





वसुधैव कुंटुम्बं शिवमेपपरमं अमृतत्वंस्वंभू
ध्यानं परेण्यं शिवोऽहं वरण्येमेव
शरण्यम् त्वमेवं शरण्यम् त्वमेवं
महर्षि शुकदेव के इस श्लोक का अर्थ चिन्तन समावेश है।
महर्षि शुकदेव के पिता की कोई संतान नहीं हुई और वो बड़े ही व्याकुल, परेशान थे—जीवन में अगर संतान ही नहीं हुई। ऐसे मैंने जीवन में कौन से पाप किये कि थे मैं अपने वंश को आगे नहीं बढ़ा पा रहा हूं।
मनुष्य जन्म का ऋण वंश को आगे बढ़ाने से पूर्ण होता है। देव ऋण देवताओं की पूजा, अर्चना, तपस्या करने से पूर्ण होता है, पितृ ऋण पूर्वजों का श्राद्ध वगैरह करने से पूर्ण होता है। अमरनाथ की गुफा और अमरनाथ के बारे में आप लोगों ने सुना होगा। कश्मीर में श्रीनगर से आगे पहलगांव और उससे आगे अनंतनाग, और अनंतनाग के आगे एक श्रेष्ठतम स्थान पर है अमरनाथ, जहाँ बर्फ का शिवलिंग स्वतः निर्मित होता है, श्रावण मास की पूर्णिमा पर वहां हजारों लोग जाते हैं।
एक बार पार्वती ने भगवान शिव को पूछा कि मुझे पांच रहस्य समझाइयें। पहला रहस्य तो यह है कि – क्या व्यक्ति अमर हो सकता है? मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है? और कर सकता है तो कौन से मंत्र से, कौन सी विद्या से और कौन से तंत्र से? क्या एक दरिद्र व्यक्ति जिसके भाग्य में विधाता ने दरिद्रता लिख दी हो, क्या वो सम्पन्न और ऐश्वर्यवान बन सकता है, कुबेरपति बन सकता है? और अगर बन सकता है तो कौन से मंत्र से बन सकता है? विधाता के लिखे हुए को कौन से मंत्र से टाला जा सकता है?
और यदि जीवन में अत्यन्त पाप और दुष्टता की हो, फिर भी क्या आपकी सायुज्यता, निकटता प्राप्त हो सकती है? और क्या आपके दर्शन हो सकते हैं? और अगर हो सकते हैं तो कौन से मंत्र से, कौन सी साधना से? शिव ने कहा कि- इन प्रश्नों के उत्तर मेरे अलावा संसार में कोई और दे भी नहीं सकता। मैं बाकी प्रश्नों के उत्तर तो तुम्हें दे सकता हूं, मगर अमर होने या मृत्यु पर विजय प्राप्त होने के प्रश्न का उत्तर मैं तुम्हें अभी नहीं दूंगा।
पार्वती ने कहा- अगर उत्तर देना है तो पांचों ही उत्तर दीजिए। एक प्रश्न का उत्तर दें और एक प्रश्न का उत्तर नहीं दें, ऐसा नहीं। आप मुझे उस विधि को भी बताएं, जिस विधि से व्यक्ति पूर्ण मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सके, जिस विधि से पूर्ण दरिद्रता पर विजय प्राप्त कर सके। जिस विद्या से अपने दुर्भाग्य को समाप्त कर सौभाग्य को प्राप्त कर सके। जिस विधि से अपनी पूर्ण बीमारियों को, रोगों का समाप्त कर के, अपनी पूर्ण आयु लाभ प्राप्त कर सके और जिस विधि से आपके साक्षात दर्शन कर सके।
महोक्षः खट्वाड्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।
सुरास्तां तामृद्धि विदधति भवद्भ्रूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति।।
