ने अपने श्लोक में कहा है कि व्यक्ति अकेला पैदा होता है। या तो सब पैदा होते उसके साथ, चाचा, दादा, मामा, तो वह सोचता सब मेरे साथ हैं या सब मरते उसके साथ तब भी समझ सकता है कि समाज उसके साथ है, पत्नी मर रही है साथ में वह चिता पर लेटी है, बेटी लेटी हुई है, लेकिन ऐसा है नहीं। वह अकेला आया था,— और कैसा अकेला—-? जिसके शरीर पर एक छोटा सा कपड़े का टुकड़ा भी नहीं था और मृत्यु पर भी चिता पर तब लेटता है तो बिल्कुल अकेला, तब भी उसके शरीर पर कपड़े का एक टुकड़ा भी नहीं होता— तो हम सब बीच में इस जाल में क्यों उलझें हुए हैं? गोरख कहते हैं इसलिए कि हम अपने आप में बहुत बुद्धिमान मूर्ख हैं। हम अपने आपको बुद्धिमान समझ रहे हैं और वास्तव में पूर्ण मूर्ख हैं।
बुद्धिमान इसलिए समझ रहे हैं कि हमने जीवन में क्या कुछ कर लिया। दो-पांच बेटे पैदा कर लिए, हमारे पास धन है, मकान है, धन-दौलत है और व्यक्ति इस अवस्था में बहुत प्रसन्न रहता है। गोरखनाथ कहते हैं कि इन सबसे पिंड छुड़ाना ही जीवन का त्याग है और धीरे-धीरे उससे पिंड छूट जाता है। आप धीरे- धीरे मन को शुद्ध करते रहें, मगर मन शुद्ध होगा यदि आप के अंदर गुरु होगा। मैंने बताया कि गुरु के शब्दों पर पांव रखकर ही जीवन त्यागमय बना सकते हो। गुरु तुम्हें हर मिनट रास्ता नहीं दिखा सकता, तुम यहां से थोड़ा दो मिनट दूर जाओगे, गुरु तुम्हारे पास सशरीर थोड़े ही खड़ा होगा! वह जो गुरु अंदर है, वह कहेगा यह गलत है। ये जो लोग बाहर हैं, न जाने कैसे लोग हैं? इनसे बचना आवश्यक है, शरीर को शुद्ध रखना ज्यादा जरूरी है। बाहर कुछ खाने से अच्छा है कि पानी पीकर गुजारा कर लें, घर जाकर अच्छा भोजन कर लेंगे। मीट खाने से या सिगरेट फूंकने से जीवन नहीं बन सकता।
उस समय जो गुरु की शक्ति अंदर से आती है, वह आपको आज्ञा, प्रेरणा और चिंतन दे सकती है और वही बोल सकते हैं कि आप कितने ईमानदार बन सकते हैं, कितने कर्मनिष्ठ बन सकते हैं, कितने कर्तव्यनिष्ठ बन सकते हैं, कितने त्यागमय बन सकते हैं क्योंकि ईमानदारी और कर्मनिष्ठता, यानी निरंतर काम में डूबे रहना— और काम भी दो तरह के हैं- त्यागमय काम और विषयमय काम। दोनों में से कोई एक काम कर पाएंगें। दोनों एक साथ नहीं चल सकते। दूध और खटाई दोनों एक साथ नहीं चल सकते। या तो आप दूध बनें, या नींबू का रस बन जाएं। जो भी आप चाहें वह बन जाएं। मेरे पड़ोस में कोई मर जाए तो पता ही नहीं चलता कि हरि लाल जी मर गए। न आपको मालूम पड़ता है न मुझे मालूम पड़ता है। म्युनिसिपैलिटी की वैन आती है, उसमें डाल कर ले जाती है और जला देती है। क्या यह जीवन दूसरी बार मिल सकता है? और कैसा मिलेगा? किसी झुग्गी झोपड़ी में मिलेगा, गरीबी में मिलेगा, कुछ पता ही नहीं है। फिर जो जीवन हमारे पास है, अगर उसका प्रयोग हम नहीं कर पाए, जो हीरा रत्न हमारे पास है उसका प्रयोग नहीं कर पाए, तो फिर जीवन का अर्थ क्या रह जाएगा? हमारे हाथ में फिर क्या है?— तुम्हारें हाथ में एक गुरु हैं, ईमानदारी है, तुम्हारे हाथ में सत्यनिष्ठा है, कर्तव्यनिष्ठा है, कर्म निष्ठता है और तुम्हारे हाथ में त्याग है। ये पांच चीजें तुम्हारे पास हैं, अगर तुम उसका प्रयोग कर सको तो और चाहे तो उनका दुरूपयोग भी कर सकते हो, दोनों कर सकते हो। त्याग का दुरूपयोग भी कर सकते हो, त्याग का सदुपयोग भी कर सकते हो। भोगी तुम बन सकते हो और त्यागी भी तुम बन सकते हो। तुम ईमानदारी का केवल मुखौटा भी पहन सकते हो और अन्दर बेईमान बने रह सकते हो। ऊपर से राम-राम बोल सकते हो और अंदर से डाकू बने रह सकते हो। यह तो 5 साल से लेकर 12 साल की अवस्था में जो तुम्हारे चित्त पर अंकित हो गया, उसको मिटाना बहुत कठिन है। तो जितना उसको मिटा पाएगा, उतना ही जीवन में अनुकूलता प्राप्त कर सकते हैं— और आप पूछ सकते हैं कि उससे क्या हो पाएगा? त्यागमय जीवन से क्या हो पाएगा? यह हो जाएगा कि आप गोरख बन जाएगें, आप कृष्ण बन पाएंगे, आप बुद्ध बन पाएंगे, रॉक फैलर बन पाएंगे। रॉक फैलर की रोज चार करोड़ डॉलर की कमाई थी। चार करोड़ डॉलर नित्य की कमाई क्योंकि इतने तेल के कुओं का मालिक हैं कि वह कुछ भी नहीं करे तो शाम को उसका मुनीम खबर देगा कि चार करोड़ डालर उसके खाते में जमा हो गए और आपको मालूम हैं कि उसके बेटे ने क्या किया? 32 साल की उम्र में सब कुछ छोड़-छोड़कर के संन्यास ले लिया, मंदिर में जाकर एक भक्त बन गया, साधु बन गया और केवल साधुत्वमय जीवन व्यतीत करने लगा। उसने छोड़ दिया सब कुछ । जिसकी कमाई चार करोड़ डॉलर रोज होती थी वह सब कुछ छोड़ कर बैठ गया।
उसने कहा, इस सबसे कोई फायदा नहीं। जब मेरा बाप अपने साथ कुछ ले जा नहीं सका तो मैं क्या ले जाऊंगा? बाप अपने रास्ते में गया, मैं अपने रास्ते पर चला जाऊंगा। इतना बड़ा त्याग आप और हम भी शायद नहीं कर सकते। जिदंगी में सब कुछ करके भी चार करोड़ डॉलर नहीं कमा सकते और वह बगैर कुछ किए ही दिन में चार करोड़ डॉलर कमा लेता था और उसने सब कुछ दान कर दिया, सारा पैसा दे दिया और यहां तक कि अपना महल भी चर्च को दान कर दिए। कहीं पुस्तकालय बना दिया, कहीं अफ्रीका में गरीब लोगों के लिए अस्पताल बना दिए और उसने संस्था बना दिए कि जो गरीब आए, उनको दान दिया जाता रहे और मुझे कुछ नहीं चाहिए केवल शाम को दो रोटी चाहिए।
आप वृंदावन चले जाइए। वहां बांके बिहारी जी का मंदिर है, उसके बाहर जो भी भिखारी बैठे हैं उनमें से 60 प्रतिशत भिखारी करोड़पति हैं। वे करोड़पति हैं, उन्होंने अपने बेटों के भरोसे घर छोड़ दिया, अपनी पत्नी के भरोसे घर छोड़ दिया, वे केवल वहां बैठे रहते हैं। हालांकि बिहारी जी के दर्शन करते हैं और मधुकरी भिक्षा से जीवन यापन करते हैं। मधुकरी भिक्षा का अर्थ है कि जो अंदर से, मंदिर से जो कोई निकलता है तो कोई प्रसाद देता है, कोई लड्डू का टुकड़ा देता है, वह ले लेते हैं। कोई पूड़ी और सब्जी देता है वह लेकर खा लेते हैं। वे मांगते नहीं हैं, जो कोई स्वयं कुछ देता है वह खा लेते हैं और उस समय भी वे करोड़पति होता हैं क्योंकि उसके बेटे बिजनेस करते हैं, उसकी पत्नी बिजनेस करती है। बेटे आते हैं कार में और हाथ जोड़कर विनती करते हैं, कि आप चलिए हमारे साथ में, हमारी बड़ी बदनामी हो रही हैं। मधुकरी भिक्षा से इस प्रकार से आप जीवन जीते हैं, यह सब अच्छा नहीं लगता है। वह अपने पुत्रों से कहता है कि तुम जाओ, जो कुछ तुम्हें करना है करो, मैं यहां बिल्कुल सुखी हूं क्योंकि मुझे पता है कि जीवन का रास्ता क्या है। क्या वे मूर्ख हैं, हमसे ज्यादा गए बीते हैं? नहीं! वे हमसे ज्यादा बुद्धिमान हैं? इसलिए वे करोड़पति बने हुए हैं और उसके बाद भी उन्होंने यह समझ लिया कि यह जीवन नहीं है, यह जीवन नश्वर है और यह दूसरा जीवन आनंददायक है।
मधुकरी का अर्थ है कि बिना मांगे जो मिल जाए वह खा ले। मिठाई मिल जाए मिठाई, चने मिल जाए तो चने और केवल भगवान कृष्ण का नाम लेते हुए वे अपने जीवन का यापन कर लेते हैं। गोरख कहते हैं कि जीवन का सार यह है कि आप किस रास्ते पर चल रहे हैं? यदि जिस रास्ते पर आप चल रहे हैं, वह गलत है तो अभी से आप मुड़ जाये। अभी तो समय है और मुड़ने में बहुत तकलीफ होगी क्योंकि विषय भोग घटता नहीं है, बहुत कठिन है विषय भोग को छोड़ना।