पार्वती ने जब पूछा की आप मुझे अमृत्यु—-मृत्यु से पूर्णतया मुक्त होने की क्रिया सिखाएं। तो उन्होंने कहा की- बहुत अच्छी बात है। अगर तुम जिद्द कर रही हो तो मैं तुम्हें उन मंत्रों को स्पष्ट करता हूं जिन मंत्रों के माध्यम से पांचों क्रियाऐं संभव होती है। भगवान शिव के प्रत्यक्ष दर्शन, कुबेर साधना, शिव सायुज्य साधना, अमृत्यु साधना, ऋण मुक्ति साधनाओं से, क्योंकि व्यक्तियों को इससे बढ़कर और चाहिये ही क्या? जो रोगी है उससे पूछिये तुम्हें जीवन में सबसे ज्यादा क्या जरूरी है तो वह कहेगा कि घर बार सब लुट जाए, मेरी तबीयत ठीक हो जाये, बस खत्म।
जब पार्वती ने जिद्द की तो भगवान शिव ने डमरू बजाया जोर से, डमरू इसलिये कि केवल यह बात मैं पार्वती को ही सुनाना चाहता हूं। पार्वती के अलावा यहां पर कोई मनुष्य, कोई पुरूष, कोई स्त्री, कोई पशु, कोई पक्षी, कोई कीट-पतंग कोई रहे नहीं और कोई नहीं सुने, क्योंकि गोपनीय विद्या है। और उसी अमरनाथ में एक कबूतर और कबूतरी बैठे हुए थे। डमरू बजाया, डमरू बजाने पर सारे पशु-पक्षी, कीट-पंतगें तो उड़ गये, वो कबूतर भी उड़ गया, कबूतरी भी उड़ गई। 12 मील, 12 कोस तक कोई भी जलचर या पशु या पक्षी या मनुष्य या स्त्री कोई नहीं। उस कबूतरी ने एक अण्डा दिया था, उसी समय अण्डा दिया ही था। अण्डा पड़ा था पांच-सात मिनट बीते, शिव ने देखा कि अब कोई नहीं है तो पार्वती को कहा सुन, अब मैं तुम्हें इन पांचों साधनाओं के बारे में बता रहा हूं जिन साधनाओं के माध्यम से पूरे संसार के सुख मिल सकते हैं। मनुष्य की इच्छा ही यही है। जो मनुष्य सामान्य व्यक्ति है वह स्वास्थ्य को चाहेगा, फिर थोड़ा ऊंचा उठेगा तो धन को चाहेगा, तो अपने ज्ञान का प्रकाश चाहेगा। फिर थोड़ा ऊंचा उठेगा तो अमृत्यु को चाहेगा, पांचों क्रियाओं को चाहेगा। तो मैं तुम्हें अमर तत्व की मंत्र-क्रिया समझा रहा हूं। उसी समय अण्डा फूट गया उसमें से बच्चा निकल गया। भगवान शिव सुनाने लगे। एक आदमी कहता है तो दूसरा हां भरता है।
तो ऐसा किया तो ‘‘हूं’’, मैंने वैसा कर दिया, तुमने सुना कि ‘‘हूं’’। महादेव कहते रहे पार्वती सुनती रही। अमरकथा, अमरतत्व कथा या वे मंत्र या वो साधना विधि। कथा का मतलब वह साधना विधि, कथा का मतलब कथ्य, जो कहा उसको कथा कहते हैं। शिव ने कहा- क्या हुआ तुम थकी हुई बहुत हो, उसने कहां नहीं। मुझे अमरत्व सुनाओ, ये चालाकी नहीं चलेगी। पूरी अमरतत्व कथा मैं सुनूंगीं, मुझे ये ज्ञान, चेतना चाहिए। शिव ने कहा सुन, शिव सुनाने लगे, वो हां और हूं करती गयी और शिव सुनाते चले गये। करीब आधी कथा हुई— पार्वती को नींद आ गयी। नींद आ गई, भगवान शिव कहते रहे और उसके बाद ‘ह्रीं’ बीज की हुंकार की ध्वनि आती रही। वो कबूतर बैठा बैठा ‘हूं-हूं’ करता रहा। फिर शिव ने कहां- ‘ह्रीं’ को इस ढंग से उच्चरित करना चाहिये। वहां से आवाज आई ‘हूं’ शिवजी को लगा कि सुन रही है। फिर उसको पूरी बात सुनाते—सुनाते— सुनाते— पूरी विधि सुनाई। जिस ढंग से इन पांचों विधियों से ये पांच बीज मंत्र हैं।
ये 5 बीज मंत्रों की साधना है। इन साधनाओं के माध्यम से निश्चित ही वह मेरे दर्शन कर सकता है। पापी से पापी, पांखडी से पांखडी, ढोंगी व्यक्ति और ढोंग करता हुआ भी मेरे दर्शन कर सकता है। छल करता हुआ भी, करोड़पति बन सकता है। रोगमुक्त हो सकता है। कुबेर सिद्धि प्राप्त कर सकता है। वो सारी विधियाँ बताई और उसमें से उसने शायद रूपये में चार आने तो पार्वती ने सुनी और बारह आने उस कबूतर के बच्चे ने बैठे-बैठे सुनी और हूं-हूं-हूं करता रहा। जब आंख खोली, तो पूछा पूरी बात समझी तू।