—-और मैं विषय-वासना का अर्थ गृहस्थ से नहीं ले रहा हूं। उसका अर्थ मैं मृग तृष्णा से ले रहा हूं, झूठे सुख से ले रहा हूं। वे 60 प्रतिशत लोग कहते हैं कि मृग तृष्णा झूठी है, यह तो मेरे साथ चलती नहीं। इनका मेरे जीवन में कोई उपयोग ही नहीं, यह तो केवल दिखावा है मेरे जीवन में कि मैं कार चला रहा हूं, साइकिल में नहीं चल रहा हूं, लोग क्या कहेगें? लोग क्या कह सकते हैं? गोरख को क्या कह दिया।— कबीर को क्या कह दिया या कृष्ण को क्या कह दिया? वे जीवन में कुछ बड़े बने और अद्वितीय बने— और जनक भी अद्वितीय बने जो राजा थे और रहे।
इसलिए इस भोगमय जीवन को त्यागमय जीवन बनाने के लिए गुरु का सहारा लेना पड़ेगा। रास्ता तो वही बताएगा, जो मैं बता रहा हूं आपको। आप चले या नहीं चले, यह मेरी ड्यूटी नहीं है। मेरी ड्यूटी तो केवल यह है कि अपने शब्दों पर, आपको गतिशील करूं। आप गतिशील ना हों, यह आपकी न्यूनता है, गुरु की न्यूनता नहीं। साढ़े चार साल की उम्र में इस रास्ते को मैंने पकड़ा— और रही बात समाज की, तो समाज को तो राम भी नहीं बदल सके, कृष्ण भी नहीं बदल सके, वैसे के वैसे कौरव और पाडंव रहे, बुद्ध भी नहीं बदल सके, महावीर भी नहीं बदल सके।
मगर मुट्ठी भर लोगों को जो बदला, उन मुट्ठी भर लोगों ने, केवल 20 भिक्षुक थे, बुद्ध के पास में और उन्होंने बौद्ध धर्म को 18 देशों में फैला दिया। शंकराचार्य के पास केवल 12 शिष्य थे, उन्होंने शंकराचार्य को जीवित अमर कर दिया, रामकृष्ण परमहंस का केवल एक शिष्य था विवेकानन्द और उसने रामकृष्ण परमहंस को जीवित कर दिया। कोई हजारों की भीड़ से जीवनयापन नहीं करता गुरु। गुरु तो केवल रास्ता बता सकता है। इसलिए महापुरूष चाहे गुरु भी हो तो उसे हर्ष, सुख-दुःख, विषाद इन सबकी अनुभूति होती है मगर वह इन सबसे परे हटकर जीवन-यापन करता रहता है, उसमें रहता हुआ भी। यदि मैं आपके बीच में रहूंगा तो आपको रास्ता दिखा ही नहीं सकूंगा, आपके लिए रास्ता बिछा संकूगा। जंगल में रोज बैठ जाऊंगा तो आपको मैं रास्ता नहीं बता सकता। फिर तो मैं खुद अपनी ही साधना कर सकूंगा। वह अपने आप में एकांतवास है, वह अपने आप में पलायन है। वह अपने आप में भागना है।
—-तो गोरखनाथ कहते हैं कि जहां भी जीवन में आपको रास्ता मिले, वहां से आप बदल जाइए, पलट जाइए और पलटना बहुत कठिन होगा क्योंकि हर व्यक्ति आपको खींचेगा, रोकेगा ओर कहेगा तुम कहां जा रहे हो, मैं किस के भरोसे हूं, फिर मेरा क्या होगा? बेटा चिल्लाएगा, मां चिल्लाएगी, भाई चिल्लाएगा, बहन चिल्लाएगी, समाज कहेगा कि साला मूर्ख है, सब लोग केवल नेगेटिव थिंकिंग ही देंगे, पॉजीटिव थिंकिंग नहीं देंगे। पॉजीटिव थिंकिंग केवल उसका मन ही दे पाएगा।
तस्मै मनः शिव संकलां अस्तु
मन की संकल्प शक्ति उसे प्रेरणा दे पाएगी कि मुझे यह जीवन व्यतीत करना है और फिर देखा जाएगा। समुद्र में छलांग लगा दी है। डूबना ही तो है, चलो चालीस साल बाद नहीं डूबे, आज डूब गए। तब डूबना है तो डूबना है। वहां लकडि़यों कि चिता पर लेटकर मरेगे, यहां गुरु रूपी समुद्र में डूब रहे हैं, इतना ही तो अंतर है। देख लेते हैं इस रास्ते पर भी चल कर। या तो मैं सर्वोच्चता प्राप्त कर लूंगा या फिर डूब जाऊंगा। डूबना तो निश्चित है ही। उसको तो आप रोक ही नहीं सकते। इसलिए गोरख ने कहा कि आप धीरे-धीरे त्यागमय जीवन प्रारम्भ कीजिए और उतना ही छोड़ते रहिए विषय को भी। छोड़ेगे भी तो इतनी जल्दी छूटेगा नहीं, क्योंकि आपके पास तो पूरा घड़ा भरा हुआ है विषय वासनाओं का। आप बारह दिन खाली करिए धीरे-धीरे विषय वासनाओं से हटकर के त्यागमय जीवन में खड़े हो जाइये।