पार्वती ने कहा कि- बात क्या है? शिव ने कहा बता क्या है? परा अमृतत्व तो तुम्हें सुनाया था। पार्वती कहा- सुनाया तो था, पर गर्मी बहुत थी और ठंड़ी हवा चल रही थी। अमरनाथ में ऐसा ही वातावरण रहता है। पार्वती ने कहा- वो ‘ह्रीं’ बीज, वहां तक तो मैंने सुना था। शिव ने कहा- वो ‘ह्रीं’ बीज! वो तो बहुत पहले की बात हैं, उसके बाद तो घंटे भर तक और पूरी विधि समझाई है। उसने कहा- ‘मुझे नींद आ गई’। तो ‘हुं-हुं’ कौन कर रहा था? आवाज कौन कर रहा था? इस 12 कोस में तो कोई पक्षी नहीं है। डमरू बजाया था मैंने। उसने कहा- आपने डमरू बजाया कि नहीं ये मुझे मालूम नहीं है, मैंने तो हुं-हुं नहीं किया, मैं तो नींद में थी।
शिव ने ऊंचा नेत्र उठाया, तो कबूतर बैठा हुआ दिखाई दिया, पार्वती के अलावा इसने भी अमर कथा सुन ली और अगर से संसार में फैल गई तो कोई मरेगा नहीं, मरेगा नहीं तो मुझे कौन याद करेगा। तो यह संसार कितना घटिया हो जायेगा। जहां देखो बूढ़े-बूढे़ चेहरे दिखाई देंगे। मरेगा तो एक भी नहीं नये पैदा होंगे नहीं और नये पैदा होते गये और बूढ़े मरते नहीं गये तो पृथ्वी पर तिल रखने की जगह नहीं होगी। त्रिशूल फेंका जोर से, उस कबूतर को मारने के लिए, कबूतर आगे उड़ा, पीछे-पीछे त्रिशूल। वहां व्यासदेव जी ऋषि की पत्नी बैठी-बैठी जल चढ़ा रही थी, भगवान सूर्य को अर्घ्य दे रही थी और उसने उबासी ली और कबूतर ने देखा की अब त्रिशूल तो मुझे मारेगा ही—- उसके मुंह के अंदर घुस गया, ऋषि पत्नी के।
भगवान शिव स्त्री को तो मार नहीं सकते थे, त्रिशूल रूक गया भगवान शिव भी त्रिशूल के पीछे-पीछे आये। उन्होंने कहा कि- मेरा शत्रु तुम्हारे घर में है। उसको बाहर निकाल, मुझे उसको समाप्त करना बहुत ज्यादा जरूरी है। नहीं तो ये सारी सृष्टि का क्या होगा। ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण किया है और अगर संहार नहीं होगा तो निर्माण नहीं होगा। ऋषि की पत्नी ने कहा कि- मैंने तपस्या की है, मैं ऋषि पत्नी हूं और तुम्हारा शत्रु अब मेरे पेट मे है। जब पेट से बाहर निकले तो मार देना या तो तुम मुझे मारो, स्त्री को मार दो। मैं खड़ी हूं, तुम त्रिशुल से मुझे मार सकते हो। शिव ने कहा- मैं स्त्री को तो मार नहीं सकता।
ऋषि पत्नी ने कहा- जब संतान उत्पन्न हो— शत्रु तो तुम्हारा वो है— जब पैदा हो तो मार देना। शिव ने कहा- मैं घर के बाहर बैठा रहूंगा, कोई भरोसा नहीं, कब पैदा हो, कब निकल जाये, कोई नौ महीने का गर्भ हो, 5 महीने के गर्भ से ही निकल जाये। मैं यहीं धूनी लगाऊंगा। उसने कहा- वो आपकी इच्छा है। भगवान शिव ने वहीं धूनी लगाई, बैठ गये। नौ महीने बीत गये, 10 महीने बीत गये, ग्यारह महीने बीते, बारह महीने, 13, 14 महीने बीते। पहले तो स्त्रियां 21 महीने का गर्भ धारण करती थी। 15 महीने में उसने पूछा अंदर बच्चे को कि ‘तुझे कोई कष्ट तो नहीं है।’
उसने कहा- माता जी बहुत आराम से बैठा हूं, बाहर निकलूंगा तो ये शिवजी मार देंगे। अंदर तुम्हें कोई तकलीफ हो रही हो तो बाहर निकल जाऊं। ये मुझे मार नहीं सकता, क्योंकि मैंने अमरकथा पूरी सुन ली है। मैंने सुन ली है तो मैं मर नहीं सकता, यह गॉरन्टी है। इनका त्रिशूल मेरा कुछ बिगाडे़गा नहीं। आप चिंता मत करिये आपको कष्ट नहीं होना चाहिए। मुझे क्या कष्ट, तू बैठा रह अंदर। बस! भगवान शिव के रोज दर्शन होते रहें। इसी बहाने रोज सुबह-शाम दर्शन करती हूं। पहले पूजा अर्चना करनी पड़ती थी। तू भी ठीक अंदर अच्छा बैठा है। पूरे छः साल तक अंदर बैठा रहा। भगवान शिव ने कहा- शत्रु को बाहर निकाल। उसने कहा की- मैं निकालने वाली कौन होती हूं, यह तो ब्रह्मा का नियंत्रण है, ब्रह्मा जब चाहेगा तब ऐसा होगा। अगर वो निकल भी गया तो क्या तुम उसको मार सकते हो? उसने अमरकथा सुन ली है। शिव ने कहा-ये बात तो सही है।
ऋषि पत्नी ने कहा- त्रिशूल उसका कुछ अहित तो कर नहीं सकता। फिर तुम अपना टाईम बर्बाद क्यों कर रहे हो, फिर यह धूनी लगाये हुये, मेरे घर के आगे राख फैला दी है। ये भूत गण घूम रहे हैं, नाच रहे हैं, न कोई मिलने अंदर आ सकता है, न कोई बाहर जा सकता है। तुम यहाँ झंडा गाड़े हुए बैठे हो। ये छः साल की सजा हमें क्यों दी है। शुकदेव को कहा- तुम बाहर चलो! ‘शुकदेव’ शुक माने तोता, देव-माने देवता, इसलिए उसका नाम शुकदेव पड़ा। वो तोता जो था वो अंदर गर्भ में बालक बना, इसलिए उसे शुकदेव कहा। इसीलिये अग्रगाह बालक कहा गया वो। ज्योंहि वह बाहर निकला, वह पैदा हुआ और पैदा होते ही रवाना हो गया। उसके पिता पीछे दौड़े, व्यासदेव जी दौड़े, मां दौड़ी। उसने कहा-बेटे तुम क्या कर रहे हो? कहाँ जा रहे हो? बुढ़ापे में बड़ी मुश्किल से तुम्हें पाया है, पाला है, पोसा है तुम्हें।
शुकदेव ने कहा- माँ क्या होती है? पिता क्या होता है? ये तो केवल एक निमित्त मात्र होते हैं और तुम भी केवल एक निमित मात्र हो, जन्म देने के एक आधार हो, मेरे जीवन के कर्मों को पूर्णता देने के आधार नहीं हो। जन्म देने के आधार हो। तुमने जन्म दिया है इस बात के लिए तो तुम्हारा ऋणी हूं। मगर तुम मेरे जीवन के कर्मों का संचालन नहीं कर सकते। मेरे जीवन को एकदम ‘‘चक्षुरून्मीलितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः।’’
और आगे जाकर शुकदेव भागवतकार बनें। भागवत की रचना ही, भागवत एक पुराण है। जब ‘‘ नैमिषारण्य’’ में 88 हजार ऋषि वेदों इत्यादि के सम्बन्ध में चर्चा करने के लिय एकत्र हुए तो विवाद हुआ कि इस सभा का अध्यक्ष किसे बनाया जाये पुलस्य, वेद व्यास, जमदाग्नि सारे ऋषि बुजुर्ग ऋषि थे। सब अपनी-अपनी राय देने लगे तब सारे वरिष्ठ ऋषियों ने कहा कि हम सबसे ज्ञानी शुकदेव मुनि ही हैं। उम्र में भले ही वे केवल 12 वर्ष के हैं लेकिन उन्हें पंच विद्याओं का पूर्ण ज्ञान है और वे ही ऋषियों को उपदेश दे सकते हैं। वाद्-विवाद में कोई निर्णय दे सकते हैं। संसार में शुकदेव मुनि से ज्यादा ज्ञानी पुरूष अभी इस सृष्टि में नहीं है। सारे ऋषियों द्वारा निवेदन करने पर शुकदेव मुनि ने सभा की अध्यक्षता की और पुराण लिखे गये, नवीन पुराणों की रचना हुई।
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