बहुत कठिन है इस रास्ते पर पैर बढ़ाना— और मनुष्य ही बढ़ सकता है, हिम्मतवान ही बढ़ सकता है, श्रेष्ठ जन ही बढ़ सकता है, अद्वितीय व्यक्ति ही बढ़ सकता है। कायर और बुजदिल नहीं बढ़ सकते, मरे हुए व्यक्ति नहीं बढ़ सकते, रोते हुए भी नहीं बढ़ सकते। अकर्मण्य व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता, गया बीता व्यक्ति एकदम राजपाट छोड़ करके वनवास नहीं ले सकता राम की तरह। एक कमजोर व्यक्ति राजपाट छोड़ कर संन्यास नहीं ले सकता बुद्ध की तरह। कमजोर और कायरो के लिए संसार नहीं हैं। उसके लिए केवल मृत्यु लिखी हुई है, क्योंकि वे रोज मरते हैं, पत्नी गाली देती है, फटकारती है, बेटे गाली देते है। व्यापार नहीं चलता तो दुःख और विषाद होता है, नींद नहीं आती तो दुःख होता है, यह सब मृत्यु है। हर क्षण मृत्यु को प्राप्त होते रहते हैं और मृत्यु के रास्ते पर चल करके आपके प्राण अंतिम सांस ले लेते हैं।— और त्याग एक आनन्द का रास्ता है। आप मर जाएं तो भी उन सबका जीवन तो चलेगा ही। आप तो केवल मोहग्रस्त हैं कि मैं हूं तो संसार चल रहा है। यह सबसे बड़ा अहंकार है, जीवन की सबसे बड़ी न्यूनता है।
निश्चय सबसे बड़ी आवश्यकता है इस मार्ग पर बढ़ने के लिए और त्याग सबसे बड़ा और कठिन रास्ता है। संसार की तृष्णा को भी मैं देख चुका हूं। मैंने अनुभव किया है कि उस तृष्णा से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। उससे केवल लड़ाई झगड़े प्राप्त हो सकते हैं। यह तृष्णा मेरे साथ नहीं चल सकती। मेरे साथ कुछ चल सकता है तो मेरा ज्ञान चल सकता है, मेरा त्याग चल सकता है। मैंने जो कुछ जीवन में किया, जिस रास्ते पर भी चला ज्ञान दिया, चिंतन दिया, संन्यास- जीवन जिया वह मेरे साथ चलेगा, वह समाप्त नहीं होगा। मेरे ग्रंथ चलेगें, वे समाप्त नहीं होंगे। मेरे ग्रंथ खत्म नहीं होंगे, मेरी विचारधारा समाप्त नहीं होगी और गोरख कहते हैं कि जीवन यही है। इसके लिए कठिन रास्ता चुनना जरूरी है और कठिन रास्ते का अर्थ है कि त्याग करना जरूरी है दिन का, समय का, धन का और अपने जीवन का। इसमें घिसता कुछ भी नहीं है मन से ही त्याग हो सकता है, शरीर का त्याग करने की जरूरत नहीं है आपको। ऐसा नहीं, कि एक उंगली काट ली तो त्याग हो गया और फिर एक और उंगली काट ली तो त्याग हुआ। यह त्याग नहीं है, इसको त्याग नहीं कहते हैं। त्याग का अर्थ है कि आप धीरे-धीरे तृष्णा से परे हटें और वहां जुड़ें। कहां जुड़ें? ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से जुड़ें। सद्बुद्धि, सद्विचार और त्यागमय जीवन की ओर बढ़ें। यहां से जुड़ना है और तृष्णा से कटना है। धीरे-धीरे कटिए, इधर बराबर जुडि़ए । निश्चित रूपेण बराबर मन में उस ज्योति को जलाए रखिए कि मुझे उस रास्ते पर गतिशील होना है क्योंकि ये सब नहीं रहेंगे, ये मेरे साथ नहीं चलेंगे। ये चलेंगे नहीं तो बेकार इनके लिए क्यो दुःखी होना। आप देख लीजिए, पत्नी को खाना नहीं दीजिए 20 दिन और कपड़े मत दीजिए। वह आपको गाली देगी कि कैसा आदमी है तू, बिल्कुल गया बीता आदमी है, रोटी नहीं दे सकता मुझे। दो दिन पहले खुश थी आपसे, आज आपको गाली दे रही है।
आज समाज आपको कह रहा है, बहुत अच्छा आदमी है और बीस दिन आप कुछ मत करिए, बस मंदिर में जाकर बैठ जाइए तो कहेगें यह तो बहुत घटिया आदमी है, गया बीता आदमी है, यह कोई आदमी है? बिल्कुल गधा है। जो बीस दिन पहले आपकी प्रंशसा करते हैं वे ही बीस दिन बाद आपकी निंदा करने लग जाएगें। तो वे आपके साथ कहां हो सकते हैं, जो बीस दिन पहले आपके साथ थे, वे बीस दिन बाद आपके विपरीत हो गए, यह कैसे हो गया? आप कुछ भी करें, समाज निंदा ही करेगा और गुरु आपको छाती से ही लगाएगा, फटे कपड़े पहन कर आएंगे तब भी और राजसी वस्त्र पहन कर आएंगे जब भी। क्योंकि गुरु आपका है, उसके शब्द आपके हैं। उसका चिंतन आपका है, उसकी धारणा-शक्ति आपकी है। उसके लिए परन्तु त्याग को अपनाना पड़ेगा। त्याग भी करें और विषय भोग भी प्राप्त करना चाहे ऐसा संभव नहीं। दो चीज साथ में नहीं चल सकती, एक ही चीज चलेगी। उसके लिए फिर समय का त्याग करना ही पड़ेगा आपको, थोड़ा धन त्याग करना ही पड़ेगा आपको क्योंकि धन आप सुकृत कार्य में व्यय कर रहे हैं।
समय भी धन है, कार्य करना भी धन है, कर्तव्य निष्ठा भी धन है, परिश्रम भी धन है, धन केवल रूपया ही नहीं होता। आपने गुरु के लिए आधा घंटा भी कार्य किया, यह भी धन ही है, एक पूंजी है जो आपने व्यय की। गुरु के साथ रहकर सुबह उठे, स्नान किया, भगवान का पूजन किया, यह एक उच्चता है। इस समय में आपने शराब नहीं पी, गालियां नही बोलीं, फिल्मी गाने नहीं सुने। इस समय आपने कोई घटिया काम नहीं किया। यह भी एक जीवन है, इसका मूल बेस त्याग है, मूल बेस ईमानदारी है, मूल बेस तुम्हारा इस मार्ग पर गतिशील होना है जिस रास्ते पर गुरु के शब्द बिछे हुए हो और मूल बेस उसके लिए प्रयत्नशील रहना है जो त्यागमय जीवन है। यदि आप ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो आपके जैसा घटिया व्यक्ति कोई है ही नहीं, आप अपने आप को बेशक महान कहिए। सेठ घासी लाल जी बहुत महान हैं, चांदनी चौक में उनकी बहुत बड़ी दुकान है और लोग आज उनकी प्रंशसा करते थकते नहीं। पर मेरी दृष्टि में वह त्याग है ही नहीं क्योंकि ज्योंहि मृत्यु को प्राप्त हुए, उनको जलाकर जब वापस लौटेंगे तो लोगों के शब्द क्या होगें? बड़ा साला चोर था, चोरी कर के चार-चार दुकान बना ली, बहुत बेईमान था, आखिर मरा, मरना ही था साले को, कुछ नहीं किया साले ने, कोई धर्मशाला नहीं बनवाई, हाथ से पैसा छूटा नहीं उसके।
बस दो सैकण्ड बाद लोगों की धारणाएं सुन लीजिए। यह सब आंखो से देख लीजिए आप। जाते समय तो कह रहे थे राम नाम सत्य है, अब आते समय गाली क्यों दे रहे हो, राम नाम सत्य है, सब भूल गए बस! और वे आलोचना करने वाले जाकर वही काम करने लग जाएंगे चोरी, झूठ, बेईमानी। आप भी वही कर रहे हैं। और अगर आप उस रास्ते पर चल रहे हैं, जहां चार शब्द हैं, त्याग समय का और धन का, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा यानि जो आपका काम है और जीवन में पूर्णता की ओर अग्रसर होने की क्रिया, अगर आप इस रास्ते पर चल रहे हैं तो गोरख कहते हैं कि जीवन का मूल धर्म, मूल चिंतन, मूल विचारधारा, मूल सत्य यही है।—- और बिना गुरु की सेवा के यह चीज प्राप्त हो ही नहीं सकती। गुरु प्राप्त हो ही नहीं सकता। बाजार से हम पैसा खर्च करके एक सुंदर कार खरीद सकते हैं या कपड़े खरीद सकते हैं। गुरु नहीं खरीद सकते आप। पैसे से आप और चीज खरीद सकते हैं, गुरु नहीं खरीद सकते आप। और गुरु ही आपको उस रास्ते पर गतिशील कर सकता है, कार उस रास्ते पर गतिशील नहीं कर सकती। फिर गुरु आप से बंधा हुआ नहीं है, कार आपसे बंधी हुई है। कार को आप मोड़ोगे तो चौपाटी पर जाएगी, या जुहू पर जाएगी।
—-पर गुरु तो आप से बंधा हुआ नहीं है, गुरु तो कहेगा तुम गलत कर रहे हो, सही रास्ता तो यह है। करो तुम गलत, यह तुम्हारी मर्जी है, परन्तु सत्य का रास्ता तो वह है। उस रास्ते पर चलोगे तो तुम अद्वितीय बनोगे, यह मेरी जिम्मेवारी है। मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूं, यह मेरी जिम्मेवारी है। मैं उस जगह तुम्हें पहुचाऊंगा, यह मेरा धर्म है, और वहां जाकर ही तुम पूर्णता प्राप्त कर पाओगे, वहां पर जाकर तुम अद्वितीय बन सकोगे। पर उसमें तुम्हारा दिखावा नहीं होना चाहिए, प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। केवल चरण स्पर्श करके फूलों का हार पहनाने से तुम्हारा काम नहीं चलेगा। तुम्हारा त्याग होगा तो अपने आप दिख जाएगा, तुम्हारी आंखो में झलक जाएगा। कर्तव्य निष्ठा तुम्हारी आंखे से झलक जाएगी कि तुमने कितना कर्तव्य पूरा किया है। यह पता लग जाएगा तुम्हें देखकर कि तुम कितना इस रास्ते पर चले हों? यह महत्वपूर्ण है कितना तुमने गुरु कार्य किया, कितने दीप तुमने इस अंधेरे में जलाए। गोरखनाथ कहते हैं कि यह जीवन का सत्य है और यह जीवन का असत्य है, इन दोनों के बीच में तुम खड़ें हो। सब कुछ तुम्हारे हाथ में है कि तुम किस रास्ते पर चलो? तुम्हारा मन, तुम्हारा चिंतन, तुम्हारा समाज बार-बार तुम्हें विषय की ओर धकेलेगा, सत्य मार्ग पर नहीं धकेलेगा। इस रास्ते पर जाओगे भी तो लोग खीचेंगे वापस कपड़े पकड़कर, पांव पकड़कर, हाथ पकड़कर वापस खीचेंगे। तुम्हारे हाथ में, पांव में कितनी ताकत है, यह तुम पर निर्भर है।
गोरखनाथ को भी मां ने खींचा कि तू चल शादी कर ले और उसने कहा मैं लिंग काट कर फैंक देता हूं फिर क्या कर लेगी? उसने कहा, मुझे रास्ता वही पकड़ना है। उन्होंने वह रास्ता पकड़ा तो वे गोरखनाथ बन गए और उन्होंने गोरखपंथ चला दिया और आज भी गोरखनाथ जिंदा हैं। हमारे दादाजी जिंदा हैं या नहीं, हमें मालूम नहीं, अपने परदादा का नाम मुझे याद है ही नहीं, परदादा के पिताजी का नाम क्या था वह तो मुझे बिल्कुल पता नहीं और किसी को याद नहीं। वे तो आए और चले गए बिल्कुल एक पानी के बुलबुले की तरह। बुलबुला बना, फट गया और खत्म हो गया। बुलबुला बनना चाहते हो, तुम्हारी मर्जी और विषय-वासना की ओर बढ़ना चाहते हो तो भी तुम्हारी मर्जी है और त्यागमय जीवन व्यतीत करना चाहते हो तो भी तुम्हारी मर्जी। इसलिए पांच साल से बारह साल की उम्र में जो रक्त मिल गया, जो स्लेट पर अंकित हो गया, गंदे विचार, घटिया विचार, उनसे तुम्हें अपने आप को बार-बार खींचना है। यह सोचना है कि मुझे इस क्षण क्या करना चाहिए कर्तव्य निष्ठा से। यह सब जो धन का मेरे सामने ढेर लगा है यह सब तो मिट्टी है, इससे मेरा जीवन नहीं चल सकता। इससे तो जीवन में बेईमानी और चोरी हो जाएगी और चोरी मेरे मन को फिर मलिन कर देगी। बड़ी मुश्किल से मैं इस मन को साफ कर रहा हूं, फिर एक लाइन बेईमानी की इसमें लिखी जाएगी।
आपको हर क्षण कर्तव्यनिष्ठ रहना पड़ेगा, हर क्षण एहसास करना पड़ेगा कि आज मैंने चोरी की, बदमाशी की, बेकार समय बरबाद किया। आज मैंने कोई त्याग किया ही नहीं, आज मैं गुरु के शब्दों की ओर बढ़ा नहीं, आज मैं उस रास्ते पर बढ़ा नहीं, जिस पर पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। और जब आप ऐसा करेंगे तो एक क्षण ऐसा आएगा, जब आपका मन शुद्धता की ओर अग्रसर हो जाएगा। इसी को जीवन कहते हैं।—- और गोरखनाथ ने एक बहुत अच्छी बात कही है कि जीवन को तुम किस ओर गतिशील करना चाहते हो, उसके लिए तुम्हें बराबर सतर्क, सचेष्ट और प्रयत्नशील रहना पड़ेगा और रहना ही चाहिए। गुरु के साथ जुड़कर, उसके शब्दों पर चलकर आप अवश्य उस रास्ते पर बढ़े हैं। हां, बढ़े आप केवल चार कदम ही हैं और अभी चार मील चलना है और चार कदम से चार मील तय करने में बहुत अड़चने आएंगी, बहुत कठिनाइयां आएंगी आपको जीवन में, क्योंकि सब खींचेगे तुम्हे। खींचेगे तो भी मेरे मन में कोई मलिनता नहीं है। यह तो तुम्हारी इच्छा है, तुम चाहे तो उस रास्ते पर भी बढ़ सकते हो और मेरे बताए हुए रास्ते पर भी बढ़ सकते हो। यह रास्ता पूर्णता का है और वह रास्ता मृगतृष्णा का रास्ता है, जहां पर तुम मिट जाओगे। वहां पर वे तुम्हें लकडि़यों में जला करके, रोते हुए तुम्हें भूल जायेंगे। दो मिनट भी नहीं रोते वो, घर तक रोते हुए नहीं आते वो, देख लेना कभी श्मशान में जाकर। पांच मिनट हूं हूं करते हैं और फिर बातें करते रहते हैं सब कि चलो पिताजी थे, चले गए, अब सब हमे संभालना है। उन्होंने व्यापार में बेईमानी का रास्ता सिखाया है कि ऐसे डंडी मारनी है, वैसे ही हम डंडी मारेंगे, कपड़े को थोड़ा आधा इंच कम फ़ाड़ना है, फाड़ लेंगे और शाम तक पांच मीटर कपड़ा तो बचा ही लेंगे हम। पांच मीटर कपड़े के छः सौ रूपये बच जाएंगे। पिताजी ने आपको बिल्कुल सही सिखा दिया और आप भी उस रास्ते पर बढ़ जाएंगे और वे पिताजी बच्चों को भी कर्तव्य के रास्ते से हटा देंगे। गोरख कहते हैं के यह हमारे जीवन का कैसा घटियापन है कि हम घटिया जीवन जी रहे हैं जबकि हम इससे अच्छा जीवन जी सकते हैं। हम अच्छे जीवन को जिएं और आज से ही उस शपथ को लें कि मैं अच्छा जीवन जीने के लिए, मैं त्यागमय जीवन को अपनाऊंगा, चाहे महीने में चार दिन, छः दिन या पूरे तीस दिन।
यह जीवन है, यह आनंद है, आप देखें कि उस आनन्द में कितना एक प्रकार का रस मिलता है, तुष्टि मिलती है, कितनी पूर्णता मिलती है, कितनी सफलता मिलती है। और तुम खुद ही आगे बढ़ कर के अपनी इच्छा व्यक्त करोगे, अपना चिंतन व्यक्त करोगे अपनी धारणा व्यक्त करोगे, तब हो पाएगा, कहने से कुछ नहीं हो पायेगा। गोरख कहते हैं कि जीवन में सत्य वह है, जो प्रत्येक मानव के लिए आवश्यक है, अगर रॉक फैलर ऐसा कर सकता है, अगर बुद्ध और महावीर ऐसा कर सकते हैं तो आप भी ऐसा कर सकते हैं। आवश्यकता है एक दृढ़ निश्चय की, संकल्प-शक्ति की। रॉक फैलर तो अभी दस पंद्रह साल पहले ही थे, बुद्ध की कई हजार साल पहले की बात है। मैंने त्रेता युग से लगाकर आज तक के उन लोगों के नामों को गिनाया है। उनके नाम मुझे और आपको याद हैं, घीसूलाल, कृष्ण लाल के नाम से मुझे या आपको कोई याद भी नहीं और हमारा नाम याद रहे उसके लिए पत्थर पर नाम खुदवाने से या पत्थर जड़वाने से काम नहीं चलेगा। दिखावा करने से काम नहीं चल पाएगा।
मन की स्लेट को साफ करना पड़ेगा और जीवन को बिना दिखावे के त्यागमय करते रहने की क्रिया को मनुष्यता कहते हैं। वह मनुष्यता तुम्हें प्राप्त हो, उस रास्ते पर तुम चल सको, ऐसे अद्वितीय बन सको, ऐसे श्रेष्ठतम बन सको कि मैं सीना फुलाकर कह सकूं कि तुम मेरे शिष्य थे और हो। तो शायद मेरी आंखो में एक प्रसन्नता की लहर व्यापत होगी। परन्तु आप सोचते हैं कि विषय-वासना या पैसा कमाना चाहिए वह आवश्यक है। आनन्द आपको पैसे से या विषय भोग से नहीं मिल सकता, क्योंकि उस पैसे की चिंता रहती है कि कैसे बदमाशी करें, कैसे और कमाएं? उसका सुख आप ले नहीं सकते। एक दीया अंधेरे को खा जाता है। अगर अंधेरे में दीये को जलाएं तो वह अंधेरे को खा जाता है। अंधेरा काला होता है और दीया अंधेरे को खा जाता है पर जब उगलता है तो वापस कालिख उगलता हैं। जो अंधेरा खाएगा वह कालिख ही उगलेगा और आप छल से पैसा कमाएंगे तो आपके पुत्र कुपुत्र हो जाएंगे, आपको रोग हो जाएगा, पत्नी बीमार हो जाएगी, घर में लड़ाई झगड़े हो सकते हैं और उस दो लाख रूपये को छाती से लगाकर आप जिन्दगी पार कर सकते हैं पर आप आन्नद प्राप्त नहीं कर सकते।
पैसे से आप पांच हजार का पलंग ला सकते हैं, परन्तु पैसे से आप नींद नहीं खरीद सकते। पैसे से आप भोजन खरीद सकते हैं, परन्तु भूख नहीं खरीद सकते। पैसे से आप सुख तो प्राप्त कर सकते हैं, पर आनन्द प्राप्त नहीं कर सकते। एयर कंडीशन से सुख है, आनन्द नहीं है। पैसे के माध्यम से आपके जीवन की टैंशन मिट नहीं सकती। अगर मिट सकती तो हजारों अमरीकी आज भारत में हिमालय पर नहीं घूम रहे होते। क्यों आते हैं, क्योंकि वहां बहुत टेंशन है। पैसा तो बहुत है पर टेंशन भी बहुत है। वे मथुरा जाते हैं, फिर हिमालय जाते हैं, समुद्र के किनारे खड़े रहते हैं। ऐसे बाहर से टैंशन मिट नहीं सकती, कहीं जाने से आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता।
टैंशन मिट सकती है आपके अंदर की भावना और विचार से। यदि एक बार आप निश्चय कर लेंगे कि मैं तो ठीक उसी प्रकार हूं जिस प्रकार सिनेमा में जाकर बैठने वाला एक व्यक्ति होता है। मुझे मालूम है कि 150 रूपये की टिकट ली है और बाहर निकलना ही है। आप इसका पार्ट मत बनिए, पत्नी अपने ढंग से करेगी, बेटे अपने ढंग से करेगे, संसार में कोई खलनायक बन रहा है, कोई हीरो बन रहा है, कोई मारपीट कर रहा है। आप बस बैठे-बैठे देखते रहिए। आनंद प्राप्त करने का तरीका अलग हैं। आनंद तब प्राप्त होगा जब आप जीवन में त्यागमय बनेंगे। इसलिए गोरखनाथ कहते हैं कि जीवन में तृष्णाओं का कोई अंत है ही नहीं। जीवन में प्रकृति ने मनुष्य को शरीर तो बहुत अच्छा दिया लेकिन उस शरीर में दो तीन चीजे और डाल दी। एक तो तृष्णा डाल दी, अब उन तृष्णाओं का तो कोई अंत है ही नहीं। लाख रूपया आना चाहिए, फिर डेढ़ लाख आना चाहिए, डेढ़ नहीं तो दो होना चाहिए, नहीं ढ़ाई होना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति के पास पांच लाख रूपये हैं और वे दो नम्बर के या तीन नम्बर के, चार नम्बर के पैसे हैं, अगर पांच लाख भी हैं तो शाम को केवल गेहूं की रोटी ही खा सकता है, सोने के टुकड़े नहीं। आप रोटी खाइये, मेरे पास चांदी के टुकड़े हैं तो मैं शाम को वह खाऊंगा।
आप नहीं खा सकते, आप भी गेहूं की ही रोटी खाएंगे। आप एक बार में चार कपड़े पहन लें, एक कोट और पहन लेंगे। पच्चीस कपड़े तो नहीं पहन सकते, एक लाख के मालिक होकर आप पच्चीस कपड़े पहने की हम छोटे आदमी नहीं हैं, तो लोग कहेंगे पागल है, अगर मेरे पास पचास हजार हैं तो मैं भी चार कपड़े पहन कर श्मशान चला जाता हूं और आप भी पच्चीस लाख कमाकर, छल से, झूठ से वही करते हैं। तो उसमें अतंर कुछ नहीं आता। अगर आपके पास पांच लाख हैं और आपने छल, झूठ, कपट से साढ़े पांच लाख कमा लिए तो आपको केवल भ्रम है, झूठा संतोष है कि मैनें साढ़ें पांच लाख कमा लिए। इससे आपके रहन सहन या जीवन में कोई फर्क नहीं पड़ता, मगर उन छः महीनों में आपने छल, झूठ द्वारा अपनी आत्मा को इतना दबोच लिया कि, उस मन पर इतनी रेत डाल दी कि आपका चेहरा भी दिखाई नहीं देता। आप भले हैं, दुष्ट हैं, ईमानदार हैं, या कैसे हैं, या कुछ दिखाई भी नहीं देता। आप बस तृष्णा में घूम रहे हैं और तृष्णाओं के कारण ही आप भटक रहें हैं और भगवान आपकी तृष्णा को देख रहा हैं और गोरख कहते हैं कि हम तृष्णाओं से, विषय से दूर होंगे तभी जीवन में उच्चता पर पहुंच पायेंगे।— और त्याग हमारी प्राचीन परम्पराओं का एक बोध है जिसके माध्यम से अगर गोरख सफल हो सकते है, मैं सफल हो सकता हूं तो आप भी हो सकते हैं, पचास और लोग भी हो सकते हैं। आवश्यकता केवल अपनी विषय वासनाओं को छोड़ने की है।
आप अपने छल, झूठ, बेईमानी को त्याग दें। त्याग दें, तो जीवन में एक परिवर्तन आ पाएगा और गोरख कह रहे हैं कि आप ऐसा नहीं कर पाते, अपनी बेईमानी को नहीं छोड़ सकते तो जीवन आपका वैसा ही है, जैसा एक घटिया व्यक्ति का। वास्तव में आप मनुष्य तभी बन सकते हैं, जब आप जीवन में त्यागमय बन सकें, तभी आप गुरु से जुड़ पायेंगे, तभी साधनाओं की उच्चता पर पहुंच पाएंगे, तभी आप जीवन में वह सब कुछ प्राप्त कर पाएंगें जो कि मानव जीवन का ध्येय है। आप ऐसा कर पाएं, श्रेष्ठतम बन पाएं, अद्वितीय बन पाएं, गोरख के समान बन पाएं, ऐसी ही मैं कामना करता हूं, हृदय से आशीर्वाद प्रदान करता हूं।
सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी
